Tuesday, January 17, 2017

बटेश्वरा मंदिर समूह मुरैना

संसद के आकार के चौंसठ योगिनी शिव मंदिर की ऊंची पहाडी से ही पढावली गांव की पहाडियां दिखाई दे रहीं थीं। बडी नहर पार कर सीधे मुरैना मार्ग पर बस दो किमी चल कर ही गांव का प्राचीन मंदिर दिखाई दे गया।
इस मंदिर से शिव की मुख्य मूर्ति तो गायब थी लेकिन नंदी बाबा अभी भी विराजमान थे। बाद में आये गोहद के जाट राजाओं ने इसे किले का रूप दे दिया था।
इसी किले के पीछे एक किमी चल कर बटेश्वर मंदिरों का समूह देखकर हतप्रभ रह गया। चारों तरफ से घाटियों में घिरे हरे भरे मनोरम और शांत जंगल के बीच बने 101 शिव मंदिरों के समूह बटेश्वरा को देखकर हर किसी का मन बहां ठहरने को करेगा। बटेश्वरा ही नहीं बल्कि संसद भवन का प्रेरणा स्रोत कहा जाने वाला मितावली का 64 योगिनी मंदिर, पढ़ावली का विष्णु मंदिर और गढ़ी के अन्य मंदिर भी प्राचीन स्थापत्य कला के अनुपम उदाहरण हैं। सैंडस्टोन से मिले ये शिव मंदिर खुदाई में जीर्ण शीर्ण स्थिति में प्राप्त हुये हैं। कहा जाता है कि पुरातत्वविद केके मौहम्मद को एक दिन सपना आया और अगले ही दिन उन्हौने गुजरात्र प्रतिहार मंदिरों को ढूंडने की ठान ली। मौहम्मद को इसके लिये निर्भय गुर्जर एवं अन्य डाकुओं से भी वार्ता करनी पडी। और उन्हें समझाया कि ये आपके पुरूखों की ही विरासत है और मैं मुसलमान होकर भी इन्हें रिस्टोर करने को द्रण प्रतिज्ञ हूं तो आप क्या मेरी मदद नहीं करेंगे। हालांकि निर्भय गुर्जर ने खूब मदद की लेकिन अन्य डाकुओं से पीछा उन्हें STF द्वारा मारने के बाद ही छूटा।
मध्य प्रदेश के मुरैना से लगभग 35 किलोमीटर दूर बीहड़ों में ये जगह पड़ती है बटेश्वर जहां आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच परिहार क्षत्रिय वंशों द्वारा बनवाई गई अब तक सबसे बेहतरीन कला है करीब एक ही जगह पर 200 मंदिरों का निर्माण किया गया था।।
इन मंदिरों का निर्माण प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजवंश के सम्राट मिहिरभोज के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ और सम्राट विजयपाल प्रतिहार के शासनकाल के समय इन मंदिरों का निर्माण कार्य पूरा हुआ।।
भगवान् शिव और विष्णु को समर्पित ये मंदिर खजुराहो से भी तीन सौ वर्ष पूर्व बने थे चम्बल में डाकुवों के आतंक के कारण ये और भी उपेक्षित रहे और लगभग सारे के सारे गिर चुके थे।
के के मुहम्मद की वजह से ही आज प्रतिहार / परिहार क्षत्रियों द्वारा बनावाये दो सौ भी अधिक मंदिर वहां अपने पुराने रूप में लाये जा चुके हैं। के के मुहम्मद इन मंदिरों को अपना तीर्थ मानते हैं और चाहते हैं कि आने वाले समय में इस स्थान को तीर्थ यात्रा के रूप में मान्यता मिले, उन्हौने भारत के विभिन्न स्थानों पर कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया है।
के के मुहम्मद मंदिरों और भारतीय मान्यातों का बहुत गूढ़ ज्ञान और श्रद्धा रखते है, और बिना श्रद्धा के इस तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता है।
11वीं शताब्दी के ककनमठ मंदिर तक पहुंचने के लिए मुरैना से 33 किलोमीटर दूर सिहौनियां पहुंचना पड़ता है। फिर वहां से दो किमी दूर ककनमठ है। सिहौनियां से ककनमठ तक की सड़क भी दुरुस्त नहीं है। जैसे-तैसे ककनमठ पहुंच भी जाएं तो वहां कोई दुकान तक नहीं है कि बच्चों को कुछ खाने-पीने को मिल सके। यहां पानी के लिए एक हैंडपंप लगा है। इस मंदिर पर कोई गाइड भी नहीं रहता। मुरैना से 35 किलोमीटर दूर स्थित मितावली गांव पहुंचने के पांच रास्ते हैं, लेकिन इनमें से किसी पर भी संकेतक नहीं लगा है कि यहां पुरातत्व स्मारक है। मितावली में पहाड़ी पर 64 योगिनी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बना है।जिसके नक्शे पर भारत का संसद भवन है। यहां ग्वालियर की ओर से मालनपुर होकर, बानमोर से शनीचरा होकर, नूराबाद से व जड़ेरूआ समेत कुतवार-बसैया गांव की ओर से मितावली पहुंचा जा सकता है।
पुरातत्वस्थल पढ़ावली की गढ़ी देखने जाने के लिए मालनपुर होकर, बानमोर से शनीचरा होकर, नूराबाद की ओर से व जड़ेरूआ समेत कुतवार-बसैया गांव की ओर से यहां पहुंचा जा सकता है।
प्रतिहार राजवंश के शासन काल के समय बनवाये गये बटेश्वर मंदिर, पडावली मंदिर, चौसठ योगिनी मंदिर को बनवाने वाले परिहार वंश एवं बटेश्वर के इतिहास को जो प्रतिहार शैली पर बना है जो अपने आप मे एक अदभुत कला है इतने सुदंर मनोरम धार्मिक स्थल पर दुनियां की नजर पडनी बाकी है।










3 comments:

  1. मुझे गर्व है, कि मैं पुरातत्वविद श्री के के मुहम्मद से मिला हूँ , और बटेश्वर मंदिरों पर बनी उनकी शार्ट फिल्म भी देखी है । उनका तमाम मुश्किलों के बाद भी इन मंदिरों को संरक्षण कार्य अद्वितीय है ।

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  2. मुझे गर्व है, कि मैं पुरातत्वविद श्री के के मुहम्मद से मिला हूँ , और बटेश्वर मंदिरों पर बनी उनकी शार्ट फिल्म भी देखी है । उनका तमाम मुश्किलों के बाद भी इन मंदिरों को संरक्षण कार्य अद्वितीय है ।

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