Sunday, January 29, 2017

Ayodhya tour 24 Dec 2015

मित्रों इस बार आपको ले चलता हूं अयोध्या, लखनऊ, इलाहावाद और बनारस की यात्रा पर जो मैंने पिछली साल दिसंबर 2015 में की थी। विंटर वैकेशन की घोषणा होते ही आगरा फोर्ट से लखनऊ बाली ट्रैन पकड ली क्यूं कि सीधे अयोध्या बाली ट्रैन लेट थी। हालांकि वही ट्रेन मुझे लखनऊ से पकडनी पडी। करीब दस बजे तक अयोध्या पहुंच गया। सुवह फैजाबाद की वजाय सीधे अयोध्या स्टेशन ही उतरा जहां मेरा दोस्त Pramod Tripathi मेरा पहले से ही इतंजार कर रहा था। प्रमोद तिवारी से मित्रता उस दौरान हुयी थी जब वह बी एड करने आगरा आकर मेरे पास रहा था। हमें मिले कई साल हो चुके थे इसलिये दोनों ही एक दूसरे से मिलने के लिये व्याकुल थे। 
चूंकि राम जन्म भूमि जाने से पहले स्नान करना था तो सोचा क्यूं न वहीं डुबकी लगायी जाय जहां रघुकुल ने डुबकी ली है। पास में यदि बाइक हो तो शहर घूमना आसान हो जाता है और निर्भरता भी नहीं रहती। प्रमोद की कोचिंग क्लास डिस्टर्व न हो इसलिये उसकी बाइक लेकर निकल पडा सरयू नदी की तरफ। सबसे पहले नया घाट पहुंचा जहां खूव सारी रंगविरंगी नौकाऐं हमें साथ लेकर जल विचरण करने को मचल रहीं थीं पर पहले स्नान करके तन और मन तरोताजा करना था और यात्रा की थकान भी दूर करनी थी। सबसे पहले तो नदी किनारे ही बने पेड शौचालय जाकर आया।  फिर क्या , उतारे कपडे और कूद पडा सरयू के स्वच्छ शीतल जल में। ठंडे ठंडे पानी ने शरीर का खून दौडा दिया पर ठंड के मारे दस मिनट से ज्यादा न टिक सका।इतना ठंडा पानी कि कंपकपी छूट गयी लेकिन आनंद आ गया। स्नान के बाद नौकायान का आनंद भी लेना था । सुवह ही सुवह कोई साथी न मिला तो अकेले ही लेकर चल पडा नाव बाले को। बहुत सारे नाव बाले खडे रहते हैं यहां। मात्र पचास रुपये में नौकायान करा देते हैं। 
बाकी सब तो ठीक था पर घाट पर फैली गंदगी से मन थोडा व्यथित हो गया। आज श्री राम जिंदा होते तो ये अपने नगर की गंदगी देखकर दुवारा डूब कर मर जाते। शहर घूमने के बाद मन में रोश भी है , कट्टरंथी हठधर्मिता एवं राजनीति  के चलते जन्म भूमि को तो भव्य न बना सके पर क्या इस शहर को स्वच्छ रखने में भी कोई राजनीति आडे आ रही थी, देखकर लग ही नहीं रहा कि कभी ये श्री राम की राजधानी रही होगी।
घाट पर थोडी देर चहलकदमी करने के बाद बापस कोचिंग की तरफ आया कि शायद प्रमोद फ्री हो गया हो लेकिन वो तो बैच पर बैच लिये जा रहा था। इसलिये मैं अकेला ही निकल पडा शहर की तरफ। पहले तो चोखा वाटी का नास्ता किया और फिर बढ चला हनुमानगढी मंदिर की तरफ। मंदिर पहुंचा, दर्शन किये। अयोध्या के सबसे ज्यादा भ्रमण किए जाने वाले स्थलों में हनुमान गढ़ी है जिसे हनुमान जी का घर भी कहा जाता है, यह मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है। यह मंदिर अयोध्या में एक टीले पर स्थित है और यहां से काफी दूर तक साफ - साफ देखा जा सकता है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको लगभग 76 सीढि़यां चढ़नी पडेगी।इस मंदिर के लिए भूमि को अवध के नबाव ने दी थी और इसे लगभग दसवीं शताब्दी के मध्य में उनकी रखैल के द्वारा बनवाया गया था। हनुमान गढ़ी, वास्तव में एक गुफा मंदिर है। इस मंदिर परिसर के चारों कोनो में परिपत्र गढ़ हैं। मंदिर परिसर में मां अंजनी व बाल हनुमान की मूर्ति है जिसमें हनुमान जी, अपनी मां अंजनी की गोदी में बालक रूप में लेटे है।यह विशाल मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से अच्छा है बल्कि वास्तु पहलू से भी इसे बहुत अच्छा माना जाता है।
हनुमानजी के दर्शन किये और फिर रामलला के दर्शन के लिये निकल पडा, जिसका वहां से मात्र दस बीस मिनट का रास्ता है। सीता रसोई के पास ही वाहन रोके जा रहे थे। कैमरा भी जमा किया जा रहा था। सीता रसोई देखने में लगी नहीं कि ये सीता की रसोई रही होगी। कार्बन डेटिगं पद्धति से इन भवनों की उम्र पता करें तो मुश्किल से पांच सौ बर्ष बैठेगी। खैर हमें क्या । आस्था में प्रश्न करना गुनाह है। सीता रसोई के नजदीक ही अपनी बाइक खडी कर और अपने मोबाइल कैमरा जमा कर पैदल ही निकल लिया राम लला की ओर। प्राचीन भवनों से सुसज्जित गलियों में घूमता हुआ आखिरकार एक चौडे से स्थान पर आ गया। इस पूरे रास्ते में जवान ही जवान तैनात मिले मुझे। और उधर त्रिपाल में बैठे रामलला की सुरक्षा में इतनी पुलिश ??? बाप रे बाप ! मेरा तो दिमाग घूम गया । बेचारे भगवानों के भी अब कितने बुरे दिन आ गये हैं कि अपनी रक्षा एक तुच्छ से मानव से करानी पड रही है, वरना अब तक तो मैंने मानव को ही यह कहते सुना था," हे भगवान मेरी रक्षा करना" और एक हमारे रामलला हैं जो दयनीय प्रार्थना कर रहे थे, हे मानव मेरी रक्षा करना।"
खैर मुझे उन्हें इस तरह मनुष्य के सामने अपनी जान की भीख मांगते हुये देखा न गया और दिल में दर्द, आखों में रोष एवं उनकी दयनीय स्थिति पर अफशोष जताते हुये कनक भवन की तरफ रवाना हो गया।
लेकिन पट बंद मिले जो शाम चार बजे खुलने थे तो ऋषभदेव जी आदिनाथ मंदिर की तरफ बढ गया।
भगवान श्री राम के साथ साथ प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव एवं अन्य चार जैन तीर्थंकरों का जन्म भी अयोध्या की पावन भूमि पर ही हुआ है अतएव जैन धर्म का प्रारम्भ भी यहीं से माना जा सकता है।
इस प्रकार शाम तक सारा अयोध्या कवर कर चुका था। मेरा दोस्त भी कोचिगं पढा के फ्री हो चुका था, अब दोनों दोस्त चल दिये फैजाबाद की तरफ अपने घर भाभी के हाथ की बनी लिट्टी चोखा मेरा इतंजार कर रहीं थीं। 


















अयोध्या के प्रमुख दर्शनीय स्थल
हनुमान गढ़ी, राम जन्म भूमि, सीता की रसोई, ऋषभदेव राजघाट उद्यान कनक भवन चक्र हरजी विष्णु मंदिर, तुलसी उद्यान, तुलसी स्मारक भवन, त्रेता – के – ठाकुर, दशरथ भवन, नागेश्वर नाथ मंदिर, मणि पर्वत, मोती महल, राम कथा पार्क, अयोध्या
राम की पौढ़ी, फैजाबाद संग्रहालय, फैजाबाद
बहू बेगम का मकबरा, कलकत्ता किला, घाट, गुलाब बाड़ी, फैजाबाद

Saturday, January 28, 2017

छत्तीसगढ टूर : दुर्ग

शहडोल से रात को ही ट्रैन थी जो मुझे सुवह तक विलासपुर पहुंचा सकती थी। हालांकि मुझे जसपुर की तरफ जाना था जहां मुझे नागों की दुनियां देखनी थी। कहते हैं कि सावन के महीनों में चारों ओर सांप ही सांप नजर आते हैं। बच्चे खेलते हैं सापों से। मुझे मिलना था नागलोकवासियों से। लेकिन मित्र राकेश शर्मा का आगृह था कि मैं उनके पास ही रुकूं और फिर उनकी गाडी लेकर जसपुर चला जाऊं।मैं सुवह ही विलासपुर स्टेशन पहुंच गया पर राकेश जी से फौन की गडबडी के कारण संपर्क स्थापित न हो सका। समय की भी कमी थी। रायपुर और दुर्ग भी जाना था। दो एक मित्रों से मिलना था। राकेश जी से बात नहीं हुयी तो सोचा कि दुर्ग बाले दोस्तों से मिल आऊं। दुर्ग में एक तो मित्र विकाश शर्मा जी से एंव दूसरे पुलिसकर्मी स्मिता टांडी जी से मिल कर आना था।



अमरकंटक टूर पर गया तो छत्तीसगढ घूमने के उद्देश्य से ही था जिसमें मुझे बहुत सारे मित्रों के अलावा आदिवासियों की जीवन शैली से भी परिचित होना था लेकिन विलासपुर पहुंचते पहुंचते मेरी सारी छुट्टियां समाप्त हो चलीं थीं। बस एक दिन था मेरे पास। अगले ही दिन स्कूल पहुंचना बहुत ज्यादा जरूरी था। अब इस एक ही दिन में क्या क्या हो सकता था इसलिये नागलोक की दुनियां घूमना रद्द हो गया। अब तो बस विलासपुर के राकेश शर्माजी एवं दुर्ग के विकाश भाई और स्मिता बहिन से मिलना बाकी था। विलासपुर स्टेशन पर मोबाईल की तकनीकी खराबी के कारण राकेश भाई से संपर्क नहीं हो पाया तो सोचा कि दुर्ग हो आता हूं। रायपुर बाले मित्रों से भी संपर्क नहीं हो पाया उस समय। इसलिये दुर्ग पहुंच गया। मैंने दुर्ग जाने का समय गलत चुना था। पर करता भी क्या मुझे छुट्टियों के हिसाब से चलना पडता है। राष्ट्रीय पर्व के एक दिन पहले स्मिता जी भी बहुत व्यस्त थीं। आधा घंटा ही सही पर मुलाकात अवश्य हुई। विकाश जी मैसेज मिलते ही मुझे लेने स्टेशन आ गये थे। विकाश शर्मा जी बहुत ही शालीन व्यक्ति हैं। पेशे से फोटोग्राफर हैं और दिल से घुमक्कड। बहुत ही जानदार विचारों के मालिक। विचारों में काफी गंभीरता और परिपक्वता लिये हुये हैं। विकाश जी के साथ ही भोजन किया था उस दिन। तभी स्मिता जी भी आ गयीं स्टूडियो पर ही। तीनों की काफी अच्छी मुलाकात रही। विकाश जी ने मुझे घुमक्कड गुरू राहुल सांस्कृतयन की एक पुस्तक भी भेंट की जिसे मैं सारे रास्ते पढते आया। विकाश जी का प्रेम पाकर बहुत अभिभूत हुआ मैं।
रिस्तों का पता नहीं है कि कब और कहां बन जायें। विचार न मिलें तो घर के सदस्यों से भी न पटे और मन मिल जायें तो हजारों किमी दूर बैठे लोग भी आपके इतने करीब आ जायें कि खून के रिश्ते भी उनके आगे छोटे पड जायें। स्मिता तांडी छत्तीसगढ पुलिसकर्मी हैं जो जीवनदीप नामक सामाजिक संस्था के माध्यम से समाज की सहायता करती हैं। न कितने गरीवों असहायों मजलूमों की मदद की होगी अब तक। न जाने कितने रोगियों के लिये आर्थिक सहायता जुटाई होगी। दुर्ग छत्तीसगढ पुलिस महकमा में रहकर समाज के हित में कार्य करना किसी विशेष इच्छाशक्ति के तहत ही हो पाता है। शायद यही कारण है कि आज सोशल मीडिया में स्मिता आठ लाख फोलोवर्स के साथ दुनियां को एक परिवार बनाये बैठी हैं। बहुत खुशी हुई दोनों से मिलकर। शाम को ही बापसी ट्रैन थी। उधर राकेश भाई से भी बात हो गयी थी जो मुझे बार बार बुला रहे थे। समय की कमी के चलते नागलोक तो रद्द हो चुका था। अब तो विलासपुर से ही लौटना था घर।

Friday, January 27, 2017

छत्तीसगढ : शहडोल से विलासपुर : देवरानी-जेठानी मंदिर 5वीं सदी

शहडोल से रात को ही ट्रैन थी जो मुझे सुवह तक विलासपुर पहुंचा सकती थी। हालांकि मुझे जसपुर की तरफ जाना था जहां मुझे नागों की दुनियां देखनी थी। कहते हैं कि सावन के महीनों में चारों ओर सांप ही सांप नजर आते हैं। बच्चे खेलते हैं सापों से। मुझे मिलना था नागलोकवासियों से। लेकिन मित्र राकेश शर्मा का आगृह था कि मैं उनके पास ही रुकूं और फिर उनकी गाडी लेकर जसपुर चला जाऊं।मैं सुवह ही विलासपुर स्टेशन पहुंच गया पर राकेश जी से फौन की गडबडी के कारण संपर्क स्थापित न हो सका। समय की भी कमी थी। रायपुर और दुर्ग भी जाना था। दो एक मित्रों से मिलना था। राकेश जी से बात नहीं हुयी तो सोचा कि दुर्ग बाले दोस्तों से मिल आऊं। दुर्ग में एक तो मित्र विकाश शर्मा जी से एंव दूसरे पुलिसकर्मी स्मिता टांडी जी से मिल कर आना था। बहुत खुशी हुई दोनों से मिलकर। शाम को ही बापसी ट्रैन थी। उधर राकेश भाई से भी बात हो गयी थी जो मुझे बार बार बुला रहे थे। समय की कमी के चलते नागलोक तो रद्द हो चुका था। अब तो विलासपुर से ही लौटना था घर। राकेश भाई के साथ विलासपुर घूमते रहे और सुवह नजदीकी ही एक प्राचीन मंदिर गये जो मनिहारी नदी के किनारे है।ताला या तालाग्राम भोजपुर-दागोरी रोड पर बिलासपुर से 25 किमी की दूरी पर स्थित है।






 देवरानी-जेठानी मंदिर 5वीं सदी का है। इन मंदिरों की खोज अवशेषों में से की गई, जिनमें देवरानी मंदिर अच्छी हालत में है जबकि जेठानी मंदिर की हालत जर्जर है। तालाग्राम को अमेरी-कापा ग्राम के रूप में भी जाना जाता है। 7 फुट की ऊंचाई और 4 फुट की चौड़ाई के साथ एक अद्भुत प्रतिमा मंदिर में विराजमान है। तालाग्राम रुद्र शिव के लिए प्रसिद्ध है।
इस मंदिर के बाहर ही रोड पर कार खडी करने के बाद जब हम अंदर कैपंस में पहुंचे तो देखा कि सैकडों उत्सुक लोगों की भीड अपनी प्राचीन सनातनी परंपरा को जानने के प्रयास में थी।अधिकांश स्थानों पर  शिवजी को लिंग रूप में दिखाने के पीछे क्या मंतव्य रहा होगा, ये तो मुझे भी नहीं मालुम लेकिन पांचवी सदी में मतलब उत्तर भारत के गुप्तकाल के दौरान दक्षिण कौशल के शरभपुरीय शाषकों ने शिवजी की इस मूर्ती उनके असली रूप को डालने का खूबसूरत प्रयास किया है।
 मंदिर के तल विन्यास में आरंभिक चन्द्रशिला और सीढिय़ों के बाद अर्धमंडप, अन्तराल गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं। मंदिर की सीढिय़ों पर शिव के यक्षगण और गंधर्वो की सुन्दर आकृतियां डोलोमटिक लाइमस्टोन पर खुदी हुई हैं। मनियारी नदी में मिलने वाले पत्थरों का प्रयोग यहां किया गया है। निचले हिस्से में शिव- पार्वती विवाह के दृश्य उत्कीर्ण हैं। प्रवेश द्वार के उत्तरी पाश्र्व में दोनों किनारों में विशाल स्तंभ के दोनों और 6- 6 फीट के हाथी बैठी मुद्रा में हैं। दक्षिण की और मुख्य प्रवेश द्वार के अलावा पूर्व और पश्चिम दिशा में भी द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पर पत्थरों के कलात्मक स्तंभ हैं।उत्खनन से प्राप्त अतिरिक्त मूर्तियों में चतुर्भुज कार्तिकेय की मयूरासन प्रतिमा है। द्विमुखी गणेश की प्रतिमा अपने दांत को एक हाथ में लिए चन्द्रमा में प्रक्षेपन के लिए उद्यत मुद्रा में है। अर्धनारीश्वर, उमा- महेश, नागपुरूष, यक्ष मूर्तियों में अनेक पौराणिक कथानक झलकते हैं। शाल भंजिका की भग्न मूर्ति में शरीर सौष्ठवता व कलात्मक सौन्दर्य का संतुलित प्रयोग किया गया है। एक विशाल चतुर्भज प्रतिमा जिसकी भुजाएँ तथा आयुध खंडित है की भाव भंगिमा से महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति का बोध होता है।
रुद्र की विशाल और अनौखी मूर्ति में सारे पशु पक्षी शिवजी के अंग में समाये हुये हैं। निसंदेह यहां भी शिव या रुद्र को मानव रूप में ही दिखाया है जिसमें लिगं भी दृष्टिगोचर है। बाद में जाकर मूर्तिकारों ने केवल लिगं को ही प्रमुखता दी लेकिन ये है उनका असली रूप। 
मैं अभी भी इस कशमकश में हूं क्या शिव जी वास्तव में एक मानव ही थे ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये रुद्र अन्य कोई योगी हों जो एकांत जंगल या पर्वत पर ध्यान साधना में तल्लीन संत हों और जो ध्यान में इतना मगन हो जाय कि उसे ध्यान भी न रहे कि उसके ऊपर सांप लोट रहे हैं। एक ऐसा योगी जो पशु पक्षियों पेड पोधों नदी तालावों मतलब प्रकृति की खूबसूरत दुनियां में निवास करता हो। यदि ये मानव ही है तो ईश्वर के तीन रुपों सृजक पालनहार और विनाषक बाली परिकल्पना ध्वस्त होती नजर आती है। खैर ये योगी कोई भी हों आदि पुरुष हैं जिसकी मान्यता सैंधव सभ्यता से लेकर अब तक विश्व के बहुत सारे देशों में चली आ रही है। 
देवरानी मंदिर परिसर में बहुत बहुत पत्थरों की शिलाओं और अर्धनिर्मित मूर्तियों को देखकर ये आभाष होता है कि बाद में यहां लाल बलुआ पत्थरों का मूर्ति कारखाना रहा होगा। मेंढक मगरमच्छ कछुवे मोर आदि की मूर्तियां इसी की ओर इशारा करती हैं।
विभिन्न जीव -जन्तुओं की मुखाकृति से इसके अंग-प्रत्यंग निर्मित होने के कारण प्रतिमा में रौद्र भाव संचारित है। प्रतिमा समपाद स्थानक मुद्रा में प्रदर्शित है। इस महाकाय प्रतिमा के रूपांकन में गिरगिट, मछली, केकड़ा, मयूर, कच्छप सिंह आदि जीव- जन्तु तथा मानव मुखों की मौलिक प्रकल्पना युक्त रूपाकृति अत्यंत ओजस्वी है। इसके शिरोभाग पर मंडलाकार चक्रों में लिपटे हुये गिरगिट के पृष्ठ भाग से नासिका रंध्र, सिर से नासाग्र तथा पिछले पैरों से भौंह निर्मित है। बड़े आकार के मेंढक के विस्फारित मुख से नेत्र पटल तथा कुक्कट के अंडे से नेत्र गोलक बने है। छोटे आकार के प्रोष्ठी मत्स्य से मूंछे तथा निचला ओष्ठ निर्मित है। बैठे हुए मयूर से कान रूपायित हैं।कंधा मकर मुख से निर्मित है। भुजायें हाथी के शुंड के सदृश्य हैं तथा हाथों की अंगुलियां सर्प मुखों से निर्मित हैं। वक्ष के दोनों स्तन तथा उदर भाग पर मानव मुख दृष्टव्य है। कच्छप के पृष्ठ से कटिभाग, मुख से शिश्न और उसके जुड़े हुये दोनों अगले पैरो से अंडकोष निर्मित है। अंडकोष पर घंटी के सदृश्य जोंक लटके हुये हैं। दोनों जंघाओं पर हाथ जोड़े विद्याधर तथा कटि पाश्र्व में दोनों ओर एक-एक गंधर्व की मुखाकृति है। दोनों घुटनों पर सिंह मुख अंकित है। स्थूल पैर हाथी के अगले पैर के सदृश्य हैं। प्रमुख प्रतिमा के दोनों कधों के ऊपर दो महानाग पाश्र्व रक्षक के सदृश्य फन फैलाये हुए स्थित है। पैरों के समीप उभय पाश्र्व में गर्दन उठाकर फन काढ़े हुए नाग अनुचर दृष्टव्य हैं।प्रतिमा के दांये में स्थूल दण्ड का खंडित भाग बच हुआ है। उनके आभूषणों में हार, वक्ष- बंध तथा कटिबंध नाग के कुंडलित भाग से रूपायित हैं । वर्णित प्रतिमा के बांये हाथ में स्थित आयुध, दायें पैर के समीप स्थित नाग तथा अधिष्ठान भाग भग्न है।
सन 76-77 तक इस मंदिर का अधिकांश भाग मलबे में ढका मिला था। एक बात और गौरतलब है कि खुदाई में प्राप्त प्राचीन मंदिर ईंटों का बना हुआ है जबकि मूर्तियां पत्थर की। मंदिर परिसर दो नदियों के संगम पर स्थित है। चारों ओर सुंदर हरा भरा पार्क है। बगल में ही एक नया मंदिर बना है जिस पर नदी की ओर घाट बना दिया गये हैं। नदी को रोककर एक छोटा सा एनिकट बना दिया गया है जिस पर लोग गाडियों सहित गुजरते हैं।नदी के घाटों पर भी बहुत सारे जलीय जीवों एवं देवी देवताओं का अकंन साबित करता है कि सनातन प्रकृति के अलावा और कुछ नहीं है। 
शहर की आपाधापी से दूर एकांत जगह पर नदी के किनारे यह स्थल बहुत ही रमणीक है। यहां आकर मन प्रशन्न हो गया। समय की कमी थी । शाम को ही घर लौटना था। राकेश भाई ने औनलाईन टिकट कन्फर्म करा दी थी। सुवह तक धौलपुर पहुंचना बहुत जरूरी था।




















छत्तीसगढ की यात्रा अगली बार होगी ढंग से तो। ये तो बस छूना भर ही था क्यूं कि छत्तीसगढ तो खजाना है। जो भी लोग असली सनातनी पंरपरा को जानना चाहते हैं छत्तीसगढ जरूर जायें। मैं इस बार होली पर जाऊंगा। 

Thursday, January 26, 2017

Amarkantak tour: नर्मदा कुंड

अमरकंटक धाम ।।

कहा जाता है कि नर्मदा भगवान शिव की पुत्री जीवनदायिनी नदी है। रेवा नर्मदा का दूसरा नाम है और नर्मदा को माँ क्यूँ कहा जाता है, ये बात गुजरात, मध्य प्रदेश, और छत्तीसगढ़ के बियाबान जंगलों के गर्मी से तपते हुए ‘आदिवासियों’ से बेहतर कोई नहीं जानता। नर्मदा नदी पुरे भारत की प्रमुख नदियों में से एक ही है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश और गुजरात की जीवन रेखा कहलाती है। मैकाल या महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। इसकी लम्बाई प्रायः 1310 किलो मीटर मानी जाती है।
शीघ्र ही हम अमरकंटक के पहले और मुख्य बिदुं नर्मदा के उदगम स्थान पर पहुंच गये। पंडों की ऊटपटांग कारस्तानी देखकर यहां भी मुझे बडा दुख हुआ कि जिस पठार के नीचे से नर्मदा का पानी निकल रहा था बहां एक छोटा सा कुंड और ढेर सारे मंदिर खडे कर दिये है कि बेचारी माता का दम घुटने लगा है। स्वतंत्र रुप से विचरण कर ही नहीं पा रही वो। कुंड में तो हमें नर्मदा मां के दर्शन न हो पाये कितुं थोडा आगे बढकर एक चौडा मैदान बना दिया गया है जहां शांति से बहती हुई मां के दर्शन कर सकते हैं आप। अलस गति से बहती शांत, नीरव नर्मदा। नदी बहती हुई भी रुकी सी जान पड़ती है और उसके बाद फिर एक छोटी सी धारा के रूप में चली गयी है सीधे कपिलधारा की ओर। नर्मदा तट के छोटे से छोटे तृण और छोटे से छोटे कण न जाने कितने परव्राजकों, ऋषि मुनियों और साधु संतों की पदधूलि से पावन हुए होंगे। यहां के वनों में अनगिनत ऋषियों के आलम रहे होंगे। वहाँ उन्होंने धर्म पर विचार किया होगा, जीवन मूल्यों की खोज की होगी और संस्कृति का उजाला फैलाया होगा। हमारी संस्कृति आरण्यक संस्कृति रही।
हमें बहुत से लोग ऐसे भी दिखे जो गुजरात से मां नर्मदा की पैदल परिक्रमा करते आये थे। कभी चट्टानों से जूझते, कभी झाड़ी से उलझते तो कभी सामने तट की पर्वत-माला से आते हवा के झोंकों का आनंद उठाते आगे बड़ रहे थे। कभी रुक जाते माथे का पसीना पोंछते और बाबा लोग , नंगे पाँव , महिला – पुरुष सब एक साथ। गुजरात में अरब की खाड़ी (भड़ूच)  से अमरकंटक तक – 2600 किलोमीटर लम्बी पदयात्रा |
नर्मदा के उदगम कुंड और उसके चारों ओर बने मंदिरों को घूमने निहारने के बाद मैं काफी देर तक यही ढूंडता रहा कि ये पानी आ कहां से रहा है। सोचा शायद पीछे कोई पहाडी से बह कर आ रहा हो कितुं पीछे भी गया तो बहां पानी की एक बूंद तक न मिली। दर असल यह पवित्र जल अत: प्रवाही धारा से निकल रहा था जहां कि गोमुख बना दिया गया था और ढेर सारे मंदिर बना दिये गये थे मानो कि प्रकृति के उपहार का टैक्स वसूल रहे हों। नर्मदाकुंड नर्मदा नदी का उदगम स्‍थल माना जाता है। इसके चारों ओर अनेक मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों में नर्मदा और शिव मंदिर, कार्तिकेय मंदिर, श्रीराम जानकी मंदिर, अन्‍नपूर्णा मंदिर, गुरू गोरखनाथ मंदिर, श्री सूर्यनारायण मंदिर, वंगेश्‍वर महादेव मंदिर, दुर्गा मंदिर, शिव परिवार, सिद्धेश्‍वर महादेव मंदिर, श्रीराधा कृष्‍ण मंदिर और ग्‍यारह रूद्र मंदिर आदि प्रमुख हैं। पूछने पर बताया जाता है कि भगवान शिव और उनकी पुत्री नर्मदा यहां निवास करते थे और नर्मदा उदगम की उत्‍पत्ति शिव की जटाओं से हुई है, इसीलिए शिव को जटाशंकर कहा जाता है। नर्मदा कुण्ड और मंदिर, नर्मदा नदी का उद्गम यहीं है जबकि हकीकत ये है कि माता नर्मदा ने भी इन पंडो की ठेकेदारी से व्यथित होकर अपना रास्ता बदल लिया है। उदगम परिसर के मुख्य गेट के सामने ही नहाने के लिये सीढियां भी बनायीं गयीं हैं और थोडा आगे जाकर मैदान को चौडा कर नर्मदा को फैलने का अवसर भी प्रदान कर दिया गया ताकि लोग उसमें वोटिगं कर सकें । हालांकि थोडा ही आगे निकलने पर नर्मदा पुन: एक नाली के समान बहने लगती है और कपिलधारा तक ऐसे ही बहती है। कपिलधारा के झरने में पहली वार नर्मदा का असली स्वरुप नजर आता है।
अमरकंटक की यात्रा में नर्मदाकुंड मंदिर , श्रीज्वालेश्वर महादेव, सर्वोदय जैन मंदिर, बौद्ध मंदिर, सोनमुदा ,कबीर चबूतरा , कपिलाधारा दूध धारा एवं कलचुरी काल के मंदिर आदि पवित्र स्थान न केवल धार्मिक , आध्यात्मिक स्थल हैं बल्कि प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर हैं। बौद्धिक विचारकों एवं विद्धानों के लिये भी ये स्थान महत्वपूर्ण रहा है। यहाँ पर दुर्वासा, मेकल, व्यास, भृगु और कपिल आदि ऋषियों ने तप किया था। तपस्वियों, योगियों और ध्यानियों के लिए अमरकंटक बहुत ही महत्व का स्थान है। इस पवित्र धाम का उल्लेख न केवल मेघदूतम में है बल्कि रामायण और महाभारत में भी है।
नर्मदा कुंड मैन गेट से बाहर निकलते ही हमें एक सुंदर हरा भरा पार्क और उसमें बने कलचुरी काल के प्राचीन मंदिर नजर आते हैं जहां भीड न के बरावर थी। आजकल भक्त लोग प्राचीन वास्तु या मूर्ति कला में कम और आजकल के किचकिचाते तंग मंदिरों में चढावा चढा कर जल्दी से स्वर्ग की सीट पक्की कराने में ज्यादा विश्वास करते हैं। खैर मुझे तो हमेशा ऐसे ही मंदिरों में सुकून मिलता है ।
नर्मदाकुंड के दक्षिण में कलचुरी काल के प्राचीन मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों को कलचुरी महाराजा कर्णदेव ने 1041-1073 ई. के दौरान बनवाया था। मछेन्‍द्रथान और पातालेश्‍वर मंदिर इस काल के मंदिर निर्माण कला के बेहतरीन उदाहरण हैं।
कर्णदेव मंदिर भी अमरकंटक की वेहतरीन वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। शाम होने जा रही थी और हमें अभी बहुत सी जगह जाना था अत: जल्दी से निकल पडे सौन नदी के उदगम स्थल की ओर । हालांकि अमरकंटक जैसे सुंदर और पवित्र धाम के लिये कम से कम तीन चार दिन का समय निकालना चाहिये अन्यथा भागमभाग में आनंद नहीं आ पाता।
ऐसे तो पूरा अमरकंटक ही एक सुंदर बगीचा है पर मां की बगिया माता नर्मदा को समर्पित है। कहा जाता है कि इस हरी-भरी बगिया से स्‍थान से शिव की पुत्री नर्मदा पुष्‍पों को चुनती थी। यहां प्राकृतिक रूप से आम, केले और अन्‍य बहुत से फलों के पेड़ उगे हुए हैं। साथ ही गुलबाकावली और गुलाब के सुंदर पौधे यहां की सुंदरता में बढोतरी करती हैं। यह बगिया नर्मदाकुंड से एक किमी. की दूरी पर है बिना कोई समय गंवाये हम निकल लिये सीधे सोनमुदा की ओर।