Monday, October 31, 2016

My Nepal bike tour part 3

नेपाल बाईक टूर तीसरा दिन (22 October)
लखीमपुर खीरी से नेपाल बौर्डर एवं भालुबांग ।।
नेपाल यात्रा का तीसरा दिन मेरे लिये बहुत ज्यादा मायने रखता है। जीवन में पहली बार विदेशी धरती पर कदम रखने का मौका जो मिलने बाला था मुझे।
सुबह ही
मित्र कौशलेन्द्र को अपने स्कूल निकलना था और मुझे नेपाल की तरफ । पुराने ofसंघर्ष भरे दिनों की याद में हम दोनों इस कदर खो गये थे कि इस बार फिर लेट हो गया मैं। लगभग आठ बजे निकल पाया। लखीमपुर खीरी से ननपारा और ननपारा से नेपाल बौर्डर्। करीब एक सौ दस किमी है। लखीमपुर से ननपारा और भारत नेपाल सीमा तक का हाईवे एकदम शानदार है। गाडी चलती नहीं उडती है। बैसे भी लखीमपुर खीरी जिला काफी हरियाली बाला है। सडक के दोनों ओर काफी घने पेड पौधे और दूर दूर तक फैले हुये हरे भरे खेत। कुछ खेतों में धान की कटाई भी चल रही थी। थोडा आगे निकलते ही शारदा नदी मिली और फिर उससे थोडा आगे चलकर घाघरा नदी। दोनों नदिया थोडा आगे चलकर बहराईच में मिल जातीं हैं और थोडा आगे चलकर अयोध्या फैजाबाद में सरयू नदी कहलाती है। ननपारा से पहले एक घना बन्यजीव अभ्यारण भी मिला। करीब दस बजे ननपारा पहुंच गया था। ननपारा में ही वाईक सर्विस करायी और एटीएम से पैसे भी निकाले। पहली बार परायी धरती पर जा रहे हैं, पर्याप्त रुपये साथ रहते हैं तो हिम्मत रहती है। भारत नेपाल सीमा पर स्थित बहराईच जिले का ननपारा भारत का काफी बडा कस्वा है।
नेपालगंज बौर्डर पर करीब बीस मिनट लगे। वाईक के कागज चैक कराये और एक सौ चौदह नेपाली के हिसाब से वाईक का टैक्स भी दिया। वाईक का टैक्स भरते समय मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं विदेश यात्रा पर हूं वरना तो यहां का खान पान रहन सहन बोली भाषा सब कुछ हमारे जैसी ही है। लोग हिंदी और नेपाली खूब बोलते हैं। चूंकि पर्यटन ही नेपाल का सबसे बडा व्यवसाय है लोग बहुत सम्मान करते हैं पर्यटकों का।
भारत से नेपाल की मुद्रा भले ही थोडी कम हो लेकिन बात बराबर ही पडती है। मंहगाई भी उतनी ही है। हर सामान MRP रेट से बढकर ही मिलती है। एक आमलेट सौ नेपाली की है जबकि  भारत में तीस रुपये की है। पैट्रोल सौ नेपाली रुपये प्रति लीटर है, भारत से थोडा सा ही सस्ता पडता है। बौर्डर पर ही भारतीय रुपयों का नेपाली में एक्सचेंज कराना ठीक रहता है। छोटे दुकानदार भारतीय रुपया नहीं लेते। बैसे भी हजार और पांच सौ के नोट इधर चलते नहीं। मैंने चार हजार रुपये के एक्सचेंज कराये थे। करीब चौंसठ सौ नेपाली रुपये मिले मुझे। एक हजार में सोलह सौ नेपाल के हिसाब से। हमारा दस रुपया यहां सोलह रुपये के बराबर होता है। कोहलपुर या पहले ही पैट्रोल फुल करा लेना चाहिये वरना काफी दूर तक पंप न मिलेगा।
भारत की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर मैं अमृतसर बाघा बौर्डर भी जा चुका हूं पर पाकिस्तान और नेपाल के साथ हमारी सीमाओं में जमीन आसमान का अतंर है। बाघा बौर्डर पर आप उस जमीन पर पैर रखना तो दूर झांक तक नहीं सकते बिना बीजा के और यहां तो रुपडिहा बौर्डर में अदंर घुसने के बाद मुझे पता चला कि मैं नेपाल में हूं। लोग बेरोक टोक आ जा रहे हैं। ननपारा से नेपालगंज के बीच गाडियों की लाईन लगी है। दस मिनट में लोग गाडी का किराया देते हैं और आगे बढ जाते हैं। बिना बाहन बाले तो बैसे ही आ जा रहे हैं। नेपाली फौजी तैनात हैं पर आम तौर पर कोई सख्ती नहीं बरतते। बौर्डर के बाद हाईवे पर मुझे बहुत सारी फौजी चौकियां मिलीं पर पोखरा तक तो किसी ने रोका भी नहीं। दोस्त और दुश्मन पडौसी में शायद ये ही फर्क है। नेपालगंज बौर्डर पर बैठे कस्टम अधिकारी एकदम जमीन से जुडे बुजुर्ग। मृदुभाषी । कहने लगे आप हमारे मेहमान हैं। आपकी मदद करना हमारा फर्ज है। मैंने साथ फोटो भी खिंचाया पर बगल में बैठी फौजिन शरमा कर दूर चली गयी और मुझे फोटो के लिये मना करने लगी।
बौर्डर से नेपालगंज एवं कोहलपुर तक का रास्ता बहुत जानदार मिला। बहुत चौडा रोड और धूल का नामोनिशां नहीं। चारों तरफ सिर्फ हरियाली ही हरियाली। बौर्डर से मात्र बीस किमी दूर कौहलपुर शहर में नेपाल का एकमात्र और सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग महेन्द्र मार्ग मिल जाता है जो नेपाल के पश्चिम में स्थित पीलीभीत खटीमा से लेकर पूर्व में सिक्किम के सिलचर तक पार चला जाता है। नेपाल का महेन्द्र राजमार्ग जिसकी Length: 1,027.67 km (638.56 mi) नैनीताल या पीलीभीत के नजदीकी नेपाली शहर भीमदत्त से सिक्किम सीमावर्ती  कांकरविट्टा या Mechinagar तक जाता है। हालांकि बीच में अन्य राजमार्ग भी इसे क्रास करेंगे। जैसे
Tribhuvan Highway at Hetauda
Prithvi Highway at Bharatpur
Siddhatha Highway at Butwal

बीच में कुछ destinations भी पडेंगे जैसे Damak, Itahari, Hetauda, Bharatpur, Narayangarh, Butwal, Kohalpur ।।
महेन्द्र राजमार्ग को East West Highway पूर्व पश्चिम राजमार्ग नेपाल के तराई क्षेत्र को पार करता हुआ देश का सबसे लंबा हाईवे है जो भारतीय CPWD/PWD India engineers की देन है।
कोहलपुर के चौराहे पर एक तरफ बर्दिया बन्य जीव अभ्यारण का घना जंगल है और दूसरी तरफ बांके राष्ट्रीय निकुंज है। The Bardiya National Park बर्दिया राष्ट्रिय निकुञ्ज, 968 km2 (374 sq mi) में फैला हुआ
नेपाल की तराई क्षेत्र में करनाली नदी के पूर्वी तट पर एवं बबाई नदी द्वारा विभाजित सबसे बडा नेशनल पार्क है जो बांके नेशनल पार्क से जुडा हुआ है और अपने alluvial grasslands, subtropical moist deciduous forests,tigers, wild elephants and one-horned rhinos 30 , species of mammals, 250 species of birds,  endangered Bengal florican and sarus crane, Gharial and marsh mugger crocodiles and Gangetic dolphins के अलावा rafting and canoe trips along the Geruwa River, the eastern channel of the Karnali River के लिये भी जाना जाता है। Bardia National Park , नेपाल के Maoist insurgency के दौरान काफी डिस्टर्ब्ड रहा था किंतु अब सब ठीक है जबकि बांके नेशनल पार्क  550 km2 क्षेत्र में Banke, Salyan and Dang जिलों में फैला हुआ है।
यही हाईवे पश्चिमी राप्ती नदी के सहारे सहारे लालमटिया तक और फिर बुटवल और आगे की तरफ बढता जाता है। राप्ती नदी का साथ लमही, लालमटिया से थोडा आगे भालुबांग तक ही मिलेगा। लालमटिया के नजदीकी पहाडों से ही ये राप्ती नदी निकलती है जो पहले घाघरा में और फिर आगे जाकर गंगा में मिल जाती है। राप्ती नदी (या पश्चिमी राप्ती) मध्य नेपाल के दक्षिणी भाग की निचली पर्वतश्रेणियों में प्यूथान नगर के उत्तर से निकलती है। गंगा के मैदान में उतरने से पूर्व यह कुछ दूर तक शिवालिक पर्वत के समांतर पश्चिम दिशा में बहती है और मैदानी भाग में पूर्व एवं दक्षिण-दक्षिण-पूर्व दिशाओं में प्रवाहित होकर बरहज नगर (जिला देवरिया, उत्तर प्रदेश) के समीप घाघरा नदी से मिलती है। यह उत्तर प्रदेश के बहराइच, गोंडा, बस्ती एवं गोरखपुर जिलों के धान एवं गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के मध्य से होकर बहती है। बाँसी एवं गोरखपुर इस नदी पर स्थित मुख्य नगर हैं। इसकी सहायक नदियों में मुख्यत: उत्तर के तराई प्रदेश से निकलनेवाली छोटी छोटी अनेक नदियाँ हैं। नदी की कुल लंबाई ६०० किलोमीटर है। यह गोरखपुर से नीचे की ओर बड़ी नौकाओं द्वारा नौगम्य है। जबकि पूर्वी राप्ती एक छोटी सी नदी है जो नेपाल के चितवन घाटी (भीतरी तराई) से पश्चिम की ओर प्रवाहित होकर अन्ततः भारतीय सीमा से थोड़ा पहले नारायणी (गण्डकी) में मिल जाती है।
फिर भी दिन भर में काफी कवर कर लिया और दिन भर में करीब तीन सौ किमी वाईक खेंच ली। कोहलपुर से लमही तक बांके बन्य जीव अभ्यारण का घना जंगल और ऊंची नीची रोड चलती रही और मैं नेपाल की हरी भरी पहाडियों में दौडता रहा। सोचा था कि रात होने से पहले लुम्बिनी वन , महात्मा बुद्ध की जन्म स्थली, पहुंच जाऊंगा पर लमही निकलते निकलते अंधेरा हो चला था और सामने करीब चालीस किमी का पहाडी घना जंगल था। घने जंगल और पहाडों में रात को चलना ठीक न होगा,ये सोच कर लमही से थोडा आगे लालमटिया पार कर राप्ती नदी के तट पर भालुबांग नामक तिराहे पर मात्र तीन सौ नेपाली रुपये में कमरा मिल गया। यहां लोगों ने घर को ही होटल दुकान आदि बना रखा है। इस दुकान पर रहने खाने से लेकर सभी सुविधायें मिलेंगी। शराब और मांसाहारी भोजन तो यहां आम बात है लेकिन शाकाहारी भोजन हर जगह मिलेगा। शराब तो इतनी कौमन है कि लगभग हर दुकान पर मिलेगी। एक क्वार्टर साठ से लेकर पांच सौ नेपाली तक हर ब्रांड मौजूद है। अंग्रेजी की बजाय नेपाली शराब ज्यादा चलती है। अंग्रेजी में रौयल स्टेग का एक क्वार्टर साढे तीन सौ नेपाली में आता है। नास्ते में आमलेट फिश मोमोज पकौडे आदि हैं। आमलेट सौ रुपये की है। शाकाहारी भोजन भी मिलेगा। सारा सामान भारत से ही आता है इसलिये थोडा मंहगा पडता है।
सुवह के पांच बजे ही लुम्बिनी के लिये निकलने बाला था पर  थोडा अंधेरा था। जंगल भी पार करना था। थोडा उजाला हो जाय तब चलना ठीक रहेगा। बैसे तो कोई डर नहीं है, नेपाली लोग काफी मेहनती और ईमानदार होते हैं पर जंगली जानवरों का कोई ईमान नहीं होता। भूख लगी हो तो आदमी का भी नास्ता कर डालते हैं।


Sunday, October 30, 2016

My bike tour of Nepal part 2

नेपाल बाईक टूर : दूसरा दिन (21 October)
मथुरा से लखीमपुर खीरी तक :
घुमक्कडी पर निकलते समय हमेशा सुवह जल्दी ही घर छोड देना चाहिये पर मैं मथुरा से निकलते थोडा लेट हो गया था। घुमक्कड को समय का पाबंद होना चाहिये। सुबह पांच बजे तक निकल पडना चाहिये अपने सफर पर जबकि मुझे मथुरा से निकलते निकलते नौ बजे गये थे और फिर रास्ते में एक घुमक्कड मित्र नरेश चौधरी मिल गया। हाईवे पर गांव है। अपने घर ले गया। खाने की बहुत जिद की मगर मैंने खाने की बजाय मट्ठा पीना और बोतल में रखना मुनासिव समझा। मथुरा से निकलते निकलते दस बज गये थे। मथुरा से हाथरस बदायूं कासगंज होते हुये शहजहांपुर मुहम्मदी और फिर लखीमपुर खीरी पहुंचना था। लखीमपुर खीरी तक रात होने से पहले पहुंच जाना चाहिये था कितुं देरी पर देरी होती गयी। बीच में रास्ता भी थोडा खराब मिला था। बीच में गंगा जी का कछला घाट भी पडा। गंगा जी में स्नान किये बिना आगे बढना मेरे लिये नामुमकिन था। पानी का तो कीडा हूं मैं। मैं तो जीता ही पेड पोधों और नदियों के जल में हूं। और फिर गंगाजी की तो बात ही अलग है। गंगाजी को मैया क्यूं कहते हैं इस बात का उत्तर तो आप गंगा तटीय क्षेत्रों का भ्रमण करके ही पायेंगे। पूरे यूपी बिहार बंगाल की धन संपदा गंगा मैया की ही देन है। संयोग कुछ ऐसा रहा कि इस बार मैंने गंगा जी को करीब सात आठ बार पार किया होगा। कछला घाट पर गाडी को भी स्नान कराया और खुद भी किया। घाट तो सोरों में भी है पर जल ठहराव लिये है जबकि कछला में गतिमान है एवं घाट पर समुद्री बीच जैसा है।
सोरों से निकलते निकलते शाम के तीन बज चले थे जबकि लखीमपुर खीरी अभी बहुत दूर था। फिर भी खूब गाडी दौडाई और रात को नौ बजे लखीमपुर खीरी पहुंच गया जहां मेरा दोस्त कौशलेन्द्र गुर्जर मेरा इंतजार कर रहा था।

बदायूं के बाद मुहम्मदी से लेकर लखीमपुर का रास्ता तो सुभानअल्ला! इतना जानदार कि बस पूछो मत ! वाईक हवा में उडती चली गयी। सडक के दोनों तरफ घनी हरियाली । धूल का नामोनिशां नहीं। रात का सफर । एकदम मस्त । मजा आ गया। कुल मिलाकर रात नौ बजे तक शिक्षक मित्र कौशलेन्द्र के कमरे पर पहुंच गया। ये वो ही शिक्षक मित्र है जिसने मेरे साथ कभी बेरोजगारी के झटके खाये थे। बहुत व्याकुल था नौकरी के लिये। इससे थोडा पहले ही मेरी नौकरी लग गयी तो और व्याकुल हो गया। मैं हिम्मत बंधाता रहता, चितां न कर, मई जून की तपिश के बाद सावन की फुआरें जरूर आयेंगी। उसके घर देर है अंधेर नहीं।

Saturday, October 29, 2016

My bike tour of Nepal : part 1

नेपाल बाईक टूर ।।
20 October  पहला दिन : धौलपुर टू मथुरा ।।।।

जाने कितनी बार नेपाल की यात्रा का प्लान बना होगा किंतु हर बार बस यही सोच कर रह गया कि गोरखपुर के बाद बस या टैक्सी में कैसे चल पाऊंगा मैं। बस हो या बंद कार मुझे काल समान लगती हैं। मनाली से रोहतांग तक के मात्र एक घंटे के सफर में मेरी जान निकल गयी थी जबकि यहां तो पूरे छ दिन सिर्फ बस में ही चलना था, नेपाल में ट्रैन्स हैं ही नहीं। चाहे कुछ भी हो जाय, जाऊंगा तो वाईक से ही, सोच लिया था। तीन हजार की इतनी लम्बी वाईक यात्रा के लिये कोई मेरे जैसा पागल घुमक्कड ही मेरा पार्टनर बन सकता है, आम शौकिया पर्यटक तो चक्कर खाकर गिर पडेगा। जैसे तैसे पडौसी शिक्षक भगवती शर्मा साथ चलने को तैयार भी हुआ पर मुझे पता था कि ये ऐन टाईम पर पलटी मार सकता है। जैसे ही इसके घर बालों को पता चलेगा कि तीन हजार किमी वाईक पर चलना है, घरबाले इसकी चुटिया खेंच लेंगे। और हुआ भी वही, बीस की सुवह निकलने से थोडा पहले ही मुंह लटकाता हुआ आया, अरे यार हमारा तो प्रोग्राम कैंसल है, घरबाले डांट रहे हैं। हहहहहह मुझे पहले ही पता था पर हम कहां रुकने बाले हैं, राही को साथी तो मिलते रहते हैं, यहां नहीं तो आगे मिलेंगे। और फिर कोई मिले न मिले, बस बढते जाना है। गब्बर कहता था कि जो डर गया वो मर गया पर मैं कहता हूं जो थम गया वो जम गया।
बीस को मथुरा में संजू की बच्ची का बड्डे फंक्शन था, दिल्ली से दोस्त भी आ रहे थे तो सोचा कि मथुरा होते हुये ही निकला जाय। बैसे भी नेपाल को लम्बाई में पार करने की ठान रखी थी। समय की कमी के चलते हालांकि पूरा तो पार न कर पाया पर तब भी काफी भाग कवर कर लिया।
अधिकांशत: पर्यटक बस लुम्बिनी बुटवल पोखरा काठमांडू के त्रिकोण में ही सिमट कर रह जाते हैं और भ्रमण स्थल हैं भी यही मुख्य तो पर हमें तो सडकें नापने की आदत है।
दिल्ली से आये दोस्तों को यमुना एक्सप्रैस वे पर बंद एसी कार में पता भी न चल पाया होगा कि यात्रा कहते किसे हैं ? मथुरा आने पर सोचा कि इन शहरी लोगों को गांव की गलियों में वाईक पर घुमा लाऊं । गांव भी कोई ऐसा बैसा नहीं , वो गलियां जिनमें बाल गोपाल बंशीवारे मोहन प्यारे अपनी सखियों सखाओं के साथ खूब मौज मस्ती किया करते थे, गायें चराया करते थे, यमुना के किनारे किनारे गोकुल की कुंज गलियों में घूमते हुये और रमण रेती की हरियाली में विचरण करते हुये मन को जो आनंद प्राप्त होता है उसे शहरी आदमी कुछ ज्यादा मेहसूस कर सकता है।
लेकिन लौटते हुये कहने लगे, मात्र दस किमी की वाईक यात्रा में हमारा ये हाल है, तुम्हारा हजारों किमी में क्या हाल होता होगा ?
दोस्त लोग कहते हैं कि इतना सफर कर कैसे लेते हो, सफर में तो बहुत सफर करना पडता है। बैसे ये सच भी है। घुमक्कडी में आनंद केवल एक जुनूनी घुमक्कड ही प्राप्त कर सकता है, सामान्य पर्यटक नहीं , घुमक्कडी तो कष्ट का दूसरा नाम है। पर हमें उस दर्द में भी सुकून मिलता है। एक मां भी दर्द झेलती है पर हर मां उस दर्द में आनंद प्राप्त करती है। दर्द न हो तो वो जननी ही न बन पाये।
आनंद भैया के शब्दों में कहूं तो यात्रा... एक अनुभव है, देशकाल का अनुभव। साथी कैसे होंगे, ये तो किस्मत है।
खुली खिड़कियां आपको कुदरत से सीधा जुड़े रहने का मौका देतीं हैं। वातानुकूलित बंद दुनिया में सबकुछ बंद ही होता है। लोगों के दिल भी। सुविधाए जैसे जैसे बढती जातीं हैं, लोग सिमटते जाते हैं, कटते जाते हैं।
बंद डिब्बे की यात्रा में बच्चे, पूरी यात्रा बस फोन पर गेम्स खेलते बिता देते हैं। बदलती जगह के मुताबिक बदलते हालात के बारे में समझ, बढ़ती ही नहीं उनकी। यात्रा केवल दूरी तय करना नहीं है। वो बदलते स्थान के साथ, बदलते तापमान, आवाज, गंध, नजारे, सबके अनुभव की यात्रा होती है।
सूर्यमुखी के खेतों से गुजरते, एक खास गंध से भरे जीवन से गुजरने का अनुभव होता है। फर्क तापमान का भी होता है और आद्रता का भी। ऐसा हर खास स्थान के साथ होता है। यही तो अनुभव है। अन्यथा बच्चों को, टीवी, सिनेमा कंप्यूटर के पर्दे... और सच्चाई में अंतर ही समझ नहीं आता है। हो ऐसा ही रहा है।
भारत एक ठंडा बंद डब्बा नहीं है। वो विविधताओं से भरा बेहद खूबसूरत देश है। और देशप्रेम, कागज, फोन, कंपूटर और क्रिकेट के मैदान में नहीं... देश में फैला है। नये लोग... भारत से प्रेम, इसके अनुभव से नहीं सीख रहे, वे इसे, बस तिरंगा डीपी और प्रोफाइल पिक्चर करने को समझ रहे हैं। और इसी के बूते दुनिया जीतना चाहते है।
फ्लाइट... बस दो घंटे में पूरा शिवालिक, विध्याचल, चंबल और कोंकन रेंज पार कर लेती है। लेकिन इससे, धरती पर लाखों बरस की प्रक्रिया से बनी भौगोलिक रचनाओं का वजूद और अहमियत खत्म नहीं हो जाती। वो वैसे ही प्रभावशाली बनी रहती हैं।
और अगर इन्हें सही से जीना हैं तो सफर में सफर तो होना ही पडेगा।
इस बार श्री राम की ससुराल, सीता मैया की जन्मभूमि और पशुपतिनाथ जी की पावन धरा के भ्रमण का इरादा है।

Tuesday, October 4, 2016

पुत्र मोह


केवल धैर्यवान ही पढें। पोस्ट लंबी, धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक है। छुई मुई जैसी धार्मिक आस्था बाले बंधु न पढें तो ही बेहतर है। डेंगू के मच्छर ने मेरा सारा खून चूस रखा है, आपकी गालियों को सहने लायक भी शक्ति नहीं बची है। फिर भी मन न माने तो मुझे ही देना, घरबालों को न देना क्यूं कि वो भी आपकी तरह धार्मिक बीमार हैं। घरबाली तौ इतनी धार्मिक है कि मेरी पोस्ट पढकर रोज काली देवी की तरह जीभ लपालपाकर चंडी रूप धारण कर छाती पर पैर रख चिल्लाती है," हे दुष्ट राक्षस ! हे महिषासुर के नवीनतम विकृत मौडल, शामत आयी है तेरी!  मैं उसे याद दिलाता हूं कि हे मेरे चरणों की दासी, प्राणों की प्यासी , काली और दुर्गा की सयुंक्तावतार देवी चार दिन बाद करवा चौथ का वृत किसके लिये रखेगी फिर ? तेरी लिये साडी और श्रंगार आइटम कौन लायेगा फिर ? तब जाकर उसका रूख कुछ नरम पडता है और करम फोडते, कजरी सा मुंह बनाते बडबडाती हुई रसोई की तरफ गति कर गयी कि हे भोलेनाथ ये ही दिन देखने लिये तुझपे लोटे लुढकाये थे। ऐसी भी क्या जल्दी थी ? दो चार सोमवार और सब्र कर लेती मैं तो , कम से कम किसी इंसान से तो व्याह कराता मेरा ? मेरे करम फूट गये । ये महाभैंषासुर क्यूं लिख दिया तूने मेरे करम में ?
नवरात्रे की पहली रात को मेरी प्राणप्यारी ने वृत रखा था। पूरे दिन भूखे मरी और मैं खा पीकर मस्त फेसबुक पर काल्पनिक मैया और उसके नकली उपासकों की मजाक बना रहा था। उसी रात मुझे तेज बुखार आया। पर मैंने घर में किसी को न जगाया। दूसरे दिन सुवह ही नीचे से ऊपर तक सब जाम। भयंकर दर्द । पूरी तरह विकलांग । लैट्रिन में भी न बैठ सका। काश खडे खडे निबटने का कोई सिस्टम भी अंग्रेजों ने बनाया होता। बिना फ्रैस हुये ही बाहर आ गया तो मेरी प्रिये प्राणेश्वरी के चेहरे पर चंडी के से भाव देख कर समझ गया कि आपातकाल शुरू होने बाला है। कोई पारिवारिक विपदा आने बाली है। इससे पहले कि उसकी गुस्सा शांत कर पाता,
फूट पडी," और करो मैया का अपमान ! अभी तो देखो क्या क्या होता है ! अभी तो मैया ने डेंगू का मच्छर ही भेजा है, कल को भैंरोबाबा का कुत्ता भी भेजेगी और उसके काटने से भी कुछ न हुआ तो अपना शेर भेजेगी।"
हहहहह अरर मेरी प्रीतम प्यारी, मेरी राजकुमारी, बडी भोली है री तू बेचारी ! नाम भी लिया तो किसका ? उस पियक्कड भैंरो का ? उस राक्षस का जिसकी बजह से तेरी मैया पहाडों की गुफा में नौ महीने तक दुबकी पडी रही ? भला हो उस नारी शक्ति का जिसने उसकी गर्दन उडाकर तीन किमी ऊपर लटका दिया वरना उस कमबख्त राक्षस को भी बाप कहकर पूजना पडता। प्रीतम प्यारी का मुंह सूजकर जयललिता सा हो गया।


ना चाहते भी दिन भर प्राणेश्वरी सेवा करती रही। बाबूजी पूरे दिन मेरे साथ बैठे रहे। शाम को दोस्त भगवती शर्मा गाडी में पटक कर डाक्टर के पास ले गया। चार हजार की जांच और दवाई लाया। घर पर उसने ही इंजैक्शन और ड्रिप लगायी। इंजैक्शन इतने हैवी थे कि ड्रिप बहुत स्लो चढानी पडी। रात के तीन बजे तक ड्रिप चढी। मैं फेसबुक पर बकलोली कर टाईम पास करता रहा। बाबूजी हर दस मिनट बाद मेरे कमरे के चक्कर काट रहे थे। नींद और थकान से आखें लाल पडी थीं बाबूजी की। 76 वर्ष की उम्र में इतनी जिंदादिली बहुत कम लोगों में देखी है मैंने।
उसी दिन बडे भैया मम्मी का औपरेशन कराने लखनऊ ले जा रहे थे। बाबूजी का भी रिजर्वेशन था। बुढापे में बेटे की अपेक्षा पत्नि से अधिक प्रेम होता है लेकिन बाबूजी ने लखनऊ जाने से साफ मना कर दिया। बोले कि मैं अपने बेटे को बीमार छोडकर नहीं जा सकता । मेरी लाख जिद करने पर बोले,
" तेरी मम्मी के साथ उसका सिपाई बेटा है न ? "
बाबूजी सुवह चार बजे तक जगते रहे। एक बार मैं ड्रिप लटका कर टायलेट गया तो देखा कि सुवह चार बजे बाबूजी ध्यान मग्न थे । शायद ईश्वर से अपने बेटे की सलामती की दुआ कर रहे थे।
मैं बापस आकर सो गया। सुवह जगा तो पता चला कि मैं काफी हद तक चल फिर सकता हूं। बाबूजी अभी सो रहे थे। सर पर हाथ रखा तो पाया कि बाबूजी बुखार में तप रहे थे।
आपने मुगल बंश के संस्थापक बाबर के इंतकाल की कहानी तो अवश्य सुनी होगी जिसने अपने पुत्र हुमायुं के बीमार पड़ने पर अल्लाह से हुमायुँ को स्वस्थ्य करने तथा उसकी बीमारी खुद को दिये जाने की प्रार्थना की थी। ईश्वर ने बाबर की दुआ कबूल कर ली और हुमांयू ठीक होने लगा। इसके बाद  बाबर का स्वास्थ्य बिगडता गया और अंततः वो 1530 में 48 वर्ष की उम्र में जन्नतनशीं हो गया।
लेकिन मेरे बाबूजी एक जिंदादिल इंसान है। जीवन जाने कितनी मुसीबतों का सामना करके अपनी चारों औलादों को सरकारी नौकर बनाया है। सन्यास आश्रम में भरपूर मस्ती और जिंदादिली है। मरने के नाम पर तो कहते हैं, यमराज की ऐसी तैसी भगा दुंगा मेरे पास फटका भी तो। इसलिये बाबर की पूरी कहानी यहां फिट नहीं होती पर आधी जरूर होती है।
अब सुनाता हूं आपको बाबर की कहानी।

आगरा के चार बाग के बीच में बाबर का अत्‍यन्‍त सुन्‍दर विशाल राजभवन। इसी राजभवन के एक कमरे में बाबर का पुत्र हुमायूँ बीमार पड़ा है। बीमारी धीरे-धीरे बिगड़ती जाती है और उसके साथ हुमायूँ के जीवन की आशा भी क्षीण पड़ती जाती है। बाबर इस समय आगरे से पचास किमी दूर मेरे शहर धौलपुर में है। हुमायूँ की बीमारी की खबर मिलते ही वह आगरे लौट पड़ता है।
दोपहर का समय है। चारों ओर सन्‍नाटा छाया हुआ है और वातावरण से उदासी टपक रही है। बाग के भीतर घुसते ही वहाँ के सन्‍नाटे से बाबर स्‍तब्‍ध हो जाता है। उसके आते ही राजभवन में कुछ हलचल होती है। वह सीधे उस कमरे में पहुँचता है जहाँ हुमायूँ पड़ा हुआ है। माहम बेगम - हुमायूँ की माँ - उसके पलंग के पास बैठी है और चिन्‍ता से उसका चेहरा उतरा हुआ है। बाबर को आया देखकर वह चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी हो जाती है। बाबर एक बार उसकी ओर देखता है और फिर हुमायूँ के बिस्‍तर के नजदीक जाकर खड़ा हो शान्‍त भाव से उसे एकटक देखता रहता है। बाबर [हुमायूँ के सिर पर धीरे से हाथ फेरते हुए धीमी आवाज में] बेटे! बेटे! [हुमायूँ आँखें बन्‍द किए निश्‍चेष्‍ट पड़ा है, कोई उत्तर नहीं देता।"

माहम: [दीन स्‍वर में] जहाँपनाह! मेरे सरताज! आपके कई लड़के हैं, लेकिन मेरा... मेरा यह एक हुमायूँ ही है। चार औलादों में एक यही बच रहा है। मैं अपनी इन्‍हीं बदनसीब आँखों से, एक के बाद दूसरे को, मौत के मुँह में जाते देखती रही हूँ और सीने पर पत्‍थर रखकर सब बर्दाश्‍त करती गयी हूँ, लेकिन आज... अब नहीं...यह आखिरी औलाद... यह कलेजे का टुकड़ा... ! नहीं...नहीं, माँ का दिल इससे ज्‍यादा तंग...नहीं हो सकता... ! मैं अपनी इन बदनसीब आँखों को फोड़ लूँगी, लेकिन हुमायूँ की मौत नहीं देख सकती... नहीं देख सकती! [सिसकने लगती है।]

बाबर : [प्रेम से उठाकर सिर पर हाथ फेरते हुए] माहम! मलका! घबराओ मत!

माहम: [रोते हुए] सरताज! मैं न घबराऊँ तो और कौन घबराये? काश! आपको एक औरत—एक माँ—का दिल मिला होता! मुझे यह धन-दौलत कुछ नहीं चाहिए लेकिन मेरा बेटा... या खुदा! मेरा यह बेटा मुझसे न छीन! एक माँ का दिल तोड़कर—उसकी दुनिया उजाड़कर—तुझे क्‍या मिल जाएगा? मेरे सरताज! मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। जैसे-भी हो, मेरे बेटे को बचाइए। आपको बादशाहत प्‍यारी है, लेकिन मुझे...मुझे मेरा बेटा प्‍यारा है। मेरे सरताज!

बाबर : [रुककर कुछ सोचता हुआ] हजारों आदमियों की जान लेने की ताकत हम में थी लेकिन आज एक आदमी की जान बचाने की ताकत हम में नहीं है। कैसी लाचारी है? [थोड़े आवेश में] किसी इन्‍सान को वह चीज लेने का क्‍या हक है जिसे वह दे नहीं सकता। बादशाहत! बादशाहत! यही बादशाहत है जिसके लिए बचपन से लेकर आज तक हम एक दिन भी चैन की नींद नहीं सो सके। और उसका नतीजा! [लम्‍बी साँस लेकर] सारी दौलत, सारी सल्‍तनत सामने पड़ी है और बादशाह का बेटा दम तोड़ रहा है। कोई तरीका, कोई हिकमत कारगर नहीं हो पाती। यही एक जगह है, जहाँ बादशाह और फकीर में कोई अन्‍तर नहीं रह जाता। हमसे वह कंगाल सौ गुना अच्‍छा जो चैन की नींद तो सोता है, बेफिक्री से जिन्‍दगी बिताता है।

हकीम : बड़े भाई! मैं क्‍या सोचूँ? मेरा सोचना और न सोचना तो दवा पर मुनहसर है और दवा कारगर नहीं हो रही है।

अबू बका : तो तुम क्‍या समझते हो कि दुनिया की तमाम बीमारियों की दवा तुम्‍हारे इन अर्कों, सफूफों और रूहों में ही महदूद है? कभी उस पर भी खयाल किया है कि जो इन दवाओं को ताकत बख्‍शता है? अगर उसकी नजर है तो तुम्‍हारे अर्क और सफूफ आबेहयात हैं; नहीं तो महज मिट्टी या गर्द, बस। तुम भले ही उम्‍मीद हार बैठे हो लेकिन मैं मायूस नहीं हूँ।

हकीम : बड़े भाई! मुर्तजा की ताकत तो अर्कों ओर सफूफों तक ही खत्‍म है।

अबू बका : हुक्‍म हो तो जहाँपनाह की खिदमत में मैं एक दवा अर्ज करूँ ?

अबू बका : मेरे उस्‍ताद, जिनकी बात के खिलाफ आज तक मैंने कुछ होते नहीं देखा और जिन्‍हें जहाँपनाह भी अच्‍छी तरह जानते हैं, कहा करते थे कि ऐसे मौके पर सबसे अजीज चीज खुदाताला को भेंट करने पर अकसर दम तोड़ते हुए मरीज को भी भला-चंगा होते हुए देखा गया है।

बाबर : [खुशी से] सच?

बाबर : [बात काटकर] मौलाना! आप शाहजादे की जिन्‍दगी को एक छोटी-सी बात समझते हैं ? जिसे आप शाहंशाहे-हिन्‍दुस्‍तान कहते हैं उसके दिल की एक-एक धड़कन हुमायूँ की जिन्‍दगी की मिन्‍नत की आवाज है। आज आपके सामने शाहंशाहे-हिन्‍दुस्‍तान नहीं, एक इन्‍सान — मामूली इन्‍सान खड़ा है, और जिन्‍दगी से उसके बेटे की जिन्‍दगी कहीं बेशकीमत है।

बाबर : आप जो कहिएगा उसे हम समझ रहे हैं। अगर आप यह सोचते हैं कि हुमायूँ के नहीं रहने पर हम जिन्‍दा रह सकेंगे तो आप धोखे में हैं।

अबू बका : जहाँपनाह! मेरे कहने का मतलब कुछ दूसरा है। मैं अर्ज करना चाहता हूँ कि क्‍यों नहीं उसे ही खुदा को भेंट किया जाए ?

बाबर : [एकाएक हुमायूँ के चेहरे की ओर देखकर घबराई हुई आवाज में] वह देखिए हकीम साहब! शाहजादे के चेहरे पर सफेदी छा रही है। आँख डरावनी लग रही है। [आवेश में] नहीं, नहीं अब ज्‍यादा सोचने का वक्‍त नहीं है। हमारे जीते-जी हुमायूँ को कुछ नहीं हो सकता। हम उसे बचाएँगे, जरूर बचाएँगे। हीरे और पत्‍थर से काम नहीं चलेगा। खुदाताला की खिदमत में हम खुद अपनी जान हाजिर करते हैं।

[बाबर तेजी से गम्‍भीरतापूर्वक हुमायूँ के पलंग की चारों ओर घूमने लगता है।]

अबू बका : [और हकीम घबराकर] आलमपनाह! आलमपनाह! यह क्‍या कर रहे हैं ? खुदा के लिए...।
बाबर : [कठोर स्‍वर में] खामोश! शाहंशाहे-हिन्‍दुस्‍तान का हुक्‍म है कि आप खामोश रहिए। हम जो कर रहे हैं उसमें खलल न डालिए। [तीन बार पलंग की परिक्रमा कर हुमायूँ के सिरहाने जमीन पर घुटने टेक कर बैठ जाता है। हाथ जोड़कर आँखें बन्‍द कर लेता है और मुँह कुछ ऊपर उठाए हुए शांत गम्‍भीर स्‍वर में कहता है।] या खुदा! परवरदिगार! तेरी मेहरबानी से मैंने एक-से-एक मुश्किलों पर फतह हासिल की है। मैं हर गाढ़े वक्‍त पर तुझे पुकारता रहा हूँ और तू मेरी मदद करता रहा है। आज एक बार फिर इस मौके पर तेरी उस मेहरबानी की भीख माँगता हूँ। अपने बेटे की जान के बदले मैं अपनी जान हाजिर करता हूँ। तू मुझे बुला ले, लेकिन उसे अच्‍छा कर दे...।

हकीम : [आश्‍चर्य और प्रसन्‍नता से] आलमपनाह! शाहजादा ने आँखें खोल दीं। आज सात रोज के बाद...।

बाबर : [प्रसन्‍नता से] हमारी आवाज अल्‍लाहताला तक पहुँच गई... पहुँच गई! अल्‍लाहो...अकबर...।

[बाबर धीरे-धीरे उठकर हुमायूँ के सिर पर हाथ फेरता है।]

बाबर अचानक से एक-दो बार जोर से सिर हिलाता है जैसे कोई तकलीफ हो। हकीम साहब! हमारे सर में जोर का चक्‍कर और दर्द मालूम हो रहा है। एक अजीब बेचैनी मालूम हो रही है।

[बाबर कमजोर और सुस्‍त एक पलंग पर पड़ा है। कभी-कभी दर्द से कराह उठता है पर चेहरे पर से अफसोस के बदले खुशी जाहिर हो रही है जैसे इस बीमारी की उसे कोई चिन्‍ता न हो। पलंग के एक बगल में एक तिपाई पर हकीम और दूसरी पर अबू बका बैठे हैं। दूसरे बगल में माहम और हुमायूँ चिन्तित भाव से चुपचाप खड़े हैं।]

बाबर : अब तो कूच की तैयारी है। जितनी देर तक साँस चल रही है, वही बहुत है। पसलियों में बेहद दर्द है, साँस नहीं ली जाती। अल्‍लाहताला बुला रहा है।

बाबर : आज हमें एक ही बात का अफसोस है। जिसकी सारी उम्र लड़ाई के मैदान में कटी उसकी मौत बिस्‍तर पर हो रही है। [खाँसता है] हम लड़ते-लड़ते मरने के ख्‍वाहिशमंद थे। खुशकिस्‍मती से एक ऐसे मुल्‍क में पहुँच भी गए थे जहाँ बहादुरों की कमी नहीं थी — लेकिन वह अरमान... [खाँसता है। हिन्‍दुस्‍तान बड़ा बुलन्‍द मुल्‍क है। यहाँ के राजपूतों के लिए हमारे दिल में बड़ी इज्‍जत है। वे दरसअल दिलेर और बहादुर हैं। मरना या मारना किसी को इनसे सीखना चाहिए।

बाबर : हकीम साहब! अब दवा न दीजिए। यह हिचकी है या खुदा का पैगाम है। [फिर हिचकी आती है]

माहम : [करुण स्‍वर में] या खुदा, यह कैसा इम्तिहान है ? एक ओर लख्‍तेजिगर को जिन्‍दगी बख्‍शी तो दूसरी ओर सरताज को इतनी तकलीफ दे रहा है।

बाबर : मलका! परवरदिगार के शुक्र के बदले शिकवा ? अल्‍लाहताला का हजार-हजार शुक्र है कि उसने हमारी इल्‍तजा सुन ली, हमारी उम्‍मीद और अरमानों के चमन को सरसब्‍ज रहने दिया, हमारी आँखों की मिटती हुई रोशनी लौटा दी। तभी तो हम आज शहजादे को भला-चंगा देख रहे हैं।

बाबर : [बात काटकर] हमारी फिक्र छोड़ो, मलका! हमने तो खुद यह तकलीफ माँगी है। हमें बहुत बड़ा फख्र है कि हमारे मालिक ने अपने ऐसे नाचीज बंदे की अदना-सी भेंट कबूल फर्मा ली। [दर्द से करवट बदलता है]
बाबर : सेहत! बेचारे हकीम साहब! बेटा! हमने हिन्‍दुस्‍तान को फतह किया, हकूमत की बुनियाद भी डाली मगर सल्‍तनत की ऊँची इमारत तैयार करने के पहले ही हमें जाना पड़ रहा है। अब उस इमारत को पूरा करना और कायम रखना तुम्‍हारा काम है। [हिचकी आती है।] जंग के मैदान में हमारी तलवार के वार कभी ओछे नहीं पड़े और अमन के जमाने में हमारी दानिशमंदी ने कोई गलत रवैया भी अख्तियार नहीं किया। बादशाहत के लिए दोनों चीजें एकसाँ जरूरी हैं। [दर्द से करवट बदलता है।] आह, सिर फटा जा रहा है।

बाबर : मलका! हम माँ-बेटे को एक-दूसरे को सुपुर्द करते हैं। [माहम सिसक-सिसककर रोने लगती है] बेटा, सिपहसालार को बुलाओ। [एक आदमी बाहर जाता है] और सुनो। इधर नजदीक आओ। [आवाज पहले से धीमी पड़ जाती है] आज से इस सल्‍तनत के तुम मालिक हो। [खाँसता है] तुम नेक और आजादखयाल हो। अपने भाइयों और बहनों को मुहब्‍बत की नजर से देखना। उनसे कोई गलती भी हो तो माफ करना। [हिचकी आती है] आह! साँस लेने में बड़ी तकलीफ है। [जोर से साँस लेता है]

बाबर : हम कूच कर रहे हैं। हमारे बाद शाहजादा हुमायूँ हिन्‍दुस्‍तान के बादशाह होंगे। [खाँसता है] आप सबों से उन्‍हें उसी तरह मदद मिलनी चाहिए जिस तरह हमें मिलती है। आह! बेटा! पानी! [हुमायूँ मुँह में पानी देता है] बेटा, यहाँ जितने हैं सबों का हाथ पकड़ो। [हिचकी आती है] सबों की परवरिश करना। [जोर से साँस लेता है] या खुदा! और हाँ, हमारी आखिरी ख्‍वाहिश... [हिचकी आती है] हमें यहाँ न दफना कर काबुल की मिट्टी में दफनाना। यह हमारा आखिरी हुक्‍म... और... ख्‍वाहिश है। [हिचकी] तुम सब... आबाद रहो [जोर की हिचकी] अल...विदा। अल्‍लाहो...अ...क...ब...र... [हिचकी के साथ शांत हो जाता है।]

Sunday, October 2, 2016

ऊटी से केरल की ओर ।।
चाय के हरे भरे बागानों में और वौटोनिकल पार्क में चहलकदमी करने के बाद केरल के वैक वाटर्स में नौकायान करने को मन मचलने लगा। अमिताभ बच्चन की ग्रेट गैम्बलर में इटली की शानदार और खूबसूरत नहरों में नौकायन करते हुये एक गाना फिल्माया गया था," दो लव्जों की है यही कहानी ...... " वेनिस की वो नहरें आज भी मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट बनीं हुईं हैं। तभी किसी लेख में पढा कि इटली जैसी नहरें हमारे केरल में भी हैं। केरल की खूवसूरती शब्दों में बयां नहीं की जा सकती, इसे तो केवल जीया जा सकता है।
ऊटी से मेटुपलयम स्टेशन तक चलने बाली पहाडों की रानी टौय ट्रैन खुद में एक जन्नती अनुभव है। नीली नीली पहाडियों के बीच से धुंआ छोडती और सीटी मारती ये ट्रैन गजब का अनुभव है।


 मैट्टुपलयम तक बडी गाडियां भी आतीं हैं पर यदि न मिले तो एक घंटे की दूरी पर कोयम्बटूर से कहीं के लिये भी ट्रैन्स मिल जाती है। मैं केरल की नहरों के सपनों में खोया कोयम्बटूर होते हुये कोच्चि जा पहुंचा। कोच्चि में बन्दरगाह पर बने फुटपाथ पर घूमता रहा जहां वोम्वेनाड झील और अरब सागर का मिलता साफ दिखायी देता है। वहीं घूमते हुये बहुत सारे लोगों से बात हुयी जिन्हौने मुझे मंदिर सजेस्ट किये थे। सिटी बस में पूरा शहर भी घूमा। लेकिन कोच्चि में कोई खास आनंद नहीं आया क्यूं कि दिमाग में तो वही नहरें और उनमें दौडती नौकायें थीं। एक बार सोनी टीवी पर सीआईडी बाले किसी अपराधी का पीछा करते हुये केरला के वैक वाटर्स में स्पीड वोट्स दौड लगा रहे थे तभी से मेरे दिमाग में केरला की नहरें घूम रहीं थीं।
केरल उत्‍तर और दक्षिण दो हिस्‍सों में बंटा है। हालांकि, केरलम यानी केरा (नारियल) के पेड़ों से लदे इस प्रदेश का पश्‍चिमी हिस्‍सा अरब सागर से लगा है, लेकिन पूर्वी हिस्‍से पर चाय के बागानों से सजे ऊंचे हरे-भरे पहाड़ हैं। उत्‍तर और दक्षिण के हिस्‍सों को जोड़ती हैं 1500 किलोमीटर लंबी नहरें। केरल की 38 बड़ी नदियों और 5 बड़े सरोवरों का पानी इन्‍हीं नहरों के जरिए समुद्र में जा मिलता है। इस बैकवॉटर वाला हिस्‍से में सबसे मशहूर है दक्षिण से उत्‍तर केरल की ओर जाने वाला 85 किलोमीटर लंबा जलमार्ग, जो बड़े हाउसबोट्स और नावों के लिए मुफीद है। भारत में तीन राष्‍ट्रीय जलमार्ग हैं। यह जलमार्ग उनमें से एक है। हालांकि केरल की असल खूबसूरती बेहद खूबसूरत चाय बागानों, बैकवॉटर और अरब सागर के समुद्र तटीय बीच के हिस्‍से हैं।
कोच्चि से ट्रैन से एलप्पी पहुंचने का रास्ता भी खुद अपने आप में एक अलग ही अनुभव है। केरल की पूरी लम्बाई को यह ट्रैन पार करती है। रेलवे पाथ के दोनों ओर नहरें और घने पेड अपनी ओर खींचते हैं। एलेप्पी में जहां चारों तरफ बडी बडी नहरें ही नहरें हैं और उनमें वोटिगं का गजब का आनंद मिलता है। इन नहरों का पानी बैक वाटर्स के नाम से जाना जाता है। बैकवॉटर्स यानी समुद्र की लहरों के साथ आया वह पानी जो झील के रूप में बदल गया। अलेप्पी स्टेशन से करीब दस मिनट के रास्ते पर वोट जेट्टी है। यदि आप पर्सनल वोट लेना चाहें तो पांच सौ से तीन हजार हजार के बीच है। इसके अलावा सरकारी वोट भी चलती है जो मात्र पच्चीस रूपये में दो घंटे की यात्रा कराती है। वेम्बनाड़ लेक में मोटरबोट से तकरीबन दो घंटे की इस यात्रा का रोमांच हमेशा के लिए हमारे साथ रह जाने वाला था। अरब सागर के किनारे-किनारे बनी इसी लेक में केरल की प्रसिद्घ बोट रेस का आयोजन भी हर साल होता है। दूर दिखाई देते चर्च, पानी के बीच लगे साइन बोर्ड, लेक के बीच उभरा जमीन का कोई हरा-भरा टुकड़ा, उस पर नारियल के पेड़ों के नीचे एक झोंपड़ी और पानी बंधी हवा में हिलती छोटी-सी नाव। ‘अलप्पी को पूर्व का वेनिस’ ऐसे ही नहीं कहा जाता।
 हाउसबोट, जिसे मलयालम में यहां केतुवेल्लम कहा जाता है, में भी ठहरने की व्यवस्था रहती है।
अलप्पी बैकवॉटर्स के लिए प्रसिद्घ है, मगर यहां के छोटे से समुद्रतट पर आप अरब सागर के विस्तार कभी नहीं भूलेंगे। बीच पर ही बनी किसी कॉफी शॉप में देर तक बैठें, वहीं बेशक दक्षिण भारतीय खाना खाएं, सोने के जगमगाते गहनों के बाजारों से गुजरें और जेटी पर इंतजार करती बोट से होते हुए अपने रात के ठिकाने पर लौट आएं। रात को पानी के बीच बसी दुनिया की जलती-बुझती रोशनियां होती हैं, कोई देर से घर लौटती नाव या होता है सन्नाटा। सैलानियों की बोट से कभी-कभी उठता संगीत किसी दूसरी दुनिया से आता लगता है।
अलप्पी से कोलम का आठ घंटे का मात्र चार सौ रूपये की टिकट पर नौका सफर केरल की बस्तियों और शहरों के बीच का सफर जन्नत में होने का एहसास कराने बाला होता है। नारियल के झुरमुटों में बसे खूबसूरत घर। डूबता सूरज और लहरों का उठता-जाता शोर। गजब का द्श्य मानो वक्त ठहर गया हो।
तिरूअन्तपुरम से पहले एक बहुत फेमस जगह अम्रतापुरी कोलम  आयी जहां जानी मानी आध्यात्मिक हस्ती अम्रतामयी माता उर्फ अम्मा का आश्रम है जहां हजारों श्रद्धालु आते जाते हैं। पूरा दिन अलेप्पी में बिताने के बाद रात को तिरुअन्तपुरम के लिये ट्रैन पकडनी थी। रात को कोलम के रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रैन के इतंजार में लेट गया। रेलवे पुलिस अधिकारी मुझे नोटिस कर रहा था। दर असल मुझे लौटते हुये रात हो चुकी थी और मैं सुबह छ बजे तक तिरुअन्तपुरम पहुंचना चाह रहा था इसलिये मैं सुवह के इंतजार में रात की तीन गाडियां निकाल चुका था। उसे ज्यादा शक हुआ तो मुझे पुलिस थाने ले गया।
करीब दो घंटे की कडी पूछताछ के बाद मुझे यह कहते हये छोडा कि बडी किस्मत बाले हो यार , शादीशुदा होने के वावजूद इतनी आजादी से घूम रहे हो।
आखिरकार करीब चार बजे की ट्रैन से एक घंटे मे त्रिअन्तपुरम पहुंच गया। सबसे पहले पदनाभ स्वामी मंदिर गया जो स्टेशन से बस एक किमी की दूरी पर है। ये दक्षिण भारत का वही प्रसिद्ध मंदिर है जहां करोंडों का खजाना छुपा है।
पद्मनाभस्वामी मंदिर भारत के केरल राज्य के तिरुअनन्तपुरम में स्थित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। भारत के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में शामिल इस ऐतिहासिक मंदिर का पुनर्निर्माण त्रावनकोर के महाराजा मार्तड वर्मा ने करवाया था। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है। इस प्रतिमा में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं।  यहाँ पर भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को 'पद्मनाभ' कहा जाता है और इस रूप में विराजित भगवान यहाँ पर पद्मनाभ स्वामी के नाम से विख्यात हैं।
अतं में समुद्र किनारे पहुंचा जहां खूव खुल कर मस्ती की। मछुआरों के साथ बैठ कर घंटे भर बतियाया। बीच पर वोटिगं की। स्विमिगं की।
समुद्र का बेहद खूबसूरत तट। एक जीवंत शाम। हर तट पर समुद्र अलग चेहरे के साथ होता है।
फिर भी बहुत पहचाना-सा। बचपन की भूगोल की किताबों से निकल कर मालाबार तट सामने आ खडा हुआ था। लहरें आ-आ कर लौट रही थीं। मछुआरे समुद्र में उतर पड़े थे, समुद्र के ऊपर बहती हवा कुछ ज्यादा ताजी थी।
रात हो रही थी और मुझे अभी तमिलनाडु की तरफ निकलना था।


Saturday, October 1, 2016

ऊटी की यात्रा

ऊटी की यात्रा ।।

ऐसे तो मैं पैदाईसी घुमक्कड हूं , पिछले तीस वर्ष से घूम रहा हूं और लगभग पूरा भारत घूम डाला लेकिन ये न पता था कि कभी मुझे फेसबुकिया लेखक या ब्लागर बनने का भी मौका मिलेगा वरना उन यादों को और सहेज कर रख पाता।
नीलगिरी की नीली नीली पहाडियां मुझे बुला रहीं थी और मैं उतावलेपन में बिना किसी कैमरे इत्यादि के बिना किसी साथी के अकेला ही उधर दौड पडा था। अब तो खैर मैं अकेला पागल नहीं हूं , दीवानों की पूरी एक टीम है मेरी पर एक दो साल पहले तक मेरे शहर में मैं अकेला ही दीवाना था जो पहाडों की खाक जानते फिर रहा था।
जानकारी के अभाव में मुझे ऊटी के नजदीकी हिल स्टेशन कुर्ग जैसे स्वर्ग को मिस कर देने का आज भी मलाल है क्यूं कि मैं ऊटी से सीधे केरल की तरफ कूच जो कर गया था। इस बार सर्दियों में जाऊंगा तो यात्रा की शुरुआत मैसूर से होगी।
कुर्ग , कर्नाटक का सबसे छोटा जिला, एक स्वर्ग का टुकडा है जहां उडते बादलों के बीच हरी भरी पहाडियों की ढलानों पर आप पशु पक्षियों के बीच भरपूर मस्ती कर सकते हैं। इलाइची,काली मिर्च,शहद और फूलों की मनमोहक सुगंध वाला शहर मदिकेरी कर्नाटक के कूर्ग जिले का मुख्यालय है। इसकी खूबसूरती और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण मदिकेरी को दक्षिण का स्कॉटलैंड भी कहा जाता है। यहां की धुंधली पहाड़ियां, ठंडी हवाएँ, हरे वन, कॉफी के बागान और प्रकृति के खूबसूरत दृश्य मदिकेरी को हमेशा याद रहने वाला पर्यटन स्थल बनाते हैं। मदिकेरी का वातावरण,जंगल की ढलानें,विलक्षण गाँव,रंगीन दृश्य,मनमोहक खुशबू,शांत पर्यावरण,कल-कल करती नदियां,पशु-पक्षी,घने जंगल और झरनों से गिरता मोतियों सा पानी स्वर्ग का एहसास दिलाता है। कुर्ग को कोडागू भी कहा जाता है। इसका अर्थ है-सोती पहाड़ियों पर बसा धुंध जंगल। कुर्ग के बारे में बताने को बहुत कुछ है पर बाकी की कहानी मैं आपको इस बार की सर्दियों की छुट्टियों में सुनाऊंगा। साक्षात दर्शन कराऊंगा इस बार की यात्रा में।
ऊटी कोई बहुत मंहगी जगह नहीं है। मात्र तीन सौ रुपये में कमरा मिल गया था मुझे और वो भी स्टेशन के सामने ही। कमरे में सामान आदि रखकर फ्रैश होकर पैदल ही निकल पडा झील की ओर। स्टेशन के बगल से ही रोड जा रही है और नजदीक ही है।

ऊटी की झील में बतख बाली पैडल वोट तलाश रहा था कि तभी दिल्ली के एक प्रोफेसर से मुलाकात हुई और मुलाकात होने की बजह शायद मेरा हिंदीभाषी होना ही होगा। उनके परिवार में तीन लोग थे और वोट को संतुलित रखने के लिये चार की आवश्यकता थी। हालांकि वोट में बैठने से पहले मुझे मेरे हिस्से के सत्तर रूपये बता दिये गये थे लेकिन वोटिगं के दौरान वो परिवार मेरे इतने करीब आ गया कि मेरी काफी जिद के बाबजूद उन्हौने मुझसे पैसे नहीं लिये। दिन ढलने को था। हवा में हल्की हल्की सी ठंड आने लगी थी। दिन भर की यात्रा की थकान की बजह से भूख और तेज लगने लगी थी। थोडी कोशिष करता तो शायद गेहूं की रोटी और सब्जी बाला भोजनालय भी मिल जाता पर भूख जोर मार रही थी और पैर दर्द के मारे कीर्तन कर रहे थे इसलिये नजदीकी ही एक भोजनालय पर बैठ गया। पता चला रोटी नहीं थी उसके पास। सिर्फ इडली सांभर और डोसा आदि साऊथ इंडियन भोजन ही था। मरता क्या न करता। भूख बहुत बुरी बनायी है, इंसान भूखा हो तो पत्थर भी चबा जायेगा ये तो डोसा ही था। थाली की बजाय केला का पत्ता विछा गया टेबल पर । डोसा लाया पर बिल्कुल सफेद लचीला डोसा। बाल्टी में से चमचा भरकर सफेद चटनी उसी पर फैला गया। सांभर भी ऐसा कि ना मिर्च और ना मसाला। ये कमबख्त इतना मसाला पैदा करते हैं कि वास्को दा गामा जैसों को बुला लेते हैं तो फिर अपनी सब्जी में डालने पर इतना जोर क्यूं पडता है। सरसों के तेल में छुकी सब्जी खाने बाला नारियल के तेल बाली सब्जी बडी मुश्किल ही खापेया, आनंद ही नहीं आता खाने में। खैर हम तो घुमक्कड हैं हमें घास फूस खाने की भी आदत होनी चाहिये। विपरीत परिस्थितियों में हमें सांप बिच्छू छिपकली भी खानी पड सकती है । मरे ऊंट के पेट में से पानी निकाल कर भी पीना पड जाता है। खुद का मूत भी पीना पड सकता है क्यूं कि जान है तो जहान है।

शेष अगले अंक में

ऊटी की यात्रा

"ऊटी ऊटी प्यार की बोटी""
ऋषि कपूर की फिल्म " कर्ज " के गाने " दर्दे दिल दर्दे जिगर ...... आशिक बनाया आपने " के अतं में टीना मुनीम एवं अन्य लडकियों के झील में गिरने बाले द्रश्य ने इतना रोमांचित किया था कि उसी दिन ऊटी जाने की ठान लिया था।
धौलपुर से पकडी हिमसागर एक्सप्रैस ने मुझे
कोयंबटूर (दक्षिण भारत का मैनचेस्टर) छोड दिया था। चूंकि मुझे टाय ट्रैन से ही ऊटी जाना था अत: मुझे मेट्टुपालयम पहुंचना पडा जो बहां से 38 किमी की दूरी पर है।
मेट्टुपालयम, नीलगिरी पैसेंजर (एनएमआर) का रेलवे जंक्शन है और यात्रीगण यहां से ब्रॉड गेज रेलवे के लिए बदल सकते हैं। नीलगिरी एक्सप्रेस (ब्लू माउंटेन एक्सप्रेस) मेट्टुपालयम को कोयम्बटूर के माध्यम से राज्य की राजधानी चेन्नई से जोड़ती है। यह अपनी ऊटी ट्रेन "नीलगिरी पैसेंजर" के लिए प्रसिद्ध है जो कि एशिया की एकमात्र रैक एंड पिनियन रेलवे है।
मेट्टुपालयम, नीलगिरी पहाड़ियों को जाने वाली दो घाट सड़कों के लिए शुरुआती स्थान के रूप में कार्य करता है।
ऐसे तो ऊटी के लिये वाहनों की खूव सुविधा है पर
वनाच्छादित पर्वतों के मनोरम दृश्य को देखने के लिए आप मेट्टुपालयम से ऊटी की टाय ट्रेन यात्रा ही करें। नैरो गेज की यह पहाड़ी ट्रेन मेट्टुपालयम के मैदानी इलाकों से शुरू होकर जंगलों, चाय के बागानों, 16 सुरंगों, तथा 250 से अधिक पुलों के रास्ते 46 किलोमीटर का सफर तय करती है। इसके चलने की गति तो काफी कम है (यात्रा में साढ़े चार से पांच घंटे लगते हैं) लेकिन पहाड़ों तथा मैदानी इलाकों के विलक्षण दृश्य इसकी पूर्णतया भरपाई कर देते हैं। मेट्टुपालयम की ट्रेन यात्रा पर्यटकों के लिए सबसे मनोरंजक और यादगार लम्हों में से एक है। भाप इंजन वाली इस ट्रेन को ब्रिटिश काल में बनाया गया।
छुक छुक करती धुआं उडाती नीले नीले पहाडों में चडती जाती खिलौना गाडी ने मुझे आखिरकार उसी झील के पास पहुंचा ही दिया। स्टेशन के नजदीक ही मात्र तीन सौ रुपये में एक कमरा मिल गया।
सबसे पहले बाजार घूमते हुये वौटौनिकल गार्डन पहुंचा। 22 हेक्टेयर में फैले इस खूबसूरत बाग में दो करोड बर्ष पुराने एक पेड़ के जीवाश्म संभाल कर रखे गए हैं।
उसके बाद शाम को झील पहुंचा जहां बतख पैडल वोटिगं का आनंद लिया। ऊटी झील का निर्माण यहां के पहले कलक्टर जॉन सुविलिअन ने 1825 में करवाया था। यह झील 2.5 किमी. लंबी है।
दस किमी दूर पर्वतीय डोडाबेट्टा चोटी जिले की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है। जहां से आसपास का मनोरम द्रश्य देखा जा सकता है।
यदि आप शेर चीतों आदि जानवरों से हाथ मिलाने एवं प्यार मुहब्बत की बात करने के इच्छुक हों तो नजदीक ही मदुमलाई वन्यजीव अभ्यारण्य जरूर जायें और कलहट्टी जलप्रपात झरना( 100 फीट ऊंचा ) का आनंद भी जरूर लें।