Friday, February 3, 2017

सारनाथ: अशोक स्तंभ, मूलगंध कुटी विहार, जैन मंदिर

सारनाथ: अशोक स्तंभ, मूलगंध कुटी विहार, जैन मंदिर
महान सम्राट अशोक द्वारा 250 ईसा पूर्व में सारनाथ में बनवाया गया।यह स्तम्भ दुनिया भर में प्रसिद्ध है, इसे अशोक स्तम्भ के नाम से भी जाना जाता है।इस स्तम्भ में चार शेर एक दूसरे से पीठ से पीठ सटा कर बैठे हुए है।यह स्तम्भ सारनाथ के संग्रहालय में रखा हुआ है।भारत ने इस स्तम्भ को अपने राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया है तथा स्तम्भ के निचले भाग पर स्थित अशोक चक्र को तिरंगे के मध्य में रखा है ।इतिहास सेमुख्य मंदिर से पश्चिम की ओर एक अशोककालीन प्रस्तर-स्तंभ है जिसकी ऊँचाई प्रारंभ में 17.55 मी. (55 फुट) थी। वर्तमान समय में इसकी ऊँचाई केवल 2.03 मीटर (7 फुट 9 इंच) है। स्तंभ का ऊपरी सिरा अब सारनाथ संग्रहालय में है। नींव में खुदाई करते समय यह पता चला कि इसकी स्थापना 8 फुट X16 फुट X18 इंच आकार के बड़े पत्थर के चबूतरे पर हुई थी।
इस स्तंभ पर तीन लेख उल्लिखित हैं। पहला लेख अशोक कालीन ब्राह्मी लिपि में है जिसमें सम्राट ने आदेश दिया है कि जो भिछु या भिक्षुणी संघ में फूट डालेंगे और संघ की निंदा करेंगे: उन्हें सफ़ेद कपड़े पहनाकर संघ के बाहर निकाल दिया जाएगा। दूसरा लेख कुषाण-काल का है। तीसरा लेख गुप्त काल का है, जिसमें सम्मितिय शाखा के आचार्यों का उल्लेख किया गया है।
धर्मराजिका स्तूप और धमेक स्तूप परिसर से बाहर आ जाते हैं और सडक पर टहलते हुये जैन मंदिर एवं बौद्ध मंदिर की तरफ आगे बढते हैं। सडक के एक तरफ सजावटी बस्तुओं की दुकानें भी खूब आकर्षित लगीं। थोडा सा ही आगे चलने पर जैन मंदिर आ जाता है। ग्यारहवें तीर्थंकर की जन्म भूमि है सारनाथ। धमेका स्तूप से सटा हुआ ही है कितुं परिसर अलग होने के कारण घूम कर आना पडता है। जैन मंदिर प्रांगण में कोई भीडभाड नहीं। एकदम शांत । थोडी देर पेडों की छांव में विश्राम कर दर्शन कर बाहर आकर हम बढ गये पीपल वृक्ष की ओर। तीन पीढियों एवं तीन विचारधाराओं के लोगों का उसी वृक्ष के नीचे समागम हुआ जहां महात्मा ने अपने पांच शिष्यों को मानव बनने की सीख दी। दरअसल बोधगया, बिहार में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपने प्रथम पाँच शिष्यों को इसी जगह स्थित हिरण उद्यान में बुद्ध ने पहला धर्मोपदेश दिया जिसका उल्लेख 'धर्म चक्र प्रवर्तन' के नाम से बौद्ध साहित्य में मिलता है। यानि बौद्ध धर्म की नींव सारनाथ में ही पड़ी। बौद्ध धर्म ग्रंथों में सारनाथ का उल्लेख ॠषिपत्तन, धर्मपत्तन, मृगदाय व मृगदाव के रूप में होता रहा है पर ताज़्जुब की बात ये है कि सारनाथ का ये आधुनिक नाम पास में स्थित महादेव के मंदिर सारंगनाथ से निकल कर आया है। उस बोधिवृक्ष के नीचे अपने पाँच शिष्यों को उपदेश देते गौतम बुद्ध की मूर्ति दिखाई दे रही थी। कहते हैं कि सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा ने बोधगया स्थित पवित्र बोधि वृक्ष की एक शाखा श्रीलंका के अनुराधापुरा में लगाई थी। उसी पेड़ की एक शाखा से सारनाथ का बोधिवृक्ष फला फूला है। यह शाखा यहाँ मुलगंध कुटि विहार के उद्घाटन के समय लगाई गई थी। 1989 में यहाँ गौतम बुद्ध व उनके शिष्यों की प्रतिमा म्यानमार के बौद्ध श्रृद्धालुओं की मदद से बनी। 1999 में इस परिसर में बुद्ध के 28 रूपों की प्रतिमा और लगाई गई। इसी परिसर में ही एक विशाल घंटी भी लगी हुई है जिसे बौद्ध धर्म घंटे का नाम देते हैं। कहते हैं इसे बजाते वक़्त इसकी आवाज़, सात किमी दूर तक सुनाई देती है।
दरअसल मंदिर से थोड़ी दूर पर इसी नाम के पुराने मंदिर के भग्नावशेष मिले हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग की माने तो यहाँ अवस्थित उस प्राचीन मंदिर की ऊँचाई लगभग 61 मीटर थी। 18 मीटर से कुछ अधिक वर्गाकार भुजा वाले इस मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर था जिसके सामने एक आयताकार मंडप एवम् विशाल प्रांगण था। इतिहासकारों का मानना है कि स्थापत्य और ईंटों की सज्जा शैली के हिसाब से ये मंदिर गुप्त काल में बनाया गया होगा। इसी स्थल पर नए मंदिर को बनाने का श्रेय श्रीलंका के बौद्ध प्रचारक अंगारिका धर्मपाल को जाता है जिन्होंने भारत में महाबोधि समाज की नींव रखी। भारत के नार्गाजुन कोंडा और तक्षशिला में उत्खनन से मिले कई पवित्र बौद्ध ग्रंथों को अंग्रेजों ने महाबोधि समाज को भेंटस्वरूप दिया और ये आज इस मंदिर की शोभा बढ़ा रहे हैं। हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन इन धर्मग्रंथों के साथ यहाँ एक शोभायात्रा निकाली जाती है। मंदिर में घुसते ही स्वर्णिम आभा से चमकती बुद्ध की प्रतिमा नज़र आती है। प्रतिमा के बगल में जापान से लाई गई एक विशाल घंटी भी दृष्टिगोचर होती है।
महात्मा बुद्ध को प्रणाम करने के बाद सहसा नज़र मंदिर की दीवारों पर चली गई। प्रख्यात जापानी चित्रकार कोसेत्सू नोसू (Kosetsu Nosu) के बनाए इन चित्रों को 1936 में आम जन के सामने प्रस्तुत किया गया। 
मूलगंध कुटी विहार धर्मराजिका स्तूप से उत्तर की ओर स्थित है। पूर्वाभिमुख इस विहार की कुर्सी चौकोर है जिसकी एक भुजा 18.29 मी. है। सातवीं शताब्दी में भारत-भ्रमण पर आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका वर्णन 200 फुट ऊँचे मूलगंध कुटी विहार के नाम से किया है। इस मंदिर पर बने हुए नक़्क़ाशीदार गोले और नतोदर ढलाई, छोटे-छोटे स्तंभों तथा सुदंर कलापूर्ण कटावों आदि से यह निश्चित हो जाता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ था। परंतु इसके चारों ओर मिट्टी और चूने की बनी हुई पक्की फर्शों तथा दीवारो के बाहरी भाग में प्रयुक्त अस्त-व्यस्त नक़्क़ाशीदार पत्थरों के आधार पर कुछ विद्धानों ने इसे 8वीं शताब्दी के लगभग का माना है।ऐसा प्रतीत होता है कि इस मंदिर के बीच में बने मंडप के नीचे प्रारंभ में भगवान बुद्ध की एक सोने की चमकीली आदमक़द मूर्ति स्थापित थी। मंदिर में प्रवेश के लिए तीनों दिशाओं में एक-एक द्वार और पूर्व दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार (सिंह द्वार) था। कालांतर में जब मंदिर की छत कमज़ोर होने लगी तो उसकी सुरक्षा के लिए भीतरी दक्षिणापथ को दीवारें उठाकर बन्द कर दिया गया। अत: आने जाने का रास्ता केवल पूर्व के मुख्य द्वार से ही रह गया। तीनों दरवाजों के बंद हो जाने से ये कोठरियों जैसी हो गई, जिसे बाद में छोटे मंदिरों का रूप दे दिया गया। 1904 ई. में श्री ओरटल को खुदाई कराते समय दक्षिण वाली कोठरी में एकाश्मक पत्थर से निर्मित 9 ½ X 9 ½ फुट की मौर्यकालीन वेदिका मिली। इस वेदिका पर उस समय की चमकदार पालिश है। यह वेदिका प्रारम्भ में धर्मराजिका स्तूप के ऊपर हार्निका के चारों ओर लगी थीं। इस वेदिका पर कुषाणकालीन ब्राह्मी लिपि  में दो लेख अंकित हैं- ‘आचाया(र्य्या)नाँ सर्वास्तिवादि नां परिग्रहेतावाम्’ और ‘आचार्यानां सर्वास्तिवादिनां परिग्राहे’। इन दोनों लेखों से यह ज्ञात होता है कि तीसरी शताब्दी ई. में यह वेदिका सर्वास्तिवादी संप्रदाय के आचार्यों को भेंट की गई थी।
















बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ।।

गंगा मैया का असर कहूं या तंग गलियों एवं लोगों की भीड का प्रभाव कि दिसम्बर की कडकडाती ठंड में भी मैं पूरे दो दिन तक टी शर्ट में भी पसीना देता रहा। शायद इसी बजह से बनारस की लस्सी एवं ठंडाई बार बार मुझे अपनी ओर खींच रही थी। सारनाथ देखने के बाद मैं Dr Gajanand Singh Ji को बाइक पर बिठाकर बीएचयू की तरफ दौडने लगा लेकिन भंयकर जाम से निकलने में हमें एक घंटा लग गया।
आखिरकार बनारस हिन्दू विवि आ ही गया। सपने में भी न सोचा था कि विवि कैंपस भी हमारे धौलपुर शहर से बडा होगा। 1300 एकड में फैला ये कैंपस अपने मेहराबदार गेट के बाहर की भीड़-भाड़ और चहल-पहल के विपरीत शांति का नखलिस्तान लगता है। पेड़ों की कतार वाले रास्ते और मंदिर की वास्तुकला वाले हल्के-पीले रंग के भवन वाराणसी की प्राचीन गलियों में उमड़े जनसैलाब से राहत देते हैं।
स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक मदन मोहन मालवीय के दिमाग की उपज बीएचयू की स्थापना 1916 में हुई। इसे हिंदू संस्कृति और आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा उद्योग की शिक्षा का उत्कृष्ट मेल  माना जाता है. यह सही मायनों में पूरब और पश्चिम के बीच समकालिकता की रूमानी कल्पना है।
मैन गेट से अदंर घुसते ही हमें किसी अन्य दुनियां में होने जैसा एहसास हुआ। चौडी चौडी सडक, दोनों ओर घने वृक्षों की कतार , स्वच्छ वायु एवं शांत वातावरण में घूमते हुये छात्र छात्राऐं हमें प्राचीन काल के गुरुकुलों की याद दिला रहे थे। बीएचयू एशिया का सबसे बड़ा आवासीय कैंपस है और यहां भाषा विज्ञान, संगीत शास्त्र और बायो-टेक्नोलॉजी से लेकर मैनेजमेंट तक के विविध पाठ्यक्रमों की पढ़ाई होती है. बीएचयू का लक्ष्य, ''शिक्षण और अनुसंधान के बीच तालमेल'' है.
बी एच यू कैंपस में भी काफी देर तक बाइक दौडाने के बाद आखिरकार हम विश्वनाथ मंदिर पहुंच ही गये। मंदिर पर लोग तो थे पर इतनी भीड नहीं थी जितनी गंगाघाट बाले काशी विश्वनाथ मंदिर पर थी। कभी कभी तो सोचता हूं कि उस तंग गली बाले प्राचीन मंदिर में जब मेरा थोडी ही देर में दम घुटने लगा और मैं आधा घंटा भी न टिक सका तो वेचारे भगवान को रोज दो सिलेन्डर आक्सीजन के लेने पडते होंगे।
पर यहां राहत थी। खूबसूरत भवन खुली हवा खुला बातावरण प्राकृतिक सौदंर्य ।
मंदिर यदि शहर की किच किच कोलाहल से दूर पेडों की छांव में हों तो अदंर से फीलिगं आती है, कुछ पल गुजारने की। भगवान से मुलाकात होगी कि नहीं , पता नहीं पर कम से कम आत्म साक्षात्कार तो हो ही जायेगा जो ईश्वर प्राप्ति का सबसे उत्तम रास्ता है। 
बनारस में घूमने की जैसे ही फेसबुक मित्रों को सूचना मिली , सारे के सारे सलाह देने कि ठंडाई जरुर पीना। बीएचयू से लौटते समय मैं गर्मी से वेहाल था, सोचा कुछ ठंडक मिलेगी तो एक गिलाश ठंडाई खेंच गया। बेचारे भोलेबाबा जब भी फुर्सत में बैठ कर हमारे बारे में सोचते होंगे तो यही कहते होंगे कि ये उल्लू के पट्ठे नशा तो खुद करते हैं और साले बिल मेरे नाम का फाड देते हैं। पर कम से कम मैंने तो भोले के नाम पर न पी थी। सोचा , अपने शौक मौज के लिये भगवान को नशेडी कहकर बदनाम क्यूं करुं ? 
हम इंसान भी बहुत चालू किस्म के लोग हैं, अपने देवी देवताओं एवं पैगम्बरों के नाम पर भांग शराब मांस का भोग लगाकर खुद मजे लेते हैं। बुराईयों को समाज में स्वीकार्य कराने के लिये भगवान से बेहतर कोई आड हो ही नहीं सकती, थोडा सा भोग भगवान को लगाकर बाकी खुद खेंच जाते हैं। बकरा खाना है तो बोल दो कि इब्राहिम बोल कर गये हैं , शराब पीनी है तो काल भैरव ने परमीशन दी है, डकैती करनी है तो मां भवानी की आज्ञा है और चिलम का सुट्टा लगाना है तो भोलेबाबा का प्रशाद है, बस फिर खुल कर खाओ पीओ , ईश्वर ने बोला है।
चूंकि मैंने पहली बार भांग की ठंडाई का सेवन किया था, सोचा था कि चढने में समय लगेगा जब तक तो मैं कमरे पर पहुंच जाऊगां और सो जाऊगां लेकिन ट्रैफिक में फंस गया और घर पहुंचने में ही एक घंटा बीत गया। बाइक की ब्रैक भी थोडी लूज थीं और बार बार गाडी बाले अचानक ब्रेक लगा देते, मैं टकराने से बाल बाल बचता। मेरे पीछे बैठे डाक्टर साहव बार बार मुझसे कह रहे कि चाहर साहब आपको चढ गयी है, बाइक मुझे दे दीजिये पर मुझे तो कुछ भी महसूस नहीं हुआ था। और बडी आसानी से घर भी पहुंच गया था पर उन्हें विश्वास न हुआ और बाद में मजे लेने के लिये मेरे दोस्तों को नमक मिर्च नीबूं मसाला लगा कर कमेंट किया और दोस्त तो इतने कमीने हैं कि उन्हें तो बस मौका चाहिये मुझसे मौज लेने का।
डाक्टर साहव ने आकर लिखा, "" भाँग  की ठंडाई  पीने  के बाद  मोटरसाइकिल  चाहर  साहब चलाने लगे मै इनके पीछे बैठा था । हमे लगने लगा  था कि भाँग  की ठंडाई  कुछ रंग  लायेगी और लाने भी लगी कि चाहर जी अपनी मोटरसाइकिल से आगे वालो  को धक्का  मारने लगे । मैने बोला जरा संभाल के मास्टर साहब, ये आगरा नहीं बनारस है, ज्यादा मस्ती का रस न लो, दो मिनट में आपका रस निकाल देंगे , इन्होने कहा डाक्टर  साहब  आप  निश्चित  रहे। धक्का  मै नही बल्कि हमारे आगे की गाड़ी  वाले हमें मार रहे है । मेरा माथा  ठनकने  लगा। आखिर आगे की मोटरसाइकिल  वाला पीछे वाले को धक्का  कैसै मार दे सकता है ? वाईक में वैक गियर  तो होती नही। अभी समझाये मुस्किल से दो मिनट न हुये होंगे कि तब तक इन्होने  एक नवयुवती की स्कूटी को पीछे से ठोक दिया, महिला थोडा  नाराज होती हुयी बोली कि चढाये हो क्या ? या सीधे आगरा से चले आ रहे हो ? चाहर साहब  बोले, " मैडम  धक्का  मै नही बल्कि  आप हमको धक्का मार रहीं है । इससे पहले कि मामला और आगे बढता, मै बीच बचाव करते हुए बोला, मैडम ये बनारस  के नही आगरा के रहने वाले है और मेरे मेहमान  है ।ना जाने क्यूं आगरा का नाम सुनकर वो महिला मंद मंद मुस्कराई और आगे जाने का रास्ता देते हुए बोली, जाने दीजिये न , बडे बडे शहरों में छोटी छोटी बातें होतीं ही रहतीं हैं। मैं तभी से सोचने लगा हूं कि आखिर आगरा के निवासी होने मे ऐसी क्या खूवी पाई थी उस महिला ने।""
हहह ये थे हमारे बुजुर्ग मित्र डा गजानंद सिंह जी यादव जो कि समाजवादी विचारक हैं। बस ऐसे ही तवी भाई मोईन भाई सज्जाद भाई संतोष भाई रवि भाई तुषार भाई प्रमोद भाई जैसे अन्य बहुत सारे मित्रों की यादों को लिये ये महापागल आगरा की ओर पृस्थान कर चला। 













Thursday, February 2, 2017

सारनाथ : संग्रहालय $ धर्मराजिका स्तूप

बनारस के घाट मंदिर घूमने के एवं लस्सी ठंडाई कचौडी जलेवी का पूरा लुत्फ उठाने के बाद चल दिया सारनाथ की तरफ जहाँ पड़ी बौद्ध धर्म की नींव एवं  महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। खाने पीने के मामले में बनारस की ठंडाई , पान और लौंगलत्ता बडी फेमस बतायी थीं। दो चीजों का रसास्वादन तो कर लिया पर भांग की ठंडाई अभी बाकी थी। ठंडाई की जगह लस्सी और एक फेमस मिठाई का आनंद जरूर लिया था।
फेसबुक मित्र डाक्टर साहब बनारस ही मिल गये थे तो साथ ही सारनाथ गये और शाम तक साथ ही रहे। विश्व के विभिन्न कोनों से आए विदेशी पर्यटकों की तादाद को देखकर , इस बौद्ध धार्मिक स्थल की अहमियत का अंदाजा लग जाता है।
सारनाथ में देखने के लिए विभिन्न देशों के बौद्ध अनुयायिओं की मदद से बनाए गए कई छोटे बड़े मंदिरों के आलावा, जैन मंदिर, हिरण उद्यान, बौद्ध विहार के अवशेष व एक बेहद प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय भी है जहां मैं और डाक्टर साहब रुके ही थे कि BHU Graduation Student यशवंत सिंह जैसे युवा मित्र अचानक से फोन कर मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त करते हैं , तो लगता है मेरा लेखन असर तो कर रहा है। ना जाने कितने भाई हैं जो हमें निरंतर पढ रहे हैं और हमें पता तक नहीं है । बहुत से हमारे लिये दिल में सम्मान लिये बैठे हैं पर कभी व्यक्त न कर पाये। मेरी ये यात्रा मित्रों से मिलने को ही थी और वो मकसद सफल भी हुआ। यशबंत सिंह मीडिया में जाकर इसे निष्पक्ष बनाने का सपना लिये बैठे हैं । इतनी कम उम्र में इतने अच्छे लेबल की राजनीतिक समझ रखना बहुत बडी बात है। इस सबके बाबजूद मेरे खुले विचारों से प्रभावित हैं । तीस किमी चलकर सिर्फ मिलने को सारनाथ पहुंचे । हमारे आने से पहले ही भाई  संग्रहालय  का टिकट ले चुके थे। यशबंत भाई आपने पैर छूकर जो मुझे इज्जत दी है, मैं कोशिष करूगां कि मैं इसके अनुरूप आचरण कर सकूं। नयी पीढी को इतना जागरूक देख कर बहुत  खुशी हुयी। संगृहालय के सामने ही पार्किगं थी जहां हमने अपनी बाइक्स खडी कर दीं थीं। मैं डाक्टर साहब की बाइक पर था। म्यूजियम में अदंर मोबाईल नहीं ले जाने दिया जाता है, अत: अदंर के फोटो न ले सके पर अदंर बुद्ध कालीन सभ्यता संस्कृति भाषा कला आदि के प्रमाण देखकर बहुत अच्छा लगा।
भगवान बुद्ध और बोधिसत्व की मूर्तियों के रूप में बौद्ध शिल्प का समृद्ध खज़ाना सारनाथ में स्थित है। बौद्ध कला की नायाब धरोहरों को इस संग्रहालय में स्थान दिया गया है।संग्रहालय के खुलने का समय सुबह 10 से शाम 5 बजे तक है। यह शुक्रवार को बंद रहता है। इसके अलावा सारनाथ में अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं, जैसे:- धर्मराजिका स्तूप, राष्ट्रीय प्रतीक की भव्य लाट और सद्धर्मचक्र विहार के खुदाई में मिले अवशेष।यह भवन योजना में आधे मठ (संघारम) के रूप में है। इसमें ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व से 12वीं शताब्दी तक की पुरातन वस्तुओं का भण्डार है। सारनाथ में बौद्ध मूर्तियों का विस्तृत संग्रह है। दीर्घाएंयहाँ पाँच दीर्घाएं और दो बरामदे हैं। दीर्घाओं का उनमें रखी गई वस्तुओं के आधार पर नामकरण किया गया है, सबसे उत्तर में स्थित दीर्घा तथागत दीर्घा है जबकि बाद वाली त्रिरत्न दीर्घा है। मुख्य कक्ष शाक्यसिंह दीर्घा के नाम से जाना जाता है और दक्षिण में इसकी आसन्न दीर्घा को त्रिमूर्ति नाम दिया गया है। सबसे दक्षिण में आशुतोष दीर्घा है, उत्तरी और दक्षिणी ओर के बरामदे को क्रमश: वास्तुमंडन और शिल्परत्न नाम दिया गया है।संग्रहालय में प्रवेश संग्रहालय में मुख्य कक्ष से होकर प्रवेश किया जाता है। शाक्यसिंह दीर्घा संग्रहालय की सर्वाधिक मूल्यवान संग्रहों को प्रदर्शित करती है। इस दीर्घा के केन्द्र में मौर्य स्तंभ का सिंह स्तंभशीर्ष मौजूद है जो भारत का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया है।संग्रहालय में संरक्षितबौद्ध कला की प्रतीक इन मूर्तियों को यहाँ के संग्रहालय में संरक्षित किया गया है।प्राचीन काल की अनेक बौद्ध और बोधित्व की प्रतिमाएं इस संग्रहालय में देखी जा सकती है।भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तम्भ का मुकुट भी इस संग्रहालय में संरक्षित है।चार शेरों वाले अशोक स्तम्भ का यह मुकुट लगभग 250 ईसा पूर्व अशोक स्तम्भ के ऊपर स्थापित किया गया था।तुर्कों के हमले में अशोक स्तम्भ क्षतिग्रस्त हो गया और इसका मुकुट बाद में संग्रहालय में रख दिया गया।यक्ष प्रतिमा सारनाथ संग्रहालय में सुरक्षित है।यह यक्ष प्रतिमा प्रथम-द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व की है।विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध और तारा की मूर्तियों के अलावा, भिक्षु बाला द्वारा समर्पित लाल बलुआ पत्थर की बोधिसत्व की खड़ी मुद्रा वाली अभिलिखित विशालकाय मूर्तियां, अष्टभुजी शाफ्ट, छतरी भी प्रदर्शित की गई हैं।त्रिरत्न दीर्घा में बौद्ध देवगणों की मूर्तियां और कुछ सम्बद्ध वस्तुएं प्रदर्शित हैं।सिद्धकविरा की एक खड़ी मूर्ति जो मंजुश्री का एक रूप है, खड़ी मुद्रा में तारा, लियोपग्राफ, बैठी मुद्रा में बोधिसत्व पद्मपाणि, श्रावस्ती के चमत्कार को दर्शाने वाला प्रस्तर-पट्ट, जम्भाला और वसुधरा, नागाओं द्वारा सुरक्षा किए जा रहे रामग्राम स्तूप का चित्रांकन, कुमारदेवी के अभिलेख, बुद्ध के जीवन से संबंधित अष्टमहास्थानों (आठ महान स्थान) को दर्शाने वाला प्रस्तर-पट्ट, शुंगकालीन रेलिंग अत्यधिक उत्कृष्ट हैं।तथागत दीर्घा में विभिन्न मुद्रा में बुद्ध, वज्रसत्व, बोधित्व पद्मपाणि, विष के प्याले के साथ नीलकंठ लोकेश्वर, मैत्रेय, सारनाथ कला शैली की सर्वाधिक उल्लेखनीय प्रतिमा उपदेश देते हुए बुद्ध की मूर्तियां प्रदर्शित हैं।त्रिमूर्ति दीर्घा में बैठी मुद्रा में गोल तोंद वाले यक्ष की मूर्ति, त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की मूर्ति, सूर्य, सरस्वती महिषासुर मर्दिनी की मूर्तियां और पक्षियों, जानवरों, पुरुष और महिला के सिरों की मूर्तियों जैसी कुछ धर्म-निरपेक्ष वस्तुएं और साथ ही कुछ गचकारी वाली मूर्तियां मौजूद हैं।आशुतोष दीर्घा में, विभिन्न स्वरूपों में शिव, विष्णु, गणेश, कार्तिकेय, अग्नि, पार्वती, नवग्रह, भैरव जैसे ब्राह्मण देवगण और शिव द्वारा अंधकासुरवध की विशालकाय मूर्ति प्रदर्शित है।अधिकांशत: वास्तुकला संबंधी अवशेष संग्रहालय के दो बरामदों में प्रदर्शित हैं।शांतिवादिना जातक की कथा को दर्शाने वाली एक विशाल सोहावटी एक सुंदर कलाकृति है।
संगृहालय भवन तो खजाना है। लेकिन यह उन्ही के लिये रुचिकर है जो इतिहास के जानकार हैं। संगृहालय घूम कर हम लोग सीधे धमेका स्तूप की और बढ चले। धमेका स्तूप परिसर बहुत बडा है। इसी परिसर में प्राचीन खंडहर और धर्मराजिका स्तूप के अवशेष भी हैं। एक तरफ घने वृक्षों की छाया में आगे बढती हुई पगडंडी तो सामने दूर दूर तक फैले हुयें ईंटो के बने हुये स्तूप। 
धर्मराजिका स्तूप  का निर्माण अशोक ने करवाया था। दुर्भाग्यवश 1794 ई. में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था। खुदाई के समय 8.23 मी. की गहराई पर एक प्रस्तर पात्र के भीतर संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डिया: एवं सुवर्णपात्र, मोती के दाने एवं रत्न मिले थे, जिसे उन्होंने विशेष महत्त्व का न मानकर गंगा में प्रवाहित कर दिया। यहाँ से प्राप्त महीपाल के समय के 1026 ई. के एक लेख में यह उल्लेख है कि स्थिरपाल और बसंतपाल नामक दो बंधुओं ने धर्मराजिका और धर्मचक्र का जीर्णोद्धार किया।1907-08 ई. में मार्शल के निर्देशन में खुदाई से इस स्तूप के क्रमिक परिनिर्माणों के इतिहास का पता चला। इस स्तूप का कई बार परिवर्द्धन एवं संस्कार हुआ। इस स्तूप के मूल भाग का निर्माण अशोक ने करवाया था। उस समय इसका व्यास 13.48 मी. (44 फुट 3 इंच) था। इसमें प्रयुक्त कीलाकार ईंटों की माप 19 ½ इंच X 14 ½ इंच X 2 ½ इंच और 16 ½ इंच X 12 ½ इंच X 3 ½ इंच थी। सर्वप्रथम परिवर्द्धन कुषाण-काल या आरंभिक गुप्त-काल में हुआ। इस समय स्तूप में प्रयुक्त ईंटों की माप 17 इंच X10 ½ इंच X 2 ¾ ईच थी। दूसरा परिवर्द्धन हूणों के आक्रमण के पश्चात् पाँचवी या छठी शताब्दी में हुआ। इस समय इसके चारों ओर 16 फुट (4.6 मीटर) चौड़ा एक प्रदक्षिणा पथ जोड़ा गया। तीसरी बार स्तूप का परिवर्द्धन हर्ष के शासन-काल (7वीं सदी) में हुआ। उस समय स्तूप के गिरने के डर से प्रदक्षिणा पथ को ईंटों से भर दिया गया और स्तूप तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ लगा दी गईं। चौथा परिवर्द्धन बंगाल नरेश महीपाल ने महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण के दस वर्ष वाद कराया। अंतिम पुनरुद्धार लगभग 1114 ई. से 1154 ई. के मध्य हुआ। इसके पश्चात् मुसलमानों के आक्रमण ने सारनाथ को नष्ट कर दिया।उत्खनन से इस स्तूप से दो मूर्तियाँ मिलीं। ये मूर्तियाँ सारनाथ से प्राप्त मूर्तियों में मुख्य हैं। पहली मूर्ति कनिष्क के राज्य संवत्सर 3 (81 ई.) में स्थापित विशाल बोधिसत्व प्रतिमा और दूसरी धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में भगवान बुद्ध की मूर्ति।

धमेख स्तूप (धर्मचक्र स्तूप) के पास खुदाई से प्राप्त बौद्ध मठयह स्तूप एक ठोस गोलाकार बुर्ज की भाँति है। इसका व्यास 28.35 मीटर (93 फुट) और ऊँचाई 39.01 मीटर (143 फुट) 11.20 मीटर तक इसका घेरा सुंदर अलंकृत शिलापट्टों से आच्छादित है। इसका यह आच्छादन कला की दृष्टि से अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक है। अलंकरणों में मुख्य रूप से स्वस्तिक, नन्द्यावर्त सदृश विविध आकृतियाँ और फूल-पत्ती के कटाव की बेलें हैं। इस प्रकार के वल्लरी प्रधान अलंकरण बनाने में गुप्तकाल के शिल्पी पारंगत थे। इस स्तूप की नींव अशोक के समय में पड़ी। इसका विस्तार कुषाण-काल में हुआ, लेकिन गुप्तकाल में यह पूर्णत: तैयार हुआ। यह साक्ष्य पत्थरों की सजावट और उन पर गुप्त लिपि में अंकित चिन्हों से निश्चित होता है।कनिंघम ने सर्वप्रथम इस स्तूप के मध्य खुदाई कराकर 0.91 मीटर (3 फुट) नीचे एक शिलापट्ट प्राप्त किया था। इस शिलापट्ट पर सातवीं शताब्दी की लिपि में ‘ये धर्महेतु प्रभवा’ मंच अंकित था। इस स्तूप में प्रयुक्त ईंटें 14 ½ इंच X 8 ½ इंच X 2 ¼ इंच आकार की हैं|धमेक (धमेख) शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों का मत है कि यह संस्कृत के ‘धर्मेज्ञा’ शब्द से निकला है। किंतु 11 वीं शताब्दी की एक मुद्रा पर ‘धमाक जयतु’ शब्द मिलता है। जिससे उसकी उत्पत्ति का ऊपर लिखे शब्द से संबंधित होना संदेहास्पद लगता है। इस मुद्रा में इस स्तूप को धमाक कहा गया है। इसे लोग बड़ी आदर की दृष्टि से देखते थे और इसकी पूजा करते थे। कनिंघम ने ‘धमेख’ शब्द को संस्कृत शब्द ‘धर्मोपदेशक’ का संक्षिप्त रूप स्वीकार किया है। उल्लेखनीय है कि बुद्ध ने सर्वप्रथम यहाँ ‘धर्मचक्र’ प्रारंभ किया था। अत: ऐसा संभव है कि इस कारण ही इसका नाम धमेख पड़ा हो। गोल धमेका स्तूप जो अदंर से खोखला है, में लोग ऊपर से रूमाल में पैसा बांध बांध कर  फैंक कर और वुद्ध के पांच शिष्यों को शिक्षा देने बाली मूर्तियों पर लोग कपडे पर अपनी मन्नत लिख कर जा रहे थे। बुद्ध ने राजनीतिक परिवार में जन्म लेने के कारण तत्कालीन समाज, धर्म  एवं राजनीति की गंदगी देखकर ही इससे अलग ब्राह्हण कर्मकांड, ऊंचनीच एवं अवतारवाद से परे एक समान समाज की कल्पना की थी लेकिन अफशोष ! वुद्ध के अनुयायिओं ने खुद बुद्ध को वही बना डाला जिसका कि विरोध उन्हौने किया था। इन तथाकथित भगवानों देवी देवताओं पैगम्बरों नवियों के समाज में इतना ऊंचा स्थान प्राप्त करने का कारण इनके राज्य में इनके आश्रित साहित्यकारों द्वारा लिखा गया इनका रहस्यात्मक एवं चमत्कारिक जीवन वर्णन है जिनमें इन्हें एक राजा की बजाय भगवान घोषित कर दिया गया और इनके हर गलत कार्य को भी इनकी लीला का नाम देकर समाज के लोगों को चुप करा दिया गया। आश्चर्य की बात है कि ऋषियों देवी देवताओं पैगम्बरों के  कारनामों को भी ईश्वर की इच्छा का नाम देकर हमें मूर्ख बनाया गया और हम खुशी खुशी बन भी गये क्यूं कि साहित्य तो उन्ही के चेले चपाटों ने लिखा था और उस पर मौहर ईश्वर की लगा दी ताकि कोई तर्क न कर सके। मुहम्मद साहव ने खुद को आखिरी पैगम्बर घोषित कर आगे अन्य सभी की दुकान बंद करने का पूरा बंदोवस्त कर दिया लेकिन फिर भी पैगम्बरों के आने का सिलसिला रूका नहीं, गुरूनानक, बाबा फरीद , औलिया, चिश्ती, दयानंद, विवेकानंद जैसे पैगम्बर समय समय पर आते रहे और आते भी रहेंगे पर भगवान वही कहलायेगा जिसके हाथ में राजनीतिक शक्ति होगी और चापलूस साहित्यकार होंगे। आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी जब आने बाले समय में मुसलमान तो मुहम्मद को विष्णु के दसवें अवतार( कल्कि)  बता रहे होंगे जबकि भक्त लोग नरेन्द्र मोदी जी को।






















Wednesday, February 1, 2017

बनारस की सैर सज्जाद भाई के साथ ।

मुगलसराय के सज्जाद अली भाई मेरे बनारस आने की सूचना पाते ही सुवह ही गंगा घाट पर आ गये। तब तक मैं स्नान करके बापस घाट पर आ चुका था। सज्जाद अली भाई के बारे में बताना चाहूंगा कि ये मेरे फेसबुक जीवन के शुरूआती मित्रों में से हैं। मैं इनकी शुद्ध और सात्विक हिंदी का बहुत कायल हूं। इनके बराबर क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग अभी तक नहीं देखी थी। धर्म और अध्यात्म पर गहन पकड रखते हैं। चर्चा करते समय इनकी अधिकांश बातें मेरे ऊपर होकर निकल जातीं थीं। बहुत अनुरोध किया तब जाकर कुछ सरल हिंदी पर आये हैं। सनातन हो या इस्लाम धर्म पर यदि ज्ञान विमर्श करने के इच्छुक हों तो सज्जाद अली भाई को जरूर पढें। पूरे धैर्य के साथ अपने ज्ञान से आपको संतुष्ट करेंगे।
स्नान करने के बाद हम लोग पूरा घाट एवं मंदिर की गलियां घूमते घुमाते हुये बाजार पहुंचे जहां मैंने भोजन किया। सज्जाद भाई ने मुझे पैसे भी न देने दिये। पाठक बंधु सोचते होंगे कि ये दोस्तों की मुफ्त रोटी तोडने ही दोस्ती करता है। अब कैसे बताऊं कि एक बार जब दिल मिल जाय तो ये सब चीजें बहुत छोटी नजर आतीं हैं। मुझे अब भी याद है कि उस भोजनालय का बिल चुकाने के लिये भी मुझे सज्जाद भाई से कुस्ती सी लडनी पडी थी पर भाई ने मुझे पैसे नहीं देने दिये जबकि खाना मैंने अकेले ने ही खाया था। खाने के बाद हम लोग सीधे कमरे की तरफ बढ लिये क्यूं कि सज्जाद भाई के साथ मुझे गुफ्तगू जो करनी थी। कमरे पर बैठ कर काफी देर तक धर्म एवं आध्यात्म पर बार्तालाप हुआ। मैं उनकी बातें सुनकर आश्चर्यचकित रह गया कि सनातन की इतनी गहरी जानकारी भाई को कैसे हुई ? शायद यह बनारस जैसी पवित्र नगरी का ही असर था। दो तीन घंटे रुम पर बतियाने के बाद शाम को हम लोग एक बार फिर गंगा घाट की तरफ बढ लिये। इस बार हमने रास्ता दूसरा चुना। मुस्लिम बाहुल्य गलियां थीं। इसी बाजार में बनारस की कुछ फेमस लस्सी एवं मिठाईयों की दुकान थीं। सज्जाद भाई मुझे उन मिठाईयों से परिचित कराना चाहते थे। पहले तो हम दोनों ने एक एक लस्सी खींची। और फिर लोंगलत्ता के अलावा एक और मिठाई खायी और फिर बनारसी पान। सज्जाद भाई जैसे गंभीर भाई भी मुहब्बत में इतने भावुक हो जायेंगे पता नहीं था। जैसे ही मिठाई की दो प्लैट सामने आयीं भाई ने एक प्लैट साईड में सरका दी और अपनी चम्मच से ही मुझे ऐसे खिलाने लगे मानो मैं कोई दूध पीता मासूम बच्चा हूं। फिर क्या मैं भी शुरू हो गया। मुहब्बत ऐसी ही होती है। सब कुछ भुला देती है। जाति धर्म ऊंच नीच अमीरी गरीबी कुछ भी याद नहीं रहता। मुहब्बत का नशा बहुत ही तगडा होता है पर ये बात नफरत में आकंठ डूबे हुये लोगों को कभी समझ न आयेगी। 
घाट पहुंच कर गंगा आरती में भी शामिल हुये। बडा ही शानदार दृश्य था। एक तरफ सजे घाट, दीप लिये पंडितों की कतार और हजारों लोगों का जमघट तो दूसरी तरफ गंगा मैया में तैरती नावों पर बैठे हुये लोग। दूर दूर से लोग आये हुये थे। गंगा को मैं बार बार मैया इसलिये पुकारता हूं क्यूं कि मैंने इसकी पूरी यात्रा कर ली है। हरिद्वार से लेकर कलकत्ता तक मैंने इसका हर रूप देखा है। इसके किनारे बसे हुये शहरों और गावों को भी देखा है। जीवनदायनी है गंगा। लाखों लोगों को रोटी देती है ये मैया। हम दोनों घाट पर आरती में मुग्ध ही थे कि हम लोगों को ढूंढते ढांडते मेरे मित्र Nishakant Tiwari भी आ पहुंचे ।हंसी के ठहाकों के बीच विचारात्मक विरोधियों का मिलना लाजबाब था। घाट पर फेमस गंगा आरती करके हम लोग लौट ही रहे थे कि थाल सजाये एक मोटे पेट बाले तिलकधारी पुजारी ने पकड लिया। जैसे ही तिलक लगाने को आगे बढा, मैंने उसे तिवारी की तरफ सरका दिया। मैं इन कार्यों में ना तो बहुत ज्यादा रूचि रखता हूं और ना ही बहुत ज्यादा बेरूखी। कोई लगा दे तो कोई फर्क नहीं पडता और ना लगाऊं तब भी मेरा ईश्वर नहीं रूठता मुझ से। पर चूंकि मेरे पास खुले पैसे नहीं थे और मुझे पता है कि वो पुजारी कम लागत की दुकान चला रहा था, इसलिये हंसी मजाक करते हुये अपने मित्र Nishakant Tiwari की तरफ इशारा कर दिया कि ये ही पैसे देगा। पर बातों ही बातों में उस पुजारी ने ऐसी बात कह दी कि मुझे शूल की तरह लगी। कहने लगा कि पूजा करना, तिलक लगाना और धर्म कार्य तो ब्राह्मणों की जागीर है, हमारा एकाधिकार है इस पर, हमारे अलावा किसी अन्य की आरती भगवान स्वीकार ही नहीं करते।बस इसी बजह से मैं इन चोंचलों से एलर्जी से रखने लगा हूं। कमबख्तों ने दुकानदारी बना कर रख दी है। सनातन का बेडा गर्क करके रख दिया है। इन पंडों की इसी स्वार्थी मानसिकता के चलते हिन्दूधर्म के इतने विघटन हुये हैं और उन्हें इस बात की कोई चितां तक नहीं है कि हमने अपने समाज का कितना अहित कर दिया है। महात्मा वुद्ध के समय में ये मानसिकता अपने चरम पर थी , शायद यही कारण था कि महात्मा वुद्ध ने पांडित्यवाद का सख्त विरोध करते हुये हिन्दू धर्म छोड कर नया धर्म बना लिया था। वेद व्यास द्वारा रचित श्री मद भागवत और गीता भी पांडित्यवाद, अवतारबाद और वहुदेवबाद के सख्त विरोधी हैं और कर्म पर जोर देते हैं । श्री क्रष्ण ने कर्म को ही असली धर्म बताया है। उन्हौने इन्द्र समेत सभी देवी देवताओं के होने पर सवालिया निशान खडे किये हैं और उनका मजाक भी उडाया है। वो अलग बात है कि इन पंडों से जो भी टकराया है और उनकी दुकानदारी को खतरे में डाला है, उन्हौने उसी को अवतारवाद में लपेट कर उसके मूल उद्देश्य को दबा दिया है और कांजी भाई की तरह उसी की पूजा प्रारंभ कर दी है। और कर बेटा हमारा विरोध। तू हमारी दुकान बंद करेगा हम तुझे ही अपनी दुकान बना लेंगे। भले ही पांडित्यवर्ग कितना ही हिन्दू धर्म पर हावी हो पर अभी ये नौवत नहीं आयी कि कोई मुझे धार्मिक होने को वाध्य करे या किसी दलित से पूजा हवन कथा करवाने पर मेरा सर फोड दे। मुझे खुशी है कि आज तक किसी पंडे ने मुझे वाध्य नहीं किया कि हर रोज मंदिर आओ, और फिर कोई वाध्य करता भी तो मानता कौन उन मौटे मौटे पेट बाले लुटेरों की ?
मैं ऐसे पंडे पुजारियों को पैसा देने की अपेक्षा ट्रैन के डिब्बे में झाडू लगाकर पैसे मांगने बाले को देना अधिक पंसद करता हूं। कम से कम उसने कोई कर्म तो किया है। मेहनत करके मांगा है,इन निठल्ले पंडों की तरह कोई भीख तो नहीं मांगी। बनारस के घाट पर फैले हुये कुडे करकट कचरे को साफ करते हुये मैंने इन पंडो को यदि देखा होता तो मैं खुद ही इनकी थाली में खुशी खुशी भेंट चडा रहा होता।
मैं और तिवारी ने सज्जाद भाई को यहीं से विदा कर दिया और हम दोनों रुम पर चले आये थे। रात भर अपने कालेज लाईफ की यादों को ताजा करते रहे। सही कहूं तो मैं आज टीचर हूं तो इसी तिवारी की बजह से हूं वरना मैंने तो अपनी बी एड की डिग्री  नेतागीरी में गंवा दी होती।
अगले ही दिन तिवारी तो जौनपुर निकल गया और मैं सारनाथ की तरफ।