Tuesday, February 28, 2017

महेश्वर: इतिहास

महेश्वर प्रसिद्ध नगरों में से एक रहा है। निमाड़ एवं महेश्वर का इतिहास लगभग 4500 वर्ष पुराना है। रामायण काल में महेश्वर को 'माहिष्मती' के नाम से जाना जाता था। उस समय 'महिष्मति' हैहय वंश के बलशाली शासक सहस्रार्जुन की राजधानी हुआ करता था, जिसने बलशाली लंका के राजा रावण को भी परास्त किया था। महाभारत काल में यह शहर अनूप जनपद की राजधानी बनाया गया था। सहस्रार्जुन द्वारा ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण उनके पुत्र भगवान परशुराम ने सहस्त्रार्जुन का वध किया था।
हैहयवंश में उत्पन्न कार्तवीर्य अर्जुन बड़ा प्रतापी और शूरवीर था। उसने अपने गुरु दत्तात्रेय को प्रसन्न करक वरदान के रूप में उनसे हज़ार भुजाएं प्राप्त की थीं। हज़ार भुजाएं होने के कारण अर्जुन सहस्त्रबाहु के नाम से भी जाना जाता था। उसने सभी सिद्धियां भी प्राप्त थीं। सहस्रबाहु को अपने बल और वैभव का बड़ा गर्व था। एक बार वह गले में वैजयंतीमाला पहने हुए नर्मदा नदी में स्नान कर रहा था। उसने कौतुक ही कौतुक में अपनी भुजाओं में अपनी भुजाओं को फैलाकर नदी के प्रवाह को रोक लिया। लंकाधिपति रावण को, जो उसी समय नर्मदा में स्नान कर रहा था, सहस्त्रबाहु का यह कार्य बड़ा ही अनुचित और अन्यायपूर्ण लगा। उसे भी अपने बल का बड़ा गर्व था। वह सहस्त्रबाहु के पास जाकर उसे खरी-खोटी सुनाने लगा। सहस्त्रबाहु उसकी खरी-खोटी सुनकर क्रुद्ध हो उठा। उसने उसे देखते-ही-देखते बंदी बना लिया। सहस्त्रबाहु ने बंदी रावण को अपने कारागार में बंद कर दिया। किंतु पुलस्त्य ॠषि ने दयालु होकर उसे मुक्त करा दिया। फिर भी रावण के मन का अभिमान दूर नहीं हुआ। वह अभिमान के मद में चूर होकर ही ॠषियों और मुनियों पर अत्याचार किया करता था। सहस्त्रबाहु के अभिमान का तो कहना ही क्या था। वह तो सदा अभिमान के यान पर बैठकर गगन में उड़ा करता था। एक बार सहस्त्रबाहु उस वन में आखेट के लिए गया, जिस वन में परशुराम के पिता जमदग्नि का आश्रम था। सहस्त्रबाहु अपने सैनिकों के साथ उनके आश्रम में उपस्थित हुआ। जमदग्नि ने अपनी गाय कामधेनु की सहायता से सहस्त्रबाहु और उसके सैनिकों का राजसी स्वागत किया और उनके ख़ान-पान का प्रबंध किया। कामधेनु का चमत्कार देखकर सहस्त्रबाहु उस पर मुग्ध हो गया। उसने जमदग्नि से कहा कि वे अपनी गाय उसे दे दें। किंतु जमदग्नि कामधेनु को क्यों देने लगे? उन्होंने इन्कार कर दिया। उनके इन्कार करने पर सहस्त्रबाहु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले चलें।सहस्त्रबाहु कामधेनु को अपने साथ ले गया। उस समय आश्रम में परशुराम नहीं थे। परशुराम जब आश्रम में आए, तो उनके पिता जमदग्नि ने उन्हें बताया कि किस प्रकार सहस्त्रबाहु अपने सैनिकों के साथ आश्रम में आया था और किस प्रकार वह कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया। घटना सुनकर परशुराम क्रुद्ध हो उठे। वे कंधे पर अपना परशु रखकर महिष्मती की ओर चल पड़े, क्योंकि सहस्त्रबाहु महिष्मती में ही निवास करता था। सहस्त्रबाहु अभी महिष्मती के मार्ग में ही था कि परशुराम उसके पास जा पहुंचे, सहस्त्रबाहु ने जब यह देखा के परशुराम प्रचंड गति से चले आ रहे हैं, तो उसने उनका सामना करने के लिए अपनी सेनाएं खड़ी कर दीं। एक ओर हज़ारों सैनिक थे, दूसरी ओर अकेले परशुराम थे, घनघोर युद्ध होने लगा। परशुराम ने अकेले ही सहस्त्रबाहु के समस्त सैनिकों को मृत्यु के मुख में पहुंचा दिया। जब सहस्त्रबाहु की संपूर्ण सेना नष्ट हो गई, तो वह स्वंय रण के मैदान में उतरा, वह अपने हज़ार हाथों से हज़ार बाण एक ही साथ परशुराम पर छोड़ने लगा। परशुराम उसके समस्त बाणों को दो हाथों से ही नष्ट करने लगे। जब बाणों का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा, तो सहस्त्रबाहु एक बड़ा वृक्ष उखाड़कर उसे हाथ में लेकर परशुराम की ओर झपटा। परशुराम ने अपने बाणों से वृक्ष को तो खंड-खंड कर ही दिया, सहस्त्रबाहु के मस्तक को भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। वह रणभूमि में सदा के लिए सो गया।परशुराम सहस्त्रबाहु को मारने के पश्चात कामधेनु को लेकर अपने पिता की सेवा में उपस्थित हुए। महर्षि जमदग्नि कामधेनु को पाकर अतीव हर्षित हुए। उन्होंने परशुराम को ह्रदय से लगाकर उन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए। परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे। वे उन्हें परमात्मा मानकर उनका सम्मान किया करते थे। जमदग्नि बहुत बड़े योगी थे। उन्होंने योग द्वारा सिद्धियां प्राप्त की थीं।सवेरे का समय था, जमदग्नि की पूजा का समय हो गया था। परशुराम की मां रेणुका जमदग्नि के स्नान के लिए जल लाने के लिए सरोवर पर गईं। संयोग की बात, उस समय एक यक्ष सरोवर में कुछ यक्षिणियों के साथ जल-विहार कर रहा था। रेणुका सरोवर के तट पर खड़ी होकर यक्ष के जल-विहार को देखने लगीं। वे उसके जल-विहार को देखने में इस प्रकार तन्मय हो गईं कि यह बात भूल-सी गईं कि उसके पति के नहाने का समय हो गया है और उन्हें शीघ्र जल लेकर जाना चाहिए। कुछ देर के पश्चात रेणुका को अपने कर्तव्य का बोध हुआ। वे घड़े में जल लेकर आश्रम में गईं। घड़े को रखकर जमदग्नि से क्षमा मांगने लगीं। जमदग्नि ने अपनी योग दृष्टि से यह बात जान ली कि रेणुका को जल लेकर आने में देर क्यों हुईं। जमदग्नि क्रुद्ध हो उठे। उन्होंने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि रेणुका का सिर काटकर धरती पर फेंक दें। किंतु परशुराम को छोड़कर किसी ने भी उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया। परशुराम मे पिता की आज्ञानुसार अपनी मां का मस्तक तो काट ही दिया, अपने भाइयों का भी मस्तक काट दिया। जमदग्नि परशुराम के आज्ञापालन से उन पर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उनसे वर मांगने को कहा। परशुराम ने निवेदन किया, 'पितृश्रेष्ठ, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी मां और मेरे भाइयों को जीवित कर दें।' परशुराम की मां और उनके भाई पुनः जीवित हो उठे।कामधेनु को पाने पर जमदग्नि को अतीव प्रसन्नता तो हुई थी, किंतु उन्हें यह जानकर बड़ा दुख भी हुआ कि परशुराम ने सहस्त्रबाहु का वध कर दिया है। उन्होंने परशुराम की ओर देखते हुए कहा, 'बेटा, तुमने सहस्त्रबाहु का वध करके अच्छा नहीं किया। हम ब्राह्मणों की शोभा क्रोध से नहीं, क्षमा से बढ़ती है। क्षमा से ही ब्रह्मा ब्रह्म पद को प्राप्त हुए हैं। राजा ब्राह्मण के सदृश होता है। तुमने सहस्रबाहु का वध करके ब्राह्मण की हत्या की है। तुम्हें हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए एक वर्ष तक तीर्थों में भ्रमण करना चाहिए।' पिता की आज्ञा मानकर परशुराम तीर्थों की यात्रा पर चले गए। वे पूरे वर्ष भर तीर्थों में ही भ्रमण करते रहे। उनके पिता ने इसके लिए हर्ष तो प्रकट किया ही था, उन्हें आशीर्वाद भी दिया था। उधर, सहस्त्रबाहु के पुत्र अपने पिता का बदला लेने के लिए अवसर ढूंढ़ रहे थे। एक दिन जब परशुराम और उनके भाई आश्रम में नहीं थे, तो सहस्त्रबाहु के पुत्र आश्रम में आ धमके। जमदग्नि यज्ञमंडप में ध्यानस्थ बैठे थे। सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने उनका मस्तक काट डाला। वे अपने साथ उनका मस्तक भी ले गए। रेणुका विलाप करने लगीं, आर्त्तनाद करने लगीं। संयोग की बात, परशुराम शीघ्र ही आ गए। वे शोकमग्ना अपनी मां के मुख से पिता के शिरोच्छेद किए जाने की बात सुनकर क्रुद्ध हो उठे। वे अपने परशु को लेकर महिष्मती की ओर दौड़ पड़े। उन्होंने महिष्मती को तो उजाड़ ही दिया। सहस्त्रबाहु के पुत्रों को भी मार डाला। उन्होंने अपने पिता का मस्तक लाकर अपनी मां को दिया। रेणुका अपने पति के साथ सती हो गईं। इस घटना के पश्चात परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था। श्रीराम ने जब उनके क्रोध को शांत किया, तब वे पर्वत पर जाकर तप करने लगे। उनकी शूरता और वीरता ने उन्हें अमर बना दिया।
कालांतर में यह शहर होल्कर वंश की महान महारानी देवी अहिल्याबाई की राजधानी रहा। महेश्वर को प्राचीन समय में 'माहिष्मती' कहा जाता था। तब माहिष्मति चेदि जनपद की राजधानी हुआ करती थी, जो नर्मदा नदी के तट पर स्थित थी। महाभारत के समय यहाँ राजा नील का राज्य था, जिसे सहदेव ने युद्ध में परास्त किया था। राजा नील महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था। बौद्ध साहित्य में माहिष्मति को दक्षिण अवंति जनपद का मुख्य नगर बताया गया है। बुद्ध काल में यह नगरी समृद्धिशाली थी तथा व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्यात थी। तत्पश्चात उज्जयिनी की प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ-साथ इस नगरी का गौरव कम होता गया। फिर भी गुप्त काल में 5वीं शती तक माहिष्मति का बराबर उल्लेख मिलता है। कालिदास ने 'रघुवंश' में इंदुमती के स्वयंवर के प्रसंग में नर्मदा तट पर स्थित माहिष्मति का वर्णन किया है और यहाँ के राजा का नाम 'प्रतीप' बताया है। महेश्वर को 'चोली-महेश्वर' भी कहा जाता है, प्राचीन स्थल माहेश्वरी पर स्थित यह स्थान हैहय राजा अर्जुन कर्तवीर्य (लगभग 200 ई.पू.) की राजधानी था, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत और कुछ पुराणों में भी मिलता है।




















Sunday, February 26, 2017

पचमढी: पांडव, महादेव एवं गुप्तेश्वर गुफा ।।


पचमढ़ी पांडवों के लिए भी जानी जाती है। यहां की मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ काल यहां भी बिताया था और यहां उनकी पांच कुटिया या मढ़ी या पांच गुफाएं थीं जिसके नाम पर इस स्थान का नाम पचमढ़ी पड़ा है। एक छोटी पहाड़ी पर ये पांचों गुफाएं हैं। वैसे इन्हें बौद्धकालीन गुफाएं भी कहा जाता है। इस प्रकार की गुफाओं मंदिरों को अक्सर पांडवों से जोड दिया गया है। देशभर में घूमते हुये हजारों स्थान देख लिये जो पांडवों से संबधित बताये जाते हैं। सच्चाई क्या है ईश्वर जाने लेकिन जगह बहुत ही रमणीक हैं। पचमढी की इन गुफाओं के आगे एक बहुत सुंदर बगीचा भी है जिसमें सैकडों प्रजाति के फूल और पोधों हैं। गुफाओं के मेनगेट के बाहर ही बच्चों की छोटी छोटी बाइक्स हैं जो मात्र पचास रुपये में किराये पर दी जाती हैं। विकी ने गाडी ली और पीछे गाडी मालिक को बिठा लिया। सौ मीटर दूर एक पुराना चर्च है बहां तक चला कर ले गया और लौटा लाया। 
शिवशंकर के मंदिर सबसे अधिक हैं यहां जिनमें सबसे प्रसिद्ध हैं, जटाशंकर महादेव और गुप्त महादेव। - गुप्त महादेव जाने के लिए दो बिलकुल सटी हुई पहाड़ियों के बीच से गुजरना होता है जबकि जटाशंकर मंदिर पचमढ़ी बस स्टैंड से महज डेढ़ किलोमीटर दूर है और वहां जाने के लिए पहाड़ी से नीचे उतरकर खोह में जाना होता है। कहा जाता है कि भस्मासुर से बचने के लिए ही भोले शंकर इन दोनों जगहों पर छिपे रहे थे। - इसके अलावा तीसरा प्रसिद्ध मंदिर महादेव मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि भस्मासुर से बचते हुए अंत में शिवजी यहां छिपे और यहीं पर भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप लेकर भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए मजबूर कर उसका विनाश किया था। महादेव गुफा आकर्षण का बडा केंद्र है, जहां पत्थरों पर की गई अनूठी चित्रकारी बरबस ही आपका ध्यान आकर्षित करती है। कहते हैं कि यह चित्रकारी 5 से 8वीं शताब्दी के बीच की गई थी। कुछ चित्र तो इससे भी दस हजार साल पुराने बताये जाते हैं।
महादेव गुफा मंदिर की ओर चलते हुये बीच रास्ते में जिप्सी रुकी हुई दिखाई दी तो हमने भी अपनी बाइक पार्क कर दी और चल पडे हरे भरे पेडों के बीच ऊंची नीची पगडंडियों पर। करीब पांच सौ मीटर चलने के बाद एक गहरी खाई आती है और रास्ता समाप्त। हम दोनों के अलावा दस लोग और थे। दुकान के नाम पर बस एक ठेली थी जिस पर रख कर एक औरत फल इत्यादि बेच रही थी। बंदरों से थोडा सावधान रहना होता है यहां झपट्टा मार ले जाते हैं। जमुना प्रपात, रजत प्रपात और जलावतरण प्रपात तो जैसे पचमढी की अल्हडता के गीतों का सामुहिक गान हैं। जमुना प्रपात में जहां आप झरने के किनारे बैठने से लेकर नहाने तक का लुत्फ उठा सकते हैं, वहीं हांडी खोह के पेड-पौधे तो आपको किसी और ही दुनिया का आभास करायेंगे। भगवान शिव से जुडे हजारों साल पुराने मन्दिरों जटाशंकर गुफा, महादेव और छोटा महादेव मन्दिर की प्राकृतिक मनोहारी छटा जहां धार्मिक लोगों को आकर्षित करती है, वहीं प्रकृति प्रेमियों को भी। हम थोडी देर बाद चहलकदमी करने के बाद निकल पडे गुफा की ओर। करीब दस किमी की पहाडों में बाइक राइडिगं में जो मजा आया वो शायद ही किसी मंदिर को घूमने में आया हो। महादेव गुफा के पास ही बाहर कमल के फूल बेचने बाली बैठी थी। हमने बाइक वहीं पार्क कर दी। चल दिये गुफा की ओर। सौ मीटर की दूरी पर ही है। चारों ओर बस त्रिशूल ही त्रिशूल। निगाह लगाये बंदर। घने पेडों की छांव। चहचहाते पक्षियों का मधुर कलरव। जरा भी शोर शरावा नहीं। एकदम शांति। गुफा में घनघोर अंधेरा और ऊपर से टपकता जल। गुफा के अतं में रखी हुई पिंडी। बीच में जल कुंड। प्राकृतिक करिश्मा को हम बहुत अच्छे से भुनाना जानते हैं। बिठा दो एक शिवलिंग और पूजापाठ शुरू। जो भी है हम प्रकृतिपूजक हैं इसमें हमें गर्व है बस ये ध्यान रहे कि हम प्रकृति के संरक्षण के लिये इन्हें भगवान माने हैं इन्हें उजाडने के लिये नहीं। गुप्तेश्वर गुफा भी बहां से अधिक दूर नहीं थी। दस मिनट में ही पहुंच गये। थोडा दूर जंगल में पैदल भी चलना पडा। एकदम संकरी गुफा। मुश्किल से दो चार लोग ही घुस सकते थे एक बार में। प्रकृति का एक और अजूबा सामने था हमारे। आप बस एक बार घर से निकल तो पडो फिर देखो प्रकृति के कितने चमत्कार भरे पडे हैं दुनियां में। मैं तो सीधे भी नहीं चल पा रहा था। आडे आडे गया और बैसे ही आया। अदंर थोडी सी जगह मिली तब थोडा डर दूर हुआ। बाहर से एक्जास्ट फैन से हवा भी डाली जा रही है ताकि दम न घुटे।























( मेरे दोस्त राही की आत्मकथा : राज; एक अधूरी प्रेम कहानी )

कल एक बचपन के मित्र से अचानक मुलाकात हो गयी। और वो भी पूरे चौबीस साल बाद। इसी बीच उसकी एक डायरी पढने का भी मौका मिला। उसने अपनी प्रेम कहानी लिखी थी उसमें। मुझे उसकी प्रेम कहानी में रूचि इसलिये थी कि थोडी बहुत मेरी भी उपस्थिति थी उसमें। इस पूरी प्रेम कहानी में जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया था, वह थी ईश्वर की मौजूदगी। हालांकि मैं प्रकृतिवादी हूं , वर्डसवर्थ की तरह पेड पोधों फूल पत्तियों नदियों झरनों हवाओं और फिजाओं में ही उसे साक्षात रूप में देखता रहा हूं, लेकिन फिर भी जीवन के कुछ अनुभव ऐसे हैं कि लगता है कि मेरी ईश्वर से बात होती है और वह मुझे सुनता है। उसका नाम क्या है , रुप क्या है, मुझे कुछ नहीं पता बस इतना मालुम है कि उस तक मेरी बात पहुंचती है। उससे मिलने के लिये मुझे किसी मंदिर मस्जिद नहीं जाना पडता, कहीं भी, कभी भी मिल जाता है वो मुझे। इस बात को शायद कोई और न समझ पाये पर चूंकि मैंने अनुभव किया है तो मैं ही समझ पाऊंगा। शायद यही कारण रहा कि मैं चाह कर भी कभी नास्तिक नहीं बन पाया। धार्मिक किताबों, उनके पात्रों और पंडे पुजारियों के लिये बहुत कुछ उल्टा सीधा लिखा करता था पर नास्तिक फिर भी न बन पाया । कहूं कि ईश्वर ने मुझे बनने ही नहीं दिया। जब भी कभी ऐसी नौबत आती वह अपनी उपस्थिति दे जाता। एक बार नहीं सैकडों बार उससे मेरी बातें हुयीं हैं। आज जब ये डायरी पढी तो लगा जैसे मेरी अपनी ही कहानी हो।

एक लडकी अत्यंत भावुक, ईमानदार और सीधी सच्ची लडकी अपनी गरीबी, पिछडी जाति में पैदा होने के दंश एवं अपने पिता के जुआ खेलने और घर पर कर्जदारों की लाईन लगे रहने के वावजूद पढ लिख कर शिक्षिका बनने में सफल रही कितुं सुख उस अभागी को कभी प्राप्त नहीं हुआ क्यूं कि उसने केवल समर्पण ही करना सीखा था। अपने हक को प्राप्त करना नहीं सीख पायी वो। जब वो दस वर्ष की थी , पडौस में एक किरायेदार के खुद से पांच वर्ष बडे लडके मतलब मुझसे मन ही मन प्रेम करने लगी। वह मूक एकतरफा प्रेम एक साल तक उसके मन में ही रहा, कह न पायी अपने मन की बात। लडकी का भाई भी मेरी क्लास में था। मैं बारहवीं कक्षा में था और वह आठवीं कक्षा में।
ऐसा नहीं था कि मैं एकदम शरीफ सीधा साधा इन सब बातों से दूर रहने बाला था। एकदम रसिक था मैं भी। अब तक बीसियों गर्लफ्रेंड बना चुका था। पर कहते हैं न कि चोरों के भी ईमान होते हैं या कहो कि चोरों के ही ईमान होते हैं, मुझे अपने दोस्त की बहिन की तरफ देखना मंजूर न था। नया नया दोस्त बना था नये गांव में। और किसी को जानता तक न था उसके अलावा। अनेकों बार ऐसे अवसर आये जब लंच टाईम में मेरे अन्य साथी लडकी की सहेलियों के चक्कर में पानी की टंकी के पास मंडराते रहते लेकिन मैंने कभी भी उस लडकी की तरफ नजर उठा भी न देखा।मेरे दिमाग में बस एक ही बात थी कि दोस्त की बहिन है। हालांकि मैं किसी दूसरे शहर से अभी अभी इस गांव में आकर बसा ही था फिर भी एक गर्लफ्रेन्ड बन चुकी थी। जो मेरे बहुत ही ज्यादा करीब आयी थी, उसी लडकी की पडौसन थी जो मुझे मन ही मन अपना भगवान मान बैठी थी और अक्सर मेरे बारे में ही सोचा करती थी। कच्ची उम्र का कच्चा प्रेम बहुत खतरनाक होता है।महज चौदह वर्ष की उम्र थी लडकी की। मैं भी इसे प्रेम की बजाय आकर्षण ही कहता यदि मैंने ये लंबा प्रेमकाल न देखा होता तो। मैं सीनियर स्कूल में था और वह जूनियर गर्ल्स स्कूल में। वह अपने स्कूल में बैठी बैठी अपने मन की बातों को कागज में उतारती रहती। ऐसे ही धीरे धीरे उसने एक घडा पत्रों से भर दिया था लेकिन ये पत्र कभी उसने मुझे दिये नहीं। एक दो बार उसकी सहेलियों से उसकी पागलों जैसी हालत देखी नहीं गयी तो सलाह दी कि वह उसे सारी बात बता दे लेकिन हिम्मत न कर सकी। बस मन ही मन पूजती रही। 
और उधर मैं एकदम मस्त मौला टाईप, पूर्ण भौतिकवादी, चार्वाक गुरू का चेला, खाओ पीओ मौज करो, हर दूसरे दिन एक नयी गर्लफ्रेंड बना रहा। लेकिन मुझे कहीं भी संतुष्टि नहीं मिली। कहते हैं जब इंसान भौतिकता की सारी चढाई चढ लेता है उसका उतार शुरू हो जाता है और आध्यात्मिक झुकाव प्रारंभ हो जाता है। हालांकि मैं हर रोज लंच टाईम में उसके स्कूल के सामने जाता था अपने दोस्त के साथ। मेरा दोस्त अपनी गर्लफ्रैंड से मिलने जाता था और मैं उसके साथ उसका रक्षक बन कर खडा रहता। उधर मुझे पता भी नहीं था कि मैं यहां आया नहीं बल्कि किसी के द्वारा बुलाया जा रहा था। दर असल वो लडकी हर रोज लंच से पहले प्रार्थना करती रहती थी कि काश मैं उसे देख पाऊं ! बस एक झलक ! मैं इन सब बातों से अनभिज्ञ था। वह मुझे देखती रहती थी छिपकर पर मैंने कभी नोटिस नहीं किया इस बात को। 
एक दिन शाम को छत पर मैं और मेरा दोस्त दोनों बैठे बतिया रहे थे कि उससे मन की बात कहने लगा," यार सब कुछ है मेरे पास। धन दौलत नाम खानदान सबकुछ पर सच्चा प्यार नहीं मिला।"
उसे जोर की हंसी आयी," और कितनी बनायेगा बे ? सौ के पार तो तेरा आकणा पहुंच गया होगा ?" 
दुखियाते हुये गंभीरता से बोला," तू सही कह रहा है पर दिल की बात बता रहा हूं। ये सारी लडकियां मेरे भौतिक आवरण से प्रेम करने बाली हैं और मैं ईश्वर से एक ऐसी लडकी चाहता हूं जो भले सुंदर न हो, गरीब हो, किसी भी जाति की हो, पर मुझे आत्मिक प्रेम करने बाली हो। मैं उसे अपना जीवन साथी बनाना चाहता हूं। थक गया हूं यार इस चमकीली नकली दुनियां से। अब मुझे सच्चा भावनात्मक संसार चाहिये।" 
उसी शाम को हम दोनों बतियाते हुये मंदिर की ओर बढ चले थे। और मैंने पहली बार खुद को भगवान के सामने गिडगिडाते हुये रोते हुये देखा था। बडा अजीब सा दृश्य था। भगवान को न मारने बाला, हरदम उसकी मजाक बनाने बाला आज उसके सामने हाथ पसारे सच्चे प्रेम की भीख मांग रहा था। मुझे तो शायद पता भी नहीं था कि मेरा सच्चा प्रेम पिछले एक साल से मेरा इंतजार कर रहा था। 
एक साल बाद मेरे को पता चला कि एक लडकी है जो मुझे भगवान की तरह पूजती है तो मैं भी उसके प्रेम और समर्पण के आगे नतमस्तक हो गया। हम दोनों के प्रेम की शुरुआत बाला दिन भी मुझे अच्छे से याद है जब मैं किसी कार्य से अपनी हीरो रेंजर साइकिल पर गांव के बाहर एक बगीचे से निकल कर जा रहा था कि दो लडकियों ने मेरा रास्ता रोक लिया था। एक तो वही थी और दूसरी उसकी घनिष्ठ सहेली जिससे वह अपनी हर बात शेयर करती थी।
मैंने उसे तुरंत पहचान लिया उसे। आखिर कैसे न पहचानता उसे। आखिर दोस्त की बहन थी। न जाने कितनी बार उसकी तरफ आकर्षित हुआ था कितुं हर बार दिल और दिमाग की जंग में दिमाग की जीत हुई थी और यह कहते हुये दिल को समझा दिया था कि ये तो दोस्त की बहिन है। इधर नहीं देखना। पर शायद ऊपर बाले को कुछ और ही मंजूर था। लग रहा था जैसे एक दिन पहले भगवान के सामने की गयी विनती काम कर रही थी और उसने इसी को मेरे लिये चुना था। जैसे ही वे दोनों लडकियां एकदम एकांत रास्ते में आकर मेरी साइकिल के सामने आकर खडी हुईं और कडक आवाज में मुझसे शिकायती लहजे में बोलीं," आप होंगे बडे घर के। पर आपको मेरे पापा के बारे में वकबास करने का कोई हक नहीं है। मेरे पापा जो भी हैं जैसे भी हैं, मेरा गुरूर हैं। बहुत प्यार करती हूं उनसे। खबरदार जो आज के आइंदा उनके बारे में एक भी शब्द बोला तो ।" 
मैं तो भौंचक्का सा मुंह फाडे बस उन्हें सुना ही जा रहा था। सोच ही नहीं पाया कि क्या जबाब दूं ? और जबाब भी क्या देता ? गलती मेरी ही थी। एक दो दिन पहले ही उसके घर के सामने रहने बाली एक लडकी से उसके पिता के बारे में उलूल जुलूल बात कह बैठा था। दरअसल मेरा उद्देश्य उसके पिता की बेइज्जती करना नहीं था बल्कि बस नाराजगी भर थी। उसके पिता जुआ खेलते थे। जिसकी बजह से उनका परिवार बहुत ज्यादा आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। चूंकि उसका बडा भाई मेरा क्लासमेट था और क्लास में सबसे होशियार था। ईश्वर ने सभी बच्चों को बहुत तेज बुद्धि दी थी जिसके बलबूते वे सभी बुलंदियां छू सकते थे। पर उनकी जुए की लत ने सब खेल बिगाड रखा था। दिन में वर्फ की पेटी साइकिल पर रख बेचने जाते । दिन भर में सौ दो सौ रुपये कमाते और शाम को सब जुए में हार जाते। इतना सब होने के वावजूद पिता के प्रति इतना सम्मान और समर्पण देखकर तो जैसे उसके प्रति दिल में इज्जत और बढ गयी। पता ही नहीं चला कि कब उससे प्रेम कर बैठा। प्रेम भी ऐसा बैसा नहीं । पूरे जीवन भर का ठेका। मेरे मन में पूरा विश्वास बैठ गया था कि कल भगवान ने मेरी बात सुन ली है और उसी ने आज ये मुलाकात करायी है। मुझे तो पता भी नहीं था कि वह पिछले एक साल से पागलों की तरह मुझसे प्यार किये जा रही थी। कागजों पर दीवारों पर पत्थरों पर मेरा नाम लिखती रहती थी। जब भी मैं उसके घर के सामने रहने बाली लडकी से मिलने आता तो जानबूझ कर कपडे धोने के बहाने चबूतरे पर आकर बैठ जाती थी और फिर फिर किताब लेकर छत पर चली जाती और बहां से छिप छिप कर मुझे देखा करती थी जबकि मेरा उसकी ओर ध्यान ही नहीं था। एक दो बार ध्यान गया भी तो मन को समझा लिया। उसके सामने बाली लडकी से मेरा अभी नया नया ही परिचय था। मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं जानता था। न तो मुझे उससे प्रेम था और उसे मुझसे। बस दोनों ही अपनी अपनी जरूरतें पूरा करना चाहते थे। मैं शरीर की और वह पैसे की। लेकिन ये उसके बारे में सबकुछ जानती थीं कि वह कितनी चरित्रहीन है । इसलिये मुझे आगाह भी करना चाहती थी क्यूं कि मैं बिल्कुल नया था उस गांव में। वह लडकी तो उसे अब काल की तरह लगने लगी थी उसे। उसे लगता था कि मैं उसके लिये ही ऊपर बाले ने भेजा हूं तो ये कौन होती है मुझसे मेरा प्रेम छीनने बाली। लगभग साल भर से वह मुझे और अपनी पडोसन को हंसते बोलते मस्ती करते देख देख जली जा रही थी। लेकिन कभी उसने मुझे टोका नहीं। कभी बात नहीं की। हालांकि इस बीच मैं बहुत बार उसके घर भी हो आया था पर वह हमेशा अंदर बाले कमरे से छिप छिप कर देखती रहती। पढने में बहुत होशियार थी। हर समय पढती रहती थी इसलिये उसके भाई या उसके माता पिता को उस पर कभी शक भी नहीं हुआ था । बैसे भी उसका मूक प्रेम था मेरे प्रति। देखते देखते साल भर निकल गया। परीक्षायें भी हो गयीं। मुझे बारहवीं पास करके वो गांव छोडकर शहर पडने जाना था और उसे नौवीं कक्षा में मेरे बाले स्कूल में ही आना था। हे भगवान ! ये कैसी परीक्षा ली तूने ! जिस स्कूल में आने का पिछले एक साल से मैं सपना देख रही थी, वो अब मेरे किस काम का ? यदि यही जा रहा है तो मैं उन पत्थरों से सर फोडूंगी ? जबकि अभी तो उससे अपने मन की बात कह भी नहीं पायी थी।
22 अप्रैल की बात थी। परिक्षायें हो चुकी थीं। और मुझे बस एक दो दिन में रुम खाली कर शहर शिफ्ट होना था। उसी से एक दो दिन पहले सामने रहने बाली उस लडकी का बदचलन चेहरा भी सामने आ गया था। पता चला कि उसके भी मेरे समेत करीब बीस लोगों से संबध थे। दिल तो न टूटा था खैर क्यूं कि उसके साथ दिल से जुडा ही कब था मैं ? सिर्फ जिस्म से जुडा था। बातों ही बातों में मैंने उस लडकी से भी उसी दिन संबध तोडा था और कुछ बातें इसके जुआरी पिता के बारे में कह दी थीं जो उसने बदला लेने के मूड से इस लडकी को बता दी थीं। बस उसी दिन इसने मुझे अपनी सहेली के साथ सुनसान रास्ते में रोक लिया था। और अपने पिता के बारे में कही गयी बातों पर मुझे खूब सुनायी थी। वह भूल गयी थी कि वह मुझे कितना चाहती है ! बस वो मेरा आखिरी दिन था लडकियों को दोस्त बनाने का। उसके बाद आज तक मेरी कोई दोस्त नहीं बनी। वही मेरा अतिंम प्रेम है। प्रेम तो उससे पहले भी कभी किसी से नहीं किया था इसलिये कह सकता हूं कि वही मेरा पहला और अतिंम प्रेम है।
पर ये कैसी विडबंना ! प्रेम होते ही विछोह ? ईश्वर से सीधे साक्षात्कार हुआ मेरा । ये कैसा न्याय तेरा ? कम से कम एक साल तो साथ रहने देता न ? शायद इसी तरह के विचार कुछ उसके भी दिमाग में आ रहे थे। मुझे अगले ही दिन उस गांव को छोडकर गर्मियों की छुट्टियां बिताने अपने गांव जाना था और फिर वहां से शहर अगली पढाई के लिये। मुझे रहा न गया। एक छोटी सी पर्ची लिखी जिसमें लिखा था," मैं तुम्हें अपना साथी बनाना चाहता हूं। हमेशा के लिये। जीवन भर का साथी । बनोगी ? ले पाओगी दुनियां से टक्कर ? दे पाओगी मेरा साथ ?"
मैं इतना भावावेश में था कि बिना किसी की परवाह किये उसके घर चला गया और उसके हाथ में वो पर्ची पकडा दी। संयोग से घर पर कोई नहीं था। उसने मुझे शाम तक जबाब देने को कहा और मैं इंतजार करता रहा। शाम तक उसका कोई जबाब नहीं आया। पूरी रात सो न सका। बैचेनी रही। मन करा अभी जाकर पूछ आऊं। और ऐसे ही सुवह हो गयी।
अगले दिन जब मैं अपनी साइकिल से अपने गांव के लिये रवाना हो रहा था तो वो मुझे रास्ते में ही मिली। अपने कच्चे घर को लीपने के लिये पीली मिट्टी खोदने आयी थी। वो तो एक बहाना था मुझसे मिलने का। हालांकि मेरे पास नहीं आयी पर उसकी आखें और उसका लहराता हाथ बता रहा था कि वो भी मुझसे प्रेम करती है। उसे मेरा प्रस्ताव मंजूर था। मैं उसकी यादों में खोया हुआ अपने गांव की ओर रवाना हो गया। मेरे पिता के स्कूल की छुट्टियां नहीं हुयी थीं अभी इसलिये वो अभी अपने रुम पर ही थे। उनको अभी एक महीना और रुकना था इस गांव में। मेरे चले जाने के बाद मेरे पिता अकेले रह गये थे रुम पर और उन्हें खुद ही रोटी बनानी पडती थीं। शायद ये ही एक बहाना रहा होगा उसका मेरे पिता के करीब आने का। मेरी अनुपस्थिति में वह एक दो बार मेरे पिता के पास आयी थी और अपनी साहित्यिक रुचियों जैसे डायरी लेखन को उसने उनसे शेयर किया था। मेरे पिता भी साहित्यिक लेखन बाले ही शिक्षक थे तो उसके लेखन की खूब तारीफ करते। बातों ही बातों में वह मेरे बारे में पूछने लग जाती उनसे। वह समझती थी बडे बूढे तो पागल होते हैं। वो क्या समझ पायेंगे। पर पिताजी को तुरंत आईडिया हो गया हम दोनों के प्रेम के बारे में। लेकिन उन्हौने जीवन के पचपन बसंत देखे थे और शिक्षक भी थे तो सब समझते थे कि किशोरवस्था में आने बाली परेशानियों में किस प्रकार युवक युवतियों को डील किया जाय। चाहते तो उसी समय उसे झिडक देते और डांट देते लेकिन वो शांत रहे। और जब एक महीने बाद अपने गांव आये तो मुझसे उसका नाम लेकर पूछने लगे कि उस लडकी को जानते हो ? बहुत अच्छा लिखती है। गजब का भावनात्मक लेखन है उसका। तुम्हारे लेखन की तारीफ कर रही थी। पर वह तुम्हें कैसे जानती है ? मेरे पास इस बात का कोई जबाब न था सो टाल गया पर मैं इतना समझ गया था कि हम खुद को बहुत चतुर समझते हैं पर ये भूल जाते हैं ये हमारे बाप हैं , हमारी नस नस से वाकिफ रहते हैं। रिजेल्ट आते ही मुझे शहर निकलना था। मैं उसे बहुत मिस कर रहा था कि अगले ही दिन परीक्षा परिणाम आ गया। सारे विषयों में अच्छे अंक थे लेकिन कैमिस्ट्री में सप्लीमेंट्री थी। सोचा पुन: इसी क्लास में पढ लूं उसके साथ एक साल बिताने का मौका मिल जायेगा। लेकिन बडे भैया मेरी तैयारी कराने के लिये मुझे अपने साथ नौकरी पर ले गये। भैया अकेले ही थे जो ड्यूटी के अलावा सिर्फ मुझे पढाते रहते हैं। कैमिस्ट्री को रटा दिया मुझे। एक एक शब्द रट गया मुझे। सोचा था सौ में से अस्सी अकं ले आऊंगा। हालांकि जुडने तो सिर्फ तैंतीस ही थे। पर न जाने अंदर से कोई एक आवाज आ रही थी जो कह रही थी, रहने दो पास होकर क्या करोगे ? एक साल रुक जाओ। अगली साल फिर से दे लेना। वही हुआ। परिणाम आया तो सोचता ही रह गया आखिर ये हुआ कैसे ? मैं फेल हो चुका था। लेकिन मैं खुश था कि अब मुझे गांव छोडकर नहीं जाना पडेगा। मुझे लगा शायद हम दोनों के अंतर्मात्मा की आवाज उसने सुन ली थी। वह हम दोनों को एक साल के लिये साथ देखना चाहता था। 

जारी है 


( मेरे दोस्त राही की आत्मकथा : राज )

Saturday, February 25, 2017

महेश्वर : नितिन भाई के साथ

महेश्वर से नितिन भाई का हर दस मिनिट बाद फौन आ रहा था। जल्दी से निकल लिया मैं भी । इंदौर से महेश्वर का सफर बाकई बहुत रोमांचक रहा। दोनों ओर विध्यांचल की हरी भरी बादियां, कपास गन्ना केला आदि की फसल एवं काली मिट्टी में काम कर रहे किसान ! वाह ! आनन्द आ गया ! इंदौर से धार की तरफ बढते हुये घाट पार करते ही निमाड क्षेत्र प्रारंभ हो जाता है। इस इलाके का जनजातीय वर्ग होली से पहले ही उत्साह और उमंग से सराबोर हो जाता है, यह भगोरिया मेलों में साफ नजर आता है।इन मेलों में आ रहे युवक और युवतियां अपने मनपसंद जीवन साथी की तलाश में लगे होते हैं और वे पान खिलाकर अपने प्रेम का इजहार कर उनका दिल जीतने की कोशिश कर रहे होते हैं। निमांड इलाके के झाबुआ, धार, बडवानी और अलिराजपुर में होली के मौके पर मनाए जाने वाले भगोरिया पर्व को प्रणय का पर्व माना जाता है। मान्यता है कि जनजातीय वर्ग के युवक और युवती इस पर्व पर लगने वाले मेलों में अपने सपनों के हमसफर को न केवल तलाशते हैं, बल्कि परंपरागत तरीके से प्रेम का इजाहर भी करते हैं। 
आभाषी दुनियां के प्राणी भी मुझे वास्तविक जीवन में इतना प्रेम दे पायेंगे, सोचा भी न था। इंदौर से महेश्वर आने का कोई विचार न था लेकिन मेरे फेसबुक मित्र Nitin Kumar Joshi जी का असीम प्रेम मुझे यहां जबरन खींच लाया। मैंने उनका फोटो तक न देखा था पर वो मुझे पहचानते थे। महेश्वर में प्रवेश करते ही रोड पर मेरा इंतजार करते मिले। जैसे ही मैं उनके लहराते हाथ को देखकर उनके पास रुका, मुझे और मेरे बेटे को गले से लगा लिया और नेत्रों से आसुओं की अविरल धारा वहने लगी। खुशी में कुछ कहना चाह रहे थे पर गला रूधं गया और होंठ कांपने लगे। शुद्दध धार्मिक पंडित जी का मात्र एक महीने की मित्रता में इतना गहरा प्रेम ? और वो भी मेरे जैसे मुंहफट अधर्मी के साथ ?  मेरी समझ से परे था पर कुछ बातें ऐसी होतीं हैं जिन्हें केवल परम सत्ता ही समझ सकती हैं। मैं केवल इतना एहसास कर सका कि कोई एक अदृश्य शक्ति थी जो मुझे यहां तक खींच लायी। सबसे पहले तो हम कस्बे की भागदौड से दूर एकांत और शांतिप्रिय वटैक्क्षिनी मंदिर गये जहां कि उनका परिवार पिछली कई पीढियों से पुजारी है।उसके बाद उन्हौने मुझे महिष्मती किला, बहुत सारे मंदिर और नर्मदा घाट घुमाया।
अपने माता पिता समेत समस्त परिवार के साथ साथ रिश्तेदारों से भी मिलवाया। मेरे लाख मना करने के वावजूद मुझे एक भी रूपया खर्च न करने दिया। उनका एक दिन अपने यहां रुकने का आग्रह मैं ठुकरा न सका और रात को उन्ही के यहां रात्रि विश्राम किया। मेरे मना करने के वावजूद अगली सुवह मुझे ऊंकारेश्वर तक छोडने की भी जिद कर रहे। मुझे नहीं पता कि मेरा उनसे क्या और कब का रिश्ता है क्यूंकि पुनर्जन्म को मैं मानता नहीं हूं पर कुछ तो ऐसा है जो मैं केवल महसूस कर रहा हूं पर व्यक्त नहीं कर पा रहा। निमाडी लोग निमाडी संस्कृति प्रेम से इतनी परिपूर्ण होगी, सपने में भी न सोचा था। कहते हैं कि यहां घरों के दरवाजे इसलिये छोटे रखे जाते हैं ताकि लोग दूसरों के आगे झुकना सीख सकें। घरों में कभी झाड झंकाड या कांटे नहीं लगाने देते।  एक और खास बात , यहां सबकी मोटर साईकिलें रात को भी दरवाजे से बाहर रोड पर खडी होतीं हैं क्यूंकि यहां कभी चोरियां नहीं होती। मुझसे पांच बर्ष बडे नितिन जोशी जी एक आदर्श शिक्षक के संस्कारवान सुपुत्र हैं और दो बच्चों के पिता हैं। इस फेसबुक ने मुझे भारत ही नहीं विश्व के हर कोने में कुछ ऐसे "इंसान" दिये हैं जिनके प्रेम का ऋण मैं कभी न चुका पाऊंगा। ना जात की और धर्म की ये आत्मीयता है तो बस मानवता की । फेसबुक मित्र नर्मदीय ब्राह्मण नितिन भाई धौलपुर से हजार किमी दूर महेश्वर के रहने बाले हैं । फेसबुक पर भी अभी कोई बस दो महीने पहले ही मुलाकात हुयी थी। मेरे इंदौर आने की खबर सुनते ही अपने वीवी बच्चों और दुकान को छोडकर पचास किमी दूर महेश्वर आकर मुझे बुलाने का आग्रह करने लगे। विशेष प्रेम देखकर जब मैं महेश्वर पहुंचा तो आखों में आंसू लिये मुझे और विकी को ह्रदय से लगा लिया। रात को महेश्वर में उनके मातापिता से मिला जिन्हौने मुझे अपना दूसरा बेटा कहा और बेटे से बढकर प्यार दिया। चलते समय अपने घर की फसल दाल मूंगफली और ना जाने क्या क्या बांध दिया । बच्चे को भी विदा के रूप में दो सौ रूपये दिये। शहर घूमते समय भी मुझे एक रूपये की चीज खरीदने नहीं दी। रात को पडौसी रिश्तेदार भी मिलने आये और काफी देर तक बतियाते रहे। महेश्वर घुमाने के बाद ऊंकारेश्वर तक भी साथ में गये। लौटते समय मुझे और नितिन भैया दोनों को अलग होना था। यादगार के रुप में मुझे एक महेश्वर घाट की तश्वीर भेंट की और बेटे को सौ रूपये देने लगे और जब मना किया तो फूट फूट के रोने लगे। मेरे जैसा पत्थर दिल इंसान भी आखों में आंसू ले आया। वो कुछ बोलना चाह रहे थे पर गला साथ नहीं दे रहा था बस आंसू बहाये जा रहे थे । मैं भी कुछ न कह सका बस दिल से लगा लिया भाई को। समझ नहीं आ रहा कि मैं इस सच्चे ब्राह्मण परिवार का ये कर्ज कैसे चुका पाउंगा । मैं तो कृष्ण भी नहीं हूं जो इस सुदामा के दो मुट्ठी चावल के बदले विश्वकर्मा से महल बनवा दुगां।