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Wednesday, March 1, 2017

इंदौर पिपरिया पचमढी यात्रा


मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित पचमढ़ी मध्य भारत का पहाडों की गोद में बसा सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थल है। इंदौर से रात को ही निकल लिया था जिसने मुझे सुवह ही पिपरिया स्टेशन छोड दिया। पंचमढी जाने के लिये सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पिपरिया ही है जो बहां से करीब 47 km दूर है। यहां जबलपुर से दो घंटे में एवं इटारसी से एक घंटे में पहुंचा सकता है। पिपरिया से टैक्सी बस कार आदि साधनों से आप पंचमढी पहुंच सकते हैं।जबलपुर और इटारसी के बीच पिपरैया स्टेशन से पचमढी किसी टैक्सी या बस से पहुंच कर आप कोई बाइक या जिप्सी हायर कर सकते हैं।

 मात्र पांच सौ एवं पैट्रोल में बाइक एवं जिप्सी करीब चार सौ में शेयर कर सकते हैं और पहाडों में राईडिगं का लुत्फ उठा सकते हैं। मैंने जिप्सी शेयर करने की बजाय चार सौ प्लस पैट्रोल में पल्सर लेना उचित समझा था क्यूं कि मेरे पास सिर्फ एक ही दिन था और बाइक से मैं अपनी मनपंसद जगहों को घूम सकता था। हालांकि पंचमढी के दर्शनीय स्थलों में बहुत ज्यादा कुछ खास नहीं था मेरे लिये क्यूं कि जिसने हिमालय ही बाइक से नाप डाला हो तो सतपुडा और बिध्यांचल उसके सामने थोडा हल्का ही नजर आता है फिर भी हमें यहां की कल्चर तो जाननी ही थी। रही बात मंदिरों की तो पूरे देश में कहीं चले जाओ , जहां जंगल पहाड नदियां होंगी बहां किसी न किसी गुफा में भोले जरूर विराजमान होंगे। कोई समझे तो यही असली शिव है। हर कंकर में शंकर है। हर पहाड की तरह यहां भी हर दो कदम पर भोले विराजमान हैं। यहां के हरे-भरे और शांत वातावरण में बहुत-सी नदियों और झरनों के गीत पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इसके साथ ही यहां शिवशंकर के कई मंदिर भी हैं। इसलिये पचमढ़ी को कैलाश पर्वत के बाद महादेव का दूसरा घर कह सकते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भस्मासुर (जिसे खुद महादेव ने यह वरदान दिया था कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा और भस्मासुर ने यह वरदान खुद शिवजी पर ही आजमाना चाहा था) से बचने के लिए भगवान शिव ने जिन कंदाराओं और खोहों की शरण ली थी वह सभी पचमढ़ी में ही हैं।शायद इसलिए यहां भगवान शिव के कई मंदिर दिखते हैं। मुझे लगता है कि पौराणिक कथाओं की डिकोडिंग होनी चाहिये। उस समय के पंडितों ने कूट भाषा में कुछ बातें कहीं हैं जिनका शब्दार्थ नहीं भावार्थ निकाला जाना चाहिये। 
पौराणिक कथाओं से बाहर आकर आज की बात करें तो मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित पचमढ़ी समुद्रतल से 1,067 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच होने और अपने सुंदर स्थलों के कारण इसे सतपुड़ा की रानी भी कहा जाता है। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान का भाग होने के कारण यहां चारो ओर घने जंगल हैं। पचमढ़ी के जंगल खासकर जंगली भैंसे के लिए प्रसिद्ध हैं। इस स्थान की खोज कैप्टन जे. फॉरसोथ ने 1862 में की थी। पचमढ़ी की गुफाए पुरातात्विक महत्व की हैं क्योंकि इन गुफाओं में शैलचित्र भी मिले हैं। पचमढ़ी से निकलकर जब आप सतपुड़ा के घने जंगलों में जाएंगे तो आपको बाघ, तेंदुआ, सांभर, चीतल, गौर, चिंकारा, भालू आदि अनेक प्रकार के जंगली जानवर मिलते हैं। पचमढ़ी का ठंडा सुहावना मौसम इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। सर्दियों में यहां तापमान लगभग 4 से 5 डिग्री तक रहता है और गर्मियों में तापमान 35 डिग्री से अधिक नहीं जाता। यहां की सदाबहार हरियाली घास और हर्रा, जामुन, साज, साल, चीड़, देवदारु, सफेद ओक, यूकेलिप्टस, गुलमोहर, जेकेरेंडा और अन्य छोटे-बड़े सघन वृक्षों से आच्छादित वन गलियारे तथा घाटियां मनमोहक है। यहां आप कई जलप्रपात का मजा ले सकते हैं जिसमें रजत प्रपात, बी फॉल्स तथा डचेज फॉल्स सबसे लोकप्रिय हैं। इसका बी फॉल्स नाम इसलिए पड़ा है क्योंकि पहाड़ी से गिरते समय यह झरना बिलकुल मधुमक्खी की तरह दिखता है। यह पिकनिक स्पॉट भी है, जहां आप नहाने का भी मजा ले सकते हैं। रास्ते में आम के पेड़ बहुतायत में दिखते हैं। डचेज फॉल पचमढ़ी का सबसे दुर्गम स्पॉट है। यहां जाने के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता है। इसमें से 700 मीटर घने जगलों के बीच से और करीब 800 मीटर का रास्ता पहाड़ पर से सीधा ढलान का है।








































Sunday, February 26, 2017

पचमढी: पांडव, महादेव एवं गुप्तेश्वर गुफा ।।


पचमढ़ी पांडवों के लिए भी जानी जाती है। यहां की मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ काल यहां भी बिताया था और यहां उनकी पांच कुटिया या मढ़ी या पांच गुफाएं थीं जिसके नाम पर इस स्थान का नाम पचमढ़ी पड़ा है। एक छोटी पहाड़ी पर ये पांचों गुफाएं हैं। वैसे इन्हें बौद्धकालीन गुफाएं भी कहा जाता है। इस प्रकार की गुफाओं मंदिरों को अक्सर पांडवों से जोड दिया गया है। देशभर में घूमते हुये हजारों स्थान देख लिये जो पांडवों से संबधित बताये जाते हैं। सच्चाई क्या है ईश्वर जाने लेकिन जगह बहुत ही रमणीक हैं। पचमढी की इन गुफाओं के आगे एक बहुत सुंदर बगीचा भी है जिसमें सैकडों प्रजाति के फूल और पोधों हैं। गुफाओं के मेनगेट के बाहर ही बच्चों की छोटी छोटी बाइक्स हैं जो मात्र पचास रुपये में किराये पर दी जाती हैं। विकी ने गाडी ली और पीछे गाडी मालिक को बिठा लिया। सौ मीटर दूर एक पुराना चर्च है बहां तक चला कर ले गया और लौटा लाया। 
शिवशंकर के मंदिर सबसे अधिक हैं यहां जिनमें सबसे प्रसिद्ध हैं, जटाशंकर महादेव और गुप्त महादेव। - गुप्त महादेव जाने के लिए दो बिलकुल सटी हुई पहाड़ियों के बीच से गुजरना होता है जबकि जटाशंकर मंदिर पचमढ़ी बस स्टैंड से महज डेढ़ किलोमीटर दूर है और वहां जाने के लिए पहाड़ी से नीचे उतरकर खोह में जाना होता है। कहा जाता है कि भस्मासुर से बचने के लिए ही भोले शंकर इन दोनों जगहों पर छिपे रहे थे। - इसके अलावा तीसरा प्रसिद्ध मंदिर महादेव मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि भस्मासुर से बचते हुए अंत में शिवजी यहां छिपे और यहीं पर भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप लेकर भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए मजबूर कर उसका विनाश किया था। महादेव गुफा आकर्षण का बडा केंद्र है, जहां पत्थरों पर की गई अनूठी चित्रकारी बरबस ही आपका ध्यान आकर्षित करती है। कहते हैं कि यह चित्रकारी 5 से 8वीं शताब्दी के बीच की गई थी। कुछ चित्र तो इससे भी दस हजार साल पुराने बताये जाते हैं।
महादेव गुफा मंदिर की ओर चलते हुये बीच रास्ते में जिप्सी रुकी हुई दिखाई दी तो हमने भी अपनी बाइक पार्क कर दी और चल पडे हरे भरे पेडों के बीच ऊंची नीची पगडंडियों पर। करीब पांच सौ मीटर चलने के बाद एक गहरी खाई आती है और रास्ता समाप्त। हम दोनों के अलावा दस लोग और थे। दुकान के नाम पर बस एक ठेली थी जिस पर रख कर एक औरत फल इत्यादि बेच रही थी। बंदरों से थोडा सावधान रहना होता है यहां झपट्टा मार ले जाते हैं। जमुना प्रपात, रजत प्रपात और जलावतरण प्रपात तो जैसे पचमढी की अल्हडता के गीतों का सामुहिक गान हैं। जमुना प्रपात में जहां आप झरने के किनारे बैठने से लेकर नहाने तक का लुत्फ उठा सकते हैं, वहीं हांडी खोह के पेड-पौधे तो आपको किसी और ही दुनिया का आभास करायेंगे। भगवान शिव से जुडे हजारों साल पुराने मन्दिरों जटाशंकर गुफा, महादेव और छोटा महादेव मन्दिर की प्राकृतिक मनोहारी छटा जहां धार्मिक लोगों को आकर्षित करती है, वहीं प्रकृति प्रेमियों को भी। हम थोडी देर बाद चहलकदमी करने के बाद निकल पडे गुफा की ओर। करीब दस किमी की पहाडों में बाइक राइडिगं में जो मजा आया वो शायद ही किसी मंदिर को घूमने में आया हो। महादेव गुफा के पास ही बाहर कमल के फूल बेचने बाली बैठी थी। हमने बाइक वहीं पार्क कर दी। चल दिये गुफा की ओर। सौ मीटर की दूरी पर ही है। चारों ओर बस त्रिशूल ही त्रिशूल। निगाह लगाये बंदर। घने पेडों की छांव। चहचहाते पक्षियों का मधुर कलरव। जरा भी शोर शरावा नहीं। एकदम शांति। गुफा में घनघोर अंधेरा और ऊपर से टपकता जल। गुफा के अतं में रखी हुई पिंडी। बीच में जल कुंड। प्राकृतिक करिश्मा को हम बहुत अच्छे से भुनाना जानते हैं। बिठा दो एक शिवलिंग और पूजापाठ शुरू। जो भी है हम प्रकृतिपूजक हैं इसमें हमें गर्व है बस ये ध्यान रहे कि हम प्रकृति के संरक्षण के लिये इन्हें भगवान माने हैं इन्हें उजाडने के लिये नहीं। गुप्तेश्वर गुफा भी बहां से अधिक दूर नहीं थी। दस मिनट में ही पहुंच गये। थोडा दूर जंगल में पैदल भी चलना पडा। एकदम संकरी गुफा। मुश्किल से दो चार लोग ही घुस सकते थे एक बार में। प्रकृति का एक और अजूबा सामने था हमारे। आप बस एक बार घर से निकल तो पडो फिर देखो प्रकृति के कितने चमत्कार भरे पडे हैं दुनियां में। मैं तो सीधे भी नहीं चल पा रहा था। आडे आडे गया और बैसे ही आया। अदंर थोडी सी जगह मिली तब थोडा डर दूर हुआ। बाहर से एक्जास्ट फैन से हवा भी डाली जा रही है ताकि दम न घुटे।