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Saturday, October 1, 2016

ऊटी की यात्रा

ऊटी की यात्रा ।।

ऐसे तो मैं पैदाईसी घुमक्कड हूं , पिछले तीस वर्ष से घूम रहा हूं और लगभग पूरा भारत घूम डाला लेकिन ये न पता था कि कभी मुझे फेसबुकिया लेखक या ब्लागर बनने का भी मौका मिलेगा वरना उन यादों को और सहेज कर रख पाता।
नीलगिरी की नीली नीली पहाडियां मुझे बुला रहीं थी और मैं उतावलेपन में बिना किसी कैमरे इत्यादि के बिना किसी साथी के अकेला ही उधर दौड पडा था। अब तो खैर मैं अकेला पागल नहीं हूं , दीवानों की पूरी एक टीम है मेरी पर एक दो साल पहले तक मेरे शहर में मैं अकेला ही दीवाना था जो पहाडों की खाक जानते फिर रहा था।
जानकारी के अभाव में मुझे ऊटी के नजदीकी हिल स्टेशन कुर्ग जैसे स्वर्ग को मिस कर देने का आज भी मलाल है क्यूं कि मैं ऊटी से सीधे केरल की तरफ कूच जो कर गया था। इस बार सर्दियों में जाऊंगा तो यात्रा की शुरुआत मैसूर से होगी।
कुर्ग , कर्नाटक का सबसे छोटा जिला, एक स्वर्ग का टुकडा है जहां उडते बादलों के बीच हरी भरी पहाडियों की ढलानों पर आप पशु पक्षियों के बीच भरपूर मस्ती कर सकते हैं। इलाइची,काली मिर्च,शहद और फूलों की मनमोहक सुगंध वाला शहर मदिकेरी कर्नाटक के कूर्ग जिले का मुख्यालय है। इसकी खूबसूरती और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण मदिकेरी को दक्षिण का स्कॉटलैंड भी कहा जाता है। यहां की धुंधली पहाड़ियां, ठंडी हवाएँ, हरे वन, कॉफी के बागान और प्रकृति के खूबसूरत दृश्य मदिकेरी को हमेशा याद रहने वाला पर्यटन स्थल बनाते हैं। मदिकेरी का वातावरण,जंगल की ढलानें,विलक्षण गाँव,रंगीन दृश्य,मनमोहक खुशबू,शांत पर्यावरण,कल-कल करती नदियां,पशु-पक्षी,घने जंगल और झरनों से गिरता मोतियों सा पानी स्वर्ग का एहसास दिलाता है। कुर्ग को कोडागू भी कहा जाता है। इसका अर्थ है-सोती पहाड़ियों पर बसा धुंध जंगल। कुर्ग के बारे में बताने को बहुत कुछ है पर बाकी की कहानी मैं आपको इस बार की सर्दियों की छुट्टियों में सुनाऊंगा। साक्षात दर्शन कराऊंगा इस बार की यात्रा में।
ऊटी कोई बहुत मंहगी जगह नहीं है। मात्र तीन सौ रुपये में कमरा मिल गया था मुझे और वो भी स्टेशन के सामने ही। कमरे में सामान आदि रखकर फ्रैश होकर पैदल ही निकल पडा झील की ओर। स्टेशन के बगल से ही रोड जा रही है और नजदीक ही है।

ऊटी की झील में बतख बाली पैडल वोट तलाश रहा था कि तभी दिल्ली के एक प्रोफेसर से मुलाकात हुई और मुलाकात होने की बजह शायद मेरा हिंदीभाषी होना ही होगा। उनके परिवार में तीन लोग थे और वोट को संतुलित रखने के लिये चार की आवश्यकता थी। हालांकि वोट में बैठने से पहले मुझे मेरे हिस्से के सत्तर रूपये बता दिये गये थे लेकिन वोटिगं के दौरान वो परिवार मेरे इतने करीब आ गया कि मेरी काफी जिद के बाबजूद उन्हौने मुझसे पैसे नहीं लिये। दिन ढलने को था। हवा में हल्की हल्की सी ठंड आने लगी थी। दिन भर की यात्रा की थकान की बजह से भूख और तेज लगने लगी थी। थोडी कोशिष करता तो शायद गेहूं की रोटी और सब्जी बाला भोजनालय भी मिल जाता पर भूख जोर मार रही थी और पैर दर्द के मारे कीर्तन कर रहे थे इसलिये नजदीकी ही एक भोजनालय पर बैठ गया। पता चला रोटी नहीं थी उसके पास। सिर्फ इडली सांभर और डोसा आदि साऊथ इंडियन भोजन ही था। मरता क्या न करता। भूख बहुत बुरी बनायी है, इंसान भूखा हो तो पत्थर भी चबा जायेगा ये तो डोसा ही था। थाली की बजाय केला का पत्ता विछा गया टेबल पर । डोसा लाया पर बिल्कुल सफेद लचीला डोसा। बाल्टी में से चमचा भरकर सफेद चटनी उसी पर फैला गया। सांभर भी ऐसा कि ना मिर्च और ना मसाला। ये कमबख्त इतना मसाला पैदा करते हैं कि वास्को दा गामा जैसों को बुला लेते हैं तो फिर अपनी सब्जी में डालने पर इतना जोर क्यूं पडता है। सरसों के तेल में छुकी सब्जी खाने बाला नारियल के तेल बाली सब्जी बडी मुश्किल ही खापेया, आनंद ही नहीं आता खाने में। खैर हम तो घुमक्कड हैं हमें घास फूस खाने की भी आदत होनी चाहिये। विपरीत परिस्थितियों में हमें सांप बिच्छू छिपकली भी खानी पड सकती है । मरे ऊंट के पेट में से पानी निकाल कर भी पीना पड जाता है। खुद का मूत भी पीना पड सकता है क्यूं कि जान है तो जहान है।

शेष अगले अंक में