Monday, January 7, 2019

बरसाने की लट्ठमार होली

बरसाने की लट्ठमार होली
अगले ही दिन बरसाने में विश्व प्रसिद्ध होली खेली जानी थी। सुवह से ही गाडियों का जमावाडा होना प्रारंभ हो गया था।शहर से तीन किमी पहले ही बैरियर लगा कर बडे वाहनों को रोक दिया गया। हम भी जग कर शौचादि के लिये निकल पडे। गांव से एक किमी दूर हरे भरे खेतों के बीच एक संत बाबा की कुटिया और हैंडपंप दिखाई दिया। बस वहीं रुक गये। खेतों में फ्रैश होने बहुत दिनों बाद आये थे। खेतों पर काली मिट्टी से स्नान भी आनंददायक था। न कोई शोर शरावा न कोई हलचल। सिर्फ पक्षियों की मधुर आवाज और चारों तरफ हरियाली। पेडों के नीचे सिर पर साफी ओढे संत लोग साधना में लीन भी दिखे तो कुछ चिलम खींचते बाबा लोग। घर गृहस्थी के झंझटों से दूर सन्यास का आनंद लेते सनातनी बुजुर्ग। एक घंटे तक स्नान ध्यान हुआ और फिर निकल पडे गांव की ओर। गांव में घुसते ही कचौडी और जलेवी का नास्ता लेकर पेटपूजा भी हो गयी। अभी नास्ते की दुकान से बाजार की तरफ बढे ही थे कि मस्तों की टोली ने ढेर सारा गुलाल फेंक कर मारा और रंग विरंगा कर दिया। टोलियां बढती गयीं और पता ही नहीं चला कि कब रोड लोगों से भर गया। दोपहर होते होते तो सारा बाजार जाम हो चुका था। बाइक को खडा करने की जरूरत थी अब। तुरंत पार्किगं तलाशी और फिर पैदल यात्रा शुरू। 
बरसाना में होली का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यहाँ लट्ठमार होली की शुरुआत सोलहवीं शताब्दी में हुई थी। तब से बरसाना में यह परंपरा यूं ही निभाई जा रही है, जिसके अनुसार बसंत पंचमी के दिन मंदिर में होली का डांढ़ा गड़ जाने के बाद हर शाम गोस्वामी समाज के लोग धमार गायन करते हैं। प्रसाद में दर्शनार्थियों पर गुलाल बरसाया जाता है। इस दिन राधा जी के मंदिर से पहली चौपाई निकाली जाती है, जिसके पीछे-पीछे गोस्वामी समाज के पुरुष झांझ-मंजीरे बजाते हुए होली के पद गाते चलते हैं। बरसाना की रंगीली गली से होकर बाज़ारों से रंग उड़ाती हुई यह चौपाई सभी को होली के आगमन का एहसास करा देती है। मंदिर में पंडे की अच्छी ख़ासी खातिर की जाती है। यहाँ तक कि उस पर क्विंटल के हिसाब से लड्डू बरसाए जाते हैं, जिसे पांडे लीला कहा जाता है। श्रद्धालु राधा जी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंदिर में होते हैं तो उन पर वहाँ के सेवायत चारों तरफ से केसर और इत्र पड़े टेसू के रंग और गुलाल की बौछार करते हैं। मंदिर का लंबा चौड़ा प्रांगण रंग-गुलाल से सराबोर हो जाता है।
लट्ठमार होली शाम को चार बजे शुरू होनी थी लेकिन उससे पहले बाहर से आये लोगों ने बरसाना रंगीन कर दिया था। वहससमय भी आ गया जब 
राधारानी रुपी गोपियों ने नंदगांव के कृष्ण रुपी हुरियारों पर जमकर लाठियां बरसाईं। हंसी ठिठोली, गाली, अबीर गुलाल तथा लाठियों से खेली गई होली का आनंद देश-विदेश से कौने-कौने से आये श्रद्धालुओं ने जमकर लिया। कान्हा के सखा के रूप में आये नन्द गांव के हुरियारे यहां पीली पोखर पर आकर स्नान करते हैं। अपने सर पर पग (पगड़ी) बांध कर बरसाने की हुरियारिनों को होली के लिए आमंत्रित करते हैं। कहा जाता है जब भगवान कृष्ण बरसाने होली खेलने आये थे तो बरसने वालों ने उन्हें इसी स्थान पर विश्राम कराया था और उनकी सेवा की थी। तब से लेकर आज तक बरसाना की लट्ठमार होली से पहले इसी स्थान पर नन्द गांव से आने वाले हुरियारे यहां आकर परंपरा का निर्वहन करते चले आ रहे हैं। हजारों बरसों से चली आ रही इस परंपरा के तहत नंदगांव के हुरियारे पिली पोखर पर आते हैं जहां उनका स्वागत बरसाना के लोग ठंडाई और भांग से करते हैं। यहां से ये हुरियारे पहुंचते हैं रंगीली गली जहां ये बरसाना की हुरियारिनों को होली के गीत गा कर रिझाते हैं। होली के गीत और गालियों के बाद होता है नाच गाना और फिर खेली जाती है लट्ठमार होली। जिसमें बरसाना की हुरियारिन नन्द गांव के हुरियारों पर लाठियों की बरसात करते हैं। जिसका बचाव नन्द गांव के हुरियारे अपने साथ लायी ढाल से करते हैं। इस होली को खेलने के लिए नन्द गांव से बूढ़ें, जवान और बच्चे भी आते हैं। बरसाना की इस अनोखी लट्ठमार होली को देखने के लिए देश के कौने-कौने से श्रद्धालु आते हैं। ब्रज में चालीस दिन तक चलने वाले इस होली में जब तक बरसाना की हुरियारिन नंदगांव के हुरियारों पर लाठियों से होली नहीं खेलतीं तब तक होली का आनंद नहीं आता। 













South India Tour : Chennai ; A magical city

Chennai ; A magical city
अंडमान एक्सप्रेस से करीब 40 घंटे की यात्रा के बाद हम चेन्नई सेंट्रल पहुंच गये। किराया 720 रु प्रति व्यक्ति। हम तीनों की पीठ पर एक एक बैग था। आराम से लोकल ट्रेन पकड कर कृष्णा के घर पहुंच सकते थे। अभी शाम के तीन बजे थे, सोचा कि पहले मरीना बीच चलें। एक तो मरीना बीच और सेंट जार्ज फोर्ट,  चेन्नई सेंट्रल के नजदीक भी है , दूसरे सुहानी समुंदर देखने को बाबडी हुयी जा रही थी, जीवन में पहली बार समुद्र देख रही थी, लेकिन लाख मना करने के बावजूद कृष्णा और उसके पतिदेव राजू शर्मा जी स्टेशन हमें लेने आ पहुंचे। कृष्णा मेरी जन्म स्थल गांव की बेटी है और बचपन से राखी बांधती आयी है। पिछले 15 साल से बुला रही थी, जैसे ही पता चला कि भैया भाभी के साथ सुहानी भी आ रही है, भावुक हो बैठी, इंतजार करने लगी, बच्चों को भी इंतज़ार था। फौन पर खैर कुशल लेती रही। इसी बीच मैंने उसे मना भी किया कि बिल्कुल भी परेशान न हो और न राजू जी को करे, हम खुद पहुंच जायेंगे, मगर वो नहीं मानी। आ धमकी स्टेशन। लेकर घर गयी सीधे। घर पहुंचते, नहा धोते, खाते पीते इतनी देर हो गयी कि मरीना बीच पर पहुंचते पहुंचते रात हो गयी।
हमारे घुमक्कड़ी गैंग में जवानों की टोली के साथ साथ बुजुर्ग भी हैं। ऐसे ही एक अनुभवी जोशीले बुजुर्ग के बारे में आपको बताऊंगा तो आप आश्चर्य करेंगे। चेन्नई के शंकर सर, सत्तर साल के जोशीले बुजुर्ग, अपना झोला उठाये कहीं भी चल देते हैं। भारत का तो कोई कोना नहीं छोडा। पहाडों की खाक छान रखी है। काश्मीर लद्दाख से कन्याकुमारी तक। इसके अलावा श्रीलंका, भूटान, नेपाल और मालदीव भी नहीं छोडे। यात्रा अभी भी अनवरत जारी है। संयोग से चेन्नई में ही थे। मेरी इनसे मिलने की ख्वाईश बहुत साल से थी। मरीना बीच की ओर बढते हुये इनसे फौन पर बात हुई, मरीना बीच पर ही मिलना तय हुआ। एक घंटे की बस यात्रा करके चेन्नई के मरीना बीच हमसे पहले पहुंच गये, वहीं पर मेरा इंतजार करने लगे। मैं परिवार के साथ था। पूछताछ में थोडा कनफ्यूजन हुआ और हम सैंट जार्ज फोर्ट पहुंच गये। इंतजार करते आधा घंटा हो गया तो फौन लगाया। लोकेशन भेजी, हमने तुरंत बापसी की ट्रेन पकडी। फिर गलती हो गयी। एक स्टेशन पहले ही उतर गये। फिर बात हुई, जब निर्धारित स्टेशन पर पहुंचे तो शंकर सर इंतजार करते मिले। रात हो रही थी, उन्हें बहुत दूर जाना था, मेरे लिये साठ सत्तर किमी चल कर आये थे, दो घंटे अकेले बीच पर बैठे इंतजार किया तब मुलाकात हुई। ज्यादा समय साथ नहीं बिता पाये हम लेकिन इसी प्रक्रिया में अपने छोटों के लिए उनका प्रेम और उनकी विनम्रता जरूर झलक गयी। ऐसे होते हैं घुमक्कडों के रिश्ते। सगों से भी ज्यादा आत्मीयता से भरे, हमारी घुमक्कड़ी दुनियां में सब कुछ है, मौज मस्ती, जीवन का उल्लास, सुख दुख बांटने को परिवार और जीवन का सार समझने को जीवन दर्शन। शंकर सर को विदा करने के बाद हम उतर गये, मरीना बीच की बालू पर। रात के अंधेरे में सिर्फ सफेद झाग दिखाई दे रहे थे या फिर किनारों से टकराती लहरों का शोर सुनाई पड रहा था, लहरें दिखाई नहीं दे रहीं थीं। मरीना बीच एक खूबसूरत प्राकृतिक शहरी समुद्री तट है। जिसका कुछ हिस्सा बंगाल की खाड़ी से भी मिलता है। यह समुद्री तट उत्तर में फोर्ट सेंट जॉर्ज से शुरू होकर दक्षिण में फॉरेसहोर एस्टेट में खत्म होता है, जिसकी लंबाई लगभग 6 किमी की है। इस समुद्र तट की गिनती विश्व के चुनिंदा सबसे लंबे प्राकृतिक तटों में होती है। यहां का समुद्री तट मुख्य तौर पर बलूआ है जो मुंबई के जुहू समुद्री तट को बनाने वाली छोटी, चट्टानी संरचनाओं के विपरीत है। इस बीच की चौड़ाई लगभग 300 मीटर की है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस समुद्री तट पर नहाना और तैरना पूर्ण रूप से वर्जित है। सैंट जार्ज फोर्ट के पास स्टेशन से उतरने पर जयललिता की समाधि स्थल से लेकर गांधी स्टैच्यू तक आप पैदल चलने का साहस जुटा पाये, निसंदेह मरीना बीच की समस्त खूबसूरती को आत्मसात कर पायेंगे। लेकिन हम शंकर से मिलने के लिए तिरुवेल्लीकेनी स्टेशन उतरे जो बीच से सटा हुआ है। चप्पल हाथों में लिये समुद्र तट की ओर बढे, दूर झिलममिल करती मद्धम रोशनी में समुद्र तट पर खडी कुछ नावें और उनकी ओटक में एक दूसरे से चिपके प्रेमी युगल दिखाई दिये। इस बेरहम दुनियां में प्रेमियों को बैसे ही कोई चैन नहीं लेने देता, तो हम क्यूं उन्हें डिस्टर्व करें, बस कुछ ऐसा ही सोच कर हम और आगे बढ लिए। थोडी देर चलने के बाद एकांत मिला, तो पसर गये, उफान मारती लहरों में जीवन दर्शन ढूंड ही रहा था कि सुहानी और कृष्णा का बेटा लहरों में कूदते नजर आये। लहरें अपने प्रचंड रूप में आ रही थी, जैसे जैसे रात गहराती है, समुद्र खतरनाक होता जाता है, लहरों का शोर शरीर में एक सिहरन सी पैदा कर देता है। दर असल
मरीना का बीच समुद्र तट पर समतल नहीं है, लहरों ने रेत की ऊंची दीवार खडी कर दी है, यहां नहाना खतरनाक हो सकता था इसलिये दोनों बच्चों को हाथ पकड मैं उसकी भयाभयता से परिचित कराने हाथ पकड अंदर खींच ले गया, तेज शोर करती लहरों ने हमें उठाकर बापस रेत पर फैंक दिया मानो वो रात में खुद को डिस्टर्व करने से नाराज हुआ हो। परिवार के लिए ज्यादा देर रात तक एकांत बीच पर रुकना ठीक नहीं लगा तो हम बापस सडक की ओर चल दिये। बीच के सहारे सहारे मुख्य सडक पर दूर तलक शहर दौडता नजर आता है, तो साथ ही बने फुटपाथ पर जीवन में सुकून ढूंडते पैदल यात्री भी दिखते हैं। फुटपाथ पर बनी छोटी छोटी दुकानों पर बच्चों की मस्ती जारी रहती है। एक दुकान पर रुके, केले की भज्जी खायी, तो बच्चों ने निशानेबाज़ी का आनंद लिया।
रात के दस बज चले थे। 24 दिसंवर की रात चर्चों को दुल्हन की सजाया जाता है, बच्चों का प्रिय सैंटा क्लाज टौफियां और चाकलेट बांटते हुये आता है और बच्चों को मदमस्त कर जाता है। मद्रास अंग्रेजी सत्ता की राजधानी रही है, लार्ड क्लाईव जैसे बहुत सारे जनरल मद्रास की सहायता से हिंदुस्तान पर काबिज होने में सफल रहे। बहुत सारे चर्च और स्कूल बनाकर ईसाई पंथ का विस्तार किया। आज उसका प्रभाव देखने की बारी थी। पैदल पैदल ही सैंट थामस चर्च की तरफ हम बढ चले। मरीना बीच से दो किमी दूर सैंट थामस चर्च बहुत खूबसूरत और भव्य है। संथोम कैथोड्रल बेसीलिका संथोम कैथोड्रल एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। सेन्ट थॉमस फिलिस्तीन से भारत 52 ई. में आए थे और 26 वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो गई। सेंट थॉमस माउंट, वह स्थल जहां माना जाता है कि ईसा मसीह के एक शिष्य सेंट थॉमस शहीद हो गए, भारतीय ईसाईयों के लिए महत्वपूर्ण एक तीर्थ स्थल है। सैन्थोम महागिरजाघर, जो अनुमानत: सेंट थॉमस के कब्र के ऊपर बनाया गया था, रोम के कैथोलिकों द्वारा पूजनीय चर्च है।

हम लोग चर्च में प्रवेश किये तो तेज रोशनी में नहाते सफेद भव्य भवन और वहां लगे सुसज्जित पंडाल को देखकर कृष्णा थोडी हिचकिचायी कि कहीं हम कोई गुस्ताखी तो नहीं कर रहे, ईसाईयों के धर्मस्थल में प्रवेश करके, लेकिन उन्हें मैंने समझाया कि ईसाई आज विश्व में सबसे ज्यादा हैं, उसका कारण भी यही है कि इनके यहां ज्यादा रोकटोक या टर्म कंडीसन नहीं है, जो भी आये, स्वागत है, गुरुद्वारे की तरह। हां मस्जिद होती तो मुझे भी ऐसी ही हिचक लगती मगर गुरुद्वारे एंव चर्च में तो बेधडक जाता हूँ।
चेन्नई ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित प्रथम बंदोबस्त का शहर था। भारत के चारों मैट्रो शहरों में से एक यह शहर सबसे छोटा ज़रूर है लेकिन पर्यटन के लिहाज़ से किसी से कम नहीं है। चेन्नई में अनेक ऐसे दर्शनीय स्थल हैं जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। अनेक मंदिर, क़िले, चर्च, पार्क, बीच, मस्जिद इस शहर की ख़ूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।सेंट जॉर्ज का प्रधान गिरजाघर प्रोटेस्टैंट ईसाइयों के लिए एक महत्वपूर्ण पूजा स्थल है। हजार बत्तियों वाला मस्जिद देश के सबसे बड़े मस्जिदों में से एक है और मुसलमानों का एक पवित्र स्थल है।
चर्च से पैदल चल कर ही मयलापुर स्टेशन से हमें घर के लिए ट्रैन पकडनी थी। मयलापुर का कपालीश्वर मंदिर भी बहुत फेमस है। लेकिन रात बहुत हो चली थी, घर भी पहुंचना था, बच्चे पैदल चल चल कर थक चुके थे और फिर अगली सुबह तडके ही हमें महाबलीपुरम भी तो निकलना था, इसलिए ट्रेन पकडी और सीधे घर।

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 shankar sir
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Sunday, December 23, 2018

South India Tour : Dholpur to Chennai.

हम दो और हमारे दो, घुमक्कड़ी के कीडे के मामले में फिफ्टी फिफ्टी हैं। विकी और उसकी मां को कोई खास लगाव नहीं है लेकिन मेरी बेटी मुझ पर गयी है पूरी तरह से। धन से फक्कड और मन से घुमक्कड। उसने जब से चेन्नई एक्सप्रेस मूवी देखी है, साऊथ इंडिया घूमने की इच्छा पाल बैठी है। मैं एक बार तमिलनाडु और केरल घूम कर आ चुका हूँ। दक्षिण भारतीय संस्कृति ने मुझे काफी प्रभावित किया था, सोचता रहा कि जब भी मौका मिला, बच्चों को भी मूल भारत से परिचित कराऊंगा। विकी को साथ ले जाने के लिये मुझे सोचना नहीं पडा कभी, जब भी उसकी इच्छा हुई, साथ हो लिया। मगर सीबू के लिए उसकी मां के साथ साथ उसके अम्मा बाबा की अनुमति लेनी पड़ती है। लडकी होने का यही सबसे बड़ा नुकसान है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, पहले घरवालों से और फिर बाहर वालों से। सीबू की विशेष इच्छा को देखते हुये इस बार उसकी माँ भी तैयार हो गयी घूमने को।

ऐसे तो मैं हमेशा जनरल बोगी में ही सफर करता हूं, भले कितना ही अंग्रेजी का सफर करना पड़े, मगर इस बार साथ में बेटी थी, जिसे मैं सफर के सफर से बचाते हुए उसके ख्वाव को पूरा करने को प्रतिबद्ध था। 22 दिसंवर शनिवार था, 25 से विंटर वैकेशन होनी थी। इसलिए 22 को ही रिजर्वेशन करा लिया। मोबाइल से रिजर्वेशन कराने का यह मेरा पहला मौका था इसलिये मैं वेटिंग को ही रि,जर्वेशन समझता रहा। ट्रेन छूटने से दो तीन घंटे पहले आगरा के घुमक्कड मित्र पवन कुमार जी ने समझाया कि किस प्रकार मुझे अपना PNR number डालकर पता करना है, सीट कनफर्म हुई या नहीं। अगर सीट कनफर्म नहीं होती तो मेरे रुपये बापस हो जाते और हम विदाऊट सीट की श्रेणी में आते मगर सुखद संयोग से सीट कनफर्म हो गयी और हम निर्धारित समय से घंटे भर पहले धौलपुर स्टेशन पहुंच गये ताकि मुरैना या ग्वालियर से अंडमान एक्सप्रेस को पकड सकें। चेन्नई अंडमान एक्सप्रेस मुरैना रात 7:30 और ग्वालियर 8:00 बजे पहुंचती है। इंतजार करते करते शाम के 6:30 हो चले तब थोडी चिंता हुई क्यूं कि सारी ट्रेन लेट थीं, ग्वालियर जाने वाली झेलम एक्सप्रेस अभी आगरा खडी थी। संयोग से उसी समय फेसबुक पर ट्रेन का इंतजार करते हुये सीबू का एक फोटो पोस्ट कर दिया तो फेसबुक मित्र प्रबल प्रताप जी ने तुरंत फोन लगाकर सुझाव दिया कि तुरंत टैक्सी करके मुरैना पहुंचो, फिलहाल कोई ट्रेन नहीं है। उस समय तक नेटवर्क प्राब्लम की बजह से मैं अंडमान एक्सप्रेस की राईट लोकेशन भी नहीं देख पा रहा था। इसलिए 700 रुपये में टैक्सी की और सीधे ग्वालियर। 
कभी कभी कुछ दुर्योग या संयोग बनते ही हैं, आपको पता नहीं होता कि ये सब क्यूं हुआ। चाहता तो आगरा से हम अपनी ट्रेन पकड सकते थे, तीन ट्रेन आगरा की तरफ चली गयीं मगर खतरा था कि कहीं हमारी ट्रेन तब तक निकल न पडे वहां से। नैटवर्क की गडबडी की बजह से हम उसके राईट टाईम पर ही फोकस करके चल रहे थे। टैक्सी में ग्वालियर की तरफ दौडते हुये प्रबल प्रताप जी से सूचना मिली कि हमारी गाडी 2 घंटे लेट है, टैंशन की कोई बात नहीं है। जब जाकिर सीबू के थोडी जान में जान आयी। बेचारी बहुत दिनों से इंतज़ार करे बैठी थी। उसके भैया विकी ने गुजरात से लौटकर समुद्र की विशालता और भव्यता के गीत गाये थे, तभी से उस पर समुद्र की लहरों में खेलने का भूत सवार था। चेन्नई में उसकी एक बुआ भी रहती है जो कि बहुत दिनों से उसे बुला रही थी। कृष्णा मेरे गांव की ही लडकी, मेरी मुँहबोली बहन है जो मद्रास ब्याही है।हमारे मद्रास आने की खबर पाकर वह भी काफी उत्साहित और रोमांचित है। उसकी इस अति प्रसन्नता का मूल कारण ये भी है कि उसका ससुराल इतनी दूर है कि मायके (धौलपुर) से बहुत कम लोग वहां पहुंच पाते हैं। 
भौगोलिक दूरियां प्रेम बढाती हैं और वैचारिक दूरियां प्रेम की दुश्मन होती हैं। अजीब संयोग ये भी है कि अत्यधिक प्रेम दूरियां पैदा करता है।
1440 में दो सीट आगरा से चेन्नई बुक करायी थीं। सीबू की टिकट जनरल 415 रू में चलते समय ली थी। ग्वालियर समय पर पहुंच गये भले हमारे 700- 800 रुपये अतिरिक्त खर्च हो गये। सर्दी बढती जा रही थी। भूख भी जोरों की लगी थी। घर से घी की पूडियां लेकर चले थे। वेटिंग रुम में बैठकर खाना खाने लगे। इधर ट्रेन और लेट हो गयी। सीबू को नींद आने लगी थी इसलिए बैग से पल्ली निकाल चादर बिछायी और मां बेटी दोनों को सुला दिया। मेरा मोबाइल चार्ज हो चुका था, मैं फेसबुक खोलकर बैठ गया। ट्रेन लेट होते होते आखिरकार दो बजे तक पहुंच गयी। इससे पहले सैकड़ों ट्रेन निकल गई, मैं रिजर्वेशन को कोस रहा था। रिजर्वेशन न होता तो अब तक किसी भी ट्रेन से निकल लिये होते। मगर गाडी आयी और खाली सीट पर चद्दर बिछाकर रजाई ओढकर जो गहरी नींद सोये तो रिजर्वेशन की सार्थकता नजर आने लगी। हालांकि स्लीपर में देहसुख रहता है मगर घुमक्कड़ी का असली मकसद पूरा नहीं हो पाता। स्लीपर कोच के अधिकांश यात्री संपन्न घरों से आते हैं जो अपनी अपनी सीट पर पहरे अपने अपने मोबाइल में खोकर रह जाते हैं, इसलिए घुमक्कड़ी का असल मक़सद जनरल बोगी में ही होता है, जहां असली भारत के दर्शन होते हैं लेकिन जनरल बोगी की यात्रा मेरे जैसा घुमक्कड़ी के लिए पागल इंसान ही कर सकता है।


Saturday, December 15, 2018

उत्तराखंड चार धाम बाइक यात्रा से बापसी ।।

satyapalchahar023@gmail.com
इस यात्रा में पंजाबियों ने दिल जीत लिया मेरा। पिंडारी नदी ने जैसे ही कर्णप्रयाग में अलकनंदा से मेल मिलाप किया और मैं बद्रीनाथ की राह पर दौडने लगा तो देखा कि खालसा झंडा लगाये पचास पंजाबी बाइकर्स मेरे आगे और पीछे भी पचास बाइकर्स दौडे जा रहे थे। जगह जगह लंगर चल रहे । पकड पकड कर खिलाये जा रहे। पेट ओवरफुल होता। मैं हाथ जोडकर वाहे गुरू बोल देता तो वह भी हाथ जोडकर बोल देते कि पुत्तर जी चाह ही पी लै और कुछ नहीं तो एक कटोरी खीर ही खा लै। ऐसी प्रेम की विनती कौन ठुकरा सकता है ? भले ही कुछ न खाता । वर्तन साफ करने की सेवा करके ही संतुष्टि पा लेता पर रुकता जरूर। पूरी यात्रा में अब तक गुरुद्वारों में ही तो रुका था मैं। हेमकुंड साहिब एवं फूलों की घाटी भी बद्रीनाथ जी के बगल ही हैं। शायद ही कोई पंजाबी हो जो बद्रीनाथ में मुझे न मिला हो। चार पहिया वाहनों की भी लाईन लगी पडी थी। गुरू के बताये मार्गों पर चलने की चाह बहुत प्रबल थी। मैं बीस किमी पैदल चलने के डर से हेमकुंड साहब को दूर से ही नमन कर आया था पर अगली बार मैं केवल हेमकुंड साहिब ही जाऊंगा और परिवार सहित जाऊंगा। गुरूनानक साहब ने एक ईश्वर और गुरूओं की पवित्र वाणी का मार्ग दिखाया था और पंजाबियों ने उसे बखूवी निभाया भी लेकिन उनके मन में किसी अन्य के प्रति कोई हीन भावना नहीं आयी। भले ही पांडित्य कर्मकांड और तमाम तरह की धार्मिक औपचारिकताओं से अलग शुद्ध एकेश्वरवाद का उन्हौने रास्ता बताया हो लेकिन कभी किसी को नफरत करने को नहीं बोला। जो भी जैसे भी जिस रुप में भी उस परमपिता परमेश्वर को माने उसका सम्मान करो।  भारतीय संस्कृति और प्रकृति के उपहारों के प्रति प्रेम बना ही रहा। नाचना गाना मौज मस्ती संगीत घुमना फिरना तीर्थ यात्रायें करना लंगर लगाकर भूखे लोगों का पेट भरना, बेसहारा लोगों को रात में ठहराना आदि कार्यों ने उन्हें मानव धर्म के उच्चतम पायदान पर लाकर बिठा दिया। लौटते समय ऋषिकेश में दो बेटे अपने पिता के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते और पारिवारिक बातें करते नजर आये। उनकी खुली जीप मुझे पंसद थी। मैं रुककर देखने लगा। उत्सुकतापूर्वक सरदारजी ने मुझसे कहा," ओये पुत्तर राजस्थान से ?" 
" हंज्जी सरदार जी, मुझे ऐसी ही गाडी चाहिये घुमक्कडी के लिये। सच पूछो तो मुझे पंजाब की हर चीज पंसद है। पंजाब की मिट्टी नदियों खानापीना से लेकर गुरूओं तक। पंजाब के लोग मेरे दिल में बसते हैं।" बस इतना कहने की देर थी कि ऋषिकेश स्थित अपने घर ले जाने की जिद करने लगे। बोले ," चल घर चल चाह पीते हैं। मैं बोला," नहीं जी मुझे चाय नहीं लस्सी पंसद है।"  कोई बात नहीं तुझे चाय नहीं लस्सी पंसद है तो चल तुझे लस्सी ही पिलाऊंगा। आज मेरे घर रुक । सुवह निकल जाना। धौलपुर बहुत दूर है। मैं रुका तो नहीं लेकिन उनकी भावनाओं ने मुझे मालामाल कर दिया । मैं रास्ते भर बस यही कहता रहा " सिंह इज किंग "


इस सृष्टि को चलाने वाली एक परम सत्ता है, ऐसा मेरा अटूट विश्वास है। मेरा भरोषा है उस पर इसलिये मेरी अक्सर उससे बात और मुलाकात होती ही रहती है। बद्रीनाथ जी से चमोली तुंगनाथ होते हुये गुप्तकाशी केदारनाथ जी की तरफ बढ रहा था कि रोड पर एक गरम शाल दिखाई दी। आसपास कोई न दिखा तो उठाकर गाडी पर रख ली। आगे जा रही बस की खिडकी पर बैठी सवारियों से भी पूछा लेकिन उत्तर ना में ही मिला। चूंकि मेरे पास पहले से ही गरम जैकेट और शाल आदि कपडे थे तो ये तो तय था कि ईश्वर ने वह शाल मेरे लिये नहीं बल्कि मेरे माध्यम से किसी अन्य जरूरतमंद के लिये ही भेजी थी। अत: मेरी निगाहें केदारनाथ मंदिर तक उस जरूरतमंद इंसान को ढूंडती रहीं, सैकडों गरीब फकीर संत आदि मिले भी लेकिन मैंने भी सोच रखा था जब तक मेरे दिल की गहराईयों से आवाज न आयेगी , मैं यह शाल किसी को न दूंगा। मौसम खराब होने के कारण एक दिन मुझे नीचे सोनप्रयाग में ही रुकना पडा तो दूसरे दिन ऊपर मंदिर के बगल सरकारी टैंट में। दोनों ही रात उस शाल ने मेरी जान बचायी। लौटते समय आधा रास्ता कटने के बाद एक टीनसेड के नीचे रिलैक्स ले रहा था कि अचानक से घनघोर वर्षा शुरू हो गयी। तेज हवाएं चलना शुरू। भयंकर सर्दी । ठंड में कांपने लगा। रेनकोट की बजह से भीगा तो नहीं ठंड खूब लग रही थी। धीरे धीरे भीड हो चली थी इसलिये काफी लोग खडे हुये ही थे कि तभी एक टोकरी में एक अस्सी वर्षीय बुजुर्ग को बिठाकर लाने बाला पिट्ठू बहां रुका। बुजुर्ग ठंड से कांप रहे थे। खडा भी नहीं हुआ जा रहा। मैं तुरंत अपनी कुर्सी से खडा हो गया और उन्हें बिठा दिया। थोडी ही देर की बातों में पता चल गया कि कृष्णामूर्ति नाम के वो सज्जन विशाखापट्टनम के जाने माने बकील हैं, हिंदी बोलने में कठिनाई मेहसूस कर रहे थे तो हमारा वार्तालाप अंग्रेजी में ही हुआ। पत्नी स्वर्गवासी हो चुकी थी। बेटा बेटी कनाडा में किसी कंपनी में हैं। विशाखापट्टनम के एक बडे बंगले में अकेले रहने बाले कृष्णमूर्ति हैं। गुप्तकाशी के होटल में रुके थे । अन्य साथियों के साथ हैलीकौप्टर से ही आये थे लेकिन मौसम खराब होने से उडान रद्द हो गयी और मजबूरन टोकरी पिट्ठू लेना पडा। एक तो उम्र का तकाजा और दूसरे उनके गरम कपडे भी रूम पर छूट गये थे, ठंड में बुरी तरह कांप रहे थे कि तभी मेरे दिल से आवाज आयी कि यही है वो आदमी जिसको तू ढूंड रहा था। मैंने तुरंत शाल निकाली और उन्हें उढा दिया। तब भी उनका कांपना बंद न हुआ। मैंने तुरंत अपने रेनकोट के नीचे पहनी हुई गरम जैकेट उतारी जो मैंने मनाली से अपनी रोहतांग यात्रा में खरीदी थी और वह भी उन्हें पहना दिया। गरमा गरम चाय पिलाई । अब धीरे धीरे वर्षा भी कम होने लगी। वर्फीली हवाएं भी थम गयीं। वह सज्जन भी अब नौर्मल स्थिति में आने लगे। अब चूंकि शाम होने लगी थी और मुझे पैदल ही उतरना था। सोनप्रयाग पहुंचने में कम से कम चार घंटे तो लगने ही थे। हल्की हल्की वर्षा में भी चलने का मूड बना चुका था। गरम शाल तो भोले बाबा ने मेरे माध्यम से उनके लिये ही भेजी थी पर अब ठंड में कांपते बुजुर्ग से अपनी जैकेट कैसे मांगू ? बडी अनिश्चय की स्थिति थी । मैं बिना जैकेट लिये चलने लगा तो वे तुरंत मुझे शाल और जैकट देने लगे। मेरे दिल ने स्वीकार नहीं किया। बार बार दिल में बस यही खयाल आये कि इस बुजुर्ग की जगह आज मेरे बाबूजी होते तो क्या मैं उनसे ये कपडे बापस लेता ? क्या मैं उन्हें ठिठुरता छोड देता ? लेकिन वह भी लौटाने की जिद पर अड गये। काफी देर की जद्दोजहद के बाद उन्हौने जैकट रखना स्वीकार कर लिया और गरम शाल लौटा दी। 
अरे ये क्या ! शाल तो फिर बापस आ गयी मेरे पास ! तो फिर भोले ने ये किसके लिये भेजी थी ? बस यही सोचता हुआ नीचे सोनप्रयाग आ पहुंचा। रात को जैकेट के बिना ठिठुरता हुआ सोया। ठंड में नींद किसे आती है। जैसे तैसे सुवह के पांच बजाये। पांच बजते ही बाइक लेकर घर की तरफ निकल पडा। गुप्तकाशी में ही नहाना धोना हुआ और साथ में उन सज्जन से मिलने की कोशिष भी हुई पर एक बार बात होने के बाद दूसरी बार नेटवर्क प्रोब्लम की बजह से बात न हो पायी। काशी विश्वनाथ में मत्था टेक कर सीधे घर की तरफ रवाना हो लिया लेकिन एक प्रश्न अब भी दिमाग में था कि आखिर ये शाल किसके लिये भिजवाई है भोले ने ? खैर जल्द ही वो इंसान भी मिल गया। नदी के किनारे अर्धनग्न अवस्था में पैदल चला आ रहा एक भक्त अपनी धुन में खोया ऊपर चढा आ रहा था कि मेरे दिल से आवाज आयी कि यही है वो आदमी। मैंने उससे पूछा ,
" बाबा किसके पास जा रहे हो ?"
बडा सा छोटा जवाब मिला ," भोले के पास " और यह कर वह अर्ध नग्न फकीर चलता बना। तभी मेरा हाथ गरम शाल पर गया और एक मिनट में वह शाल मैंने उसके नंगे ठिठुरते शरीर पर डाल दिया। सामान्यत: कोई भी आदमी मेरी इस प्रतिक्रिया पर आश्चर्य व्यक्त करता पर उसने कोई प्रतिक्रिया न दी मानो कि वह मानसिक तौर पर इसके लिये तैयार था। मानो वह मेरा ही इंतजार कर रहा था। उसने एक बार भी मुडकर मेरी और न देखा । बस अपनी धुन में आगे बढता ही रहा। इधर मैं भी अब गियर पर गियर डाले जा रही थी और मेरी गाडी अब जोश में दौडे जा रही थी अब मुझे लग रहा था कि मैं भोले का डाकिया बन कर लौट रहा हूं। विशाखापट्टनम बाले सज्जन का अब तक दस बार फोन आ चुका है। पहले वो मुझे Mr. Chahar कह कर संबोधन कर रहे थे लेकिन अब मुझे सत्यपाल बेटा बोलते हैं।

उत्तराखंड चार धाम बाइक यात्रा : भारतीय सीमा का अतिंम गांव माणा (बद्रीनाथ)।

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बद्रीनाथ जी के सुवह ही दर्शन के पश्चात यहां की खूबसूरती देखने को निकल पडा। यहां के अन्य धार्मिक स्थल और भी हैं जैसे अलकनंदा के तट पर स्थित अद्भुत गर्म झरना जिसे 'तप्त कुंड' कहा जाता है। एक समतल चबूतरा जिसे 'ब्रह्म कपाल' कहा जाता है। पौराणिक कथाओं में उल्लेखित एक 'सांप' शिला है। शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड 'शेषनेत्र' है। भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं- 'चरणपादुका' । बद्रीनाथ से नजर आने वाला बर्फ़ से ढंका ऊंचा शिखर नीलकंठ, जो 'गढ़वाल क्वीन' के नाम से जाना जाता है। माता मूर्ति मंदिर जिन्हें बदरीनाथ भगवान जी की माता के रूप में पूजा जाता है। और इस सब से अलग देखने लायक है मात्र तीन किमी दूर माणा गाँव जिसे भारत का अंतिम गाँव भी कहा जाता है क्यूं कि यहां से आगे रिहाइस नहीं है, चीन की सीमा शुरू हो जाती है। इस गांव की खास बात है ऊंचे पहाडों की तलहटी में होना। इसके नीचे से ही अलकनंदा बहती हुई बद्रीनाथ पहुंच रही है। अलकनंदा का उदगम स्थल इन्ही पहाडों के ऊपर संतोपथ ग्लेशियर है। यहां से आगे सेना का कब्जा है। सेना की अनुमति लेकर ही ऊपर जा सकते हैं । हालांकि यही रोड चीन सीमा तक जा रही है पर केवल सैनिक ही जा सकते हैं। ट्रेकर्स को जोशीमठ से अनुमति पत्र लाना पढेगा। माणा गांव के निवासी अधिकांशत: राजपूत जाति से है जो यहां गरम कपडों के बेचने के अलावा खेती भी करते हैं। अक्टूवर नबंवर में वर्फवारी होते ही ये सभी लोग जोशीमठ की तरफ पलायन कर जाते हैं।
मेरी बाइक गांव के प्रवेश द्वार तक पहुंच जाती है जहां दो तीन चाय नास्ते की दुकानें हैं। सुवह की ठंड में भारत की अतिंम चाय की दुकान पर नास्ता करना सुखद ही लगा। वहीं बाइक खडी करके पैदल ही गांव में प्रवेश करता हूं। मुश्किल से पचास घर होंगे। गांव के अंत में ऊंचा पहाड है जिसमें से सरस्वती नदी फूट पडी है। पत्थर के अंदर से फूटती धारा और उस पर रखी एक बडी भीमकाय शिला गजब का नजारा दिखाती है। बताया जाता है कि भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है। वो बात अलग है कि पंडों ने इसे भीमकाय की बजाय भीम शिला बना दिया है। पांडूपुत्र भीम निसंदेह बलशाली था पर पंडो ने अपने अविवेकपूर्ण विवरण से उसे कोई राक्षस बनाने में कसर नहीं छोडी। उस भीमकाय पत्थर पर जिसे आज की कोई बहुत बडी क्रेन भी उठाने में दिक्कत मेहसूस करेगी, पंडो ने चौक से लिख दिया है," भीम के पैरों के निशान " । ऐसी ही बेतुकी बातों ने सनातन का मजाक उडवाया है। गांव में ही वेद व्यास गुफा और गणेश गुफा भी हैं जहां वेदों और उपनिषदों का लेखन कार्य हुआ बताया जाता है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। वेदव्यास जी गद्दी पर बैठने वाले सभी उनके शिष्य भी ऐसी ही एकांत प्राकृतिक गुफाओं में बैठकर अध्ययन अध्यापन किया करते थे।वसु धारा नामक स्थान पर  अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी। ये जगह माणा से आठ किलोमीटर दूर है।लक्ष्मी वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है। सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी) के बारे में कहा जाता है कि इसी स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था। अलकापुरी अलकनंदा नदी का उद्गम स्थान। इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है।
करीब दो घंटे तक गांव वासियों से बतियाने और गांव में घूमने के बाद मैं निकल पडा बापस जोशीमठ होते हुये चमोली गोपेश्वर की तरफ जहां से मुझे तुंगनाथ चौपता होते हुये उखीमठ और केदारनाथ पहुंचना था। 



उत्तराखंड चार धाम बाइक यात्रा : बद्री/बेर नाथ

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ऐसे तो जोशीमठ से बद्रीनाथ तक का पूरा रास्ता ही बहुत रोमांचक है। एक तरफ गहरी खाई तो दूसरी तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड। अलकनंदा के सहारे सहारे सिंगल रोड पर चलना खतरे से खाली नहीं है। बहुत बार ऐसी स्थिति ऐसी आती है कि हमें अपनी गाडी रोक कर सामने वाले वाहन को जगह देनी पडती है। कर्णप्रयाग से ही अलकनंदा की तलहटी में चलना मजेदार होता है लेऐकिन गोविंद घाट पर जाकर और भी मजेदार हो जाता है। पहाडों की ऊंचाई बढती ही जाती है।आसपास का नजारा देखने लायक होता है। मन ही नहीं करता आगे बढने को। खैर रात होती जा रही थी इसलिये आगे बढना मजबूरी थी इसलिये शाम सात बजे तक बद्रीनाथ पहुंच लिये। मंदिर के सामने तक बाइक पहुंच गयी पर सबसे पहले मुझे रुकने का प्रबंध करना था। भीड बहुत ज्यादा थी। एक भी धर्मशाला खाली नहीं मिली। होटल और लौज भी फुल। काफी देर तक इधर उधर भटकने के बाद एक धर्मशाला में रसोई में रात बिताने को मिली। उसके भी उसने चार सौ रुपये लिये। सर्दी भी काफी थी इसलिये नहाने की हिम्मत तो नहीं हुई बस पौलिस कर डाली और धर्मशाला में सामान रख कर पैदल ही निकल पडा मंदिर की तरफ। दस कदम की दूरी पर ही मंदिर था। भारत सीमा के अतिंम गांव माणा की तरफ से आती हुई अलकनंदा नदी अपने पूरे उफान पर थी। मंदिर के ठीक सामने नदी और उस पर बना हुआ पुल । पुल के दोनों ओर सजा हुआ बाजार। बाजार में घूमते हुये दूर दूर से आये हुये भक्त। नजारा देखने लायक था। भारत की विविधता ऐसी ही जगहों पर दिखाई पडती है। मंदिर के ठीक बगल ही गर्म पानी का तप्त कुंड और गर्मजल से उठता हुआ धुंआ। ऐसी ठंड में भी लोग उस कुंड में स्नान कर रहे थे। मेरी हिम्मत नहीं पडी क्यूं कि कुंड से निकलने के बाद हालत खराब होनी थी। रात को दर्शनार्थियों की भीड इतनी ज्यादा नहीं थी। यहां कैमरे की मनाही नहीं थी। अंदर भी मोबाइल मेरे साथ ही था किसी ने नहीं मना किया। लेकिन चूंकि कपाट बंद होने का समय हो चुका था अत: धक्कामुक्की हो गयी और दर्शन भी जल्दवाजी में ही हो पाये। बदरीनाथ की मूर्ति शालग्राम शिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ-स्थल है। यहाँ वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। मंदिर में बदरीनाथ की दाहिनी ओर कुबेर की मूर्ति भी है। उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सव मूर्ति है। उत्सवमूर्ति शीतकाल में बरफ जमने पर जोशीमठ में ले जाई जाती है। उद्धवजी के पास ही चरणपादुका है। बायीं ओर नर-नारायण की मूर्ति है। इनके समीप ही श्रीदेवी और भूदेवी है। सनातन के प्राचीन गृंथों के अनुसार भगवान विष्णु आकाशीय देवता है लेकिन पुराणों ने ईश्वर के त्रिगुण रक्षक पालक और और विनाशक के आधार पर इनका मानवीयकरण किया है। पौराणिक कथा के अनुसार विष्णु तप्त कुंड नामक स्थान पर तपस्या करने बैठे तो शीतकाल में वर्फवारी से उन्हें एक बेर /बदरी के पेड ने बचाया था अत: उन्हें बद्रीनाथ के नाम से जाना गया। पुराणों से थोडा हटकर इतिहास की बात करें तो यहां कभी बौद्धों का निवास हुआ करता था और बौद्ध लोग इस मूरत की पूजा किया करते थे लेकिन आठवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के संस्थापक आदि शंकराचार्य जी ने वैष्णव धर्म के प्रचार प्रसार के दौरान यहां बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना की और जोशीमठ में अध्ययन अध्यापन ज्ञानार्जन की परंपरा को चलाने हेतु मठ की स्थापना की थी। इसी प्रक्रिया में बौद्धों से संघर्ष भी हुआ और उन्हौने बद्रीनाथ की मूरत को तोडकर अलकनंदा में फेंक दिया। शंकराचार्य जी ने इसे पुन: स्थापित करवाया। हालांकि बौद्ध विद्धानों का कहना है कि शंकराचार्य ने बौद्ध मंदिरों पर ही कब्जा करके वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार किया है। सत्य इतिहास के गर्त में छुपा है जिसे खोजना बहुत जरूरी भी है। इस मंदिर का एक व्यापक सीढ़ीनुमा लंबा धनुषाकार मुख्य प्रवेश द्वार है। वास्तुकला के हिसाब से भी ये एक बौद्ध विहार (मंदिर) जैसा दिखता है। मंदिर के मंडप के अंदर, एक बड़े स्तंभों वाला हॉल है जो गर्भगृह या मुख्य मंदिर क्षेत्र की ओर ले जाता है।
पौराणिक कहानियों से अलग हटकर बात करें तो यह मंदिर अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है। और यहां प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जंगली बेरी बद्री के कारण ही इस धाम का नाम बद्री पड़ा है।
सुवह जल्दी ही जग कर तप्तकुंड की तरफ चल दिया। ये भी प्रकृति का ही एक चमत्कार ही है कि सामने वर्फ का पहाड हो और नीचे गर्म पानी निकल रहा हो। ऐसे चमत्कार और भी बहुत जगह मिले हैं पहाडों में। गरम पानी के कुंड में नहाने के बाद एक बार फिर मंदिर गया। सुवह सर्दी भी खूब थी और भीड भी बहुत थी। लेकिन नजारा आनंददायक था। भारत के हर कौने से आये हुये लोगों को देखकर रहा था। सिख सरदारों, बंगालियों और मद्रासियों की खूब भीड दिखी यहां। हेमकुंड साहिब आने वाले सभी सिख यहां भी आते हैं। भारत की हर संस्कृति यहां मौजूद थी और शायद यही उद्देश्य था शंकराचार्य का। चार धामों के माध्यम से भारत की विविधता को एकता में बदलना जो यहां साकार भी नजर आ रही थी। मंदिर के ठीक सामने उफनता अलकनंदा का सफेद जल और उसके ठीक ऊपर वर्फीली केदारनाथ । बताते हैं कि किसी जमाने में केदारनाथ और बद्रीनाथ का एक ही पुजारी हुआ करता था जो सुवह यहां पूजा करता और शाम को वहां। पूरा पहाड पार करने में उसे मात्र दो तीन घंटे ही लगते थे। बाद में भूगर्भीय हलचलों से रास्ता बंद हो गया। 
दृश्य इतना मनमोहक था कि जगह छोडने का मन ही नहीं कर रहा था पर अभी मुझे भारतीय सीमा के अतिंम गांव माणा की तरफ भी जाना था और फिर वहां से केदारनाथ की तरफ भी निकलना था अत: बद्रीनाथ जी को प्रणाम करते हुये माणा गांव की तरफ बढ लिया।

उत्तराखंड चार धाम बाइक यात्रा : संस्कृति ।।

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शिव और शक्ति अर्धनारीश्वर आदिदेव हैं। भारत में शुरू से ही शिव की उपासना होती रही है। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में भी पशुपतिनाथ योगी की मूर्ति मिली है। शिव को भारत के पशुपालकों, आदिवासियों, किसानों के साथ साथ प्रकृतिपूजक सभी मनुष्यों का ईष्ट देव माना जा सकता है। भले ही शिव को त्रिगुण त्रिदेव के रूप में या लिगं रुप में पहली दूसरी सदी में शामिल किया गया है, लेकिन पशुपतिनाथ या रुद्र देव के रूप में इनकी पूजा बहुत प्राचीन काल से हो रही है। भारत में आने वाली जातियों ने भी इन्हें अपने देवताओं में शरीक कर लिया। शिव न केवल भारत बल्कि विश्व के अन्य कई देशों में भी अलग अलग रुपों में पूजे जाते रहे हैं। यही कारण रहा कि भारत में गुप्तकाल एवं बाद के राजपूत काल में वैष्णव पंथ के उत्थान काल में भी शिव मंदिरों का निर्माण जारी रहा। इसी प्रक्रिया में देश भर में बारह ज्योतिरालिगं मंदिरों की स्थापना हुई। 
पहला सोमनाथ गुजरात दूसरा शैलपर्वत मलिक्कार्जुन तमिलनाडु तीसरा महाकाल उज्जैन
चौथा ऊंकारेश्वर पांचवां बैधनाथ परली हैदराबाद
छठवां भीमाशंकर पुणे सातवां रामेश्वरम तमिलनाडु
आठवां जागेश्वर अल्मोडा नौवां काशी विश्वनाथ
दसवां त्रयंबकेशर नासिक ग्यारहवां केदारनाथ
और बारहवां घुश्मेश्वर महाराष्ट्र। 
पौराणिक कहानियां भले ही सुनने में बहुत अटपटी एवं बे सिर पैर की लगती हों लेकिन उनसे हमें काफी हद तक प्रतीकात्मक रूप में देवों के स्वरुपों का भान हो जाता है। पौराणिक कहानी के अनुसार भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं। इस कहानी से शिव जी के पशुपालकों के देव होने की पुष्टि होती है। 
उत्तराखण्ड की संस्कृति इस प्रदेश के मौसम और जलवायु के अनुरूप ही है। उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और इसलिए यहाँ ठण्ड बहुत होती है। इसी ठण्डी जलवायु के आसपास ही उत्तराखण्ड की संस्कृति के सभी पहलू जैसे रहन-सहन, वेशभूषा, लोक कलाएँ इत्यादि घूमते हैं। उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है। यहाँ ठण्ड बहुत होती है इसलिए यहाँ लोगों के मकान पक्के होते हैं। दीवारें पत्थरों की होती है। पुराने घरों के ऊपर से पत्थर बिछाए जाते हैं। वर्तमान में लोग सीमेन्ट का उपयोग करने लग गए है। अधिकतर घरों में रात को रोटी तथा दिन में भात (चावल) खाने का प्रचलन है। लगभग हर महीने कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है। त्योहार के बहाने अधिकतर घरों में समय-समय पर पकवान बनते हैं। स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली गहत, रैंस, भट्ट आदि दालों का प्रयोग होता है। प्राचीन समय में मण्डुवा व झुंगोरा स्थानीय मोटा अनाज होता था। अब इनका उत्पादन बहुत कम होता है। अब लोग बाजार से गेहूं व चावल खरीदते हैं। कृषि के साथ पशुपालन लगभग सभी घरों में होता है। घर में उत्पादित अनाज कुछ ही महीनों के लिए पर्याप्त होता है। कस्बों के समीप के लोग दूध का व्यवसाय भी करते हैं। पहाड़ के लोग बहुत परिश्रमी होते है। पहाड़ों को काट-काटकर सीढ़ीदार खेत बनाने का काम इनके परिश्रम को प्रदर्शित भी करता है। पहाड़ में अधिकतर श्रमिक भी पढ़े-लिखे है, चाहे कम ही पढ़े हों।
भारत के प्रमुख उत्सवों जैसे दीपावली, होली, दशहरा इत्यादि के अतिरिक्त यहाँ के कुछ स्थानीय त्योहार हैं जैसे देवीधुरा मेला, पूर्णागिरि मेला (चम्पावत) नंदा देवी मेला (अल्मोड़ा) उत्तरायणी मेला (बागेश्वर) गौचर मेला (चमोली) वैशाखी (उत्तरकाशी) माघ मेला (उत्तरकाशी) विशु मेला (जौनसार बावर) गंगा दशहरा (नौला, अल्मोड़ा) आदि ।
यहाँ के कुछ विशिष्ट खानपान है जैसे आलू टमाटर का झोल, चैंसू, झोई, कापिलू, मंडुए की रोटी, पीनालू की सब्जी, बथुए का परांठा, बाल मिठाई, सिसौंण का साग और गौहोत की दाल आदि ।
पारम्परिक रूप से उत्तराखण्ड की महिलाएं घाघरा तथा आंगड़ी, तथा पूरूष चूड़ीदार पजामा व कुर्ता पहनते थे। अब इनका स्थान पेटीकोट, ब्लाउज व साड़ी ने ले लिया है। जाड़ों (सर्दियों) में ऊनी कपड़ों का उपयोग होता है। विवाह आदि शुभ कार्यो के अवसर पर कई क्षेत्रों में अभी भी सनील का घाघरा पहनने की परम्परा है। गले में गलोबन्द, चर्यो, जै माला, नाक में नथ, कानों में कर्णफूल, कुण्डल पहनने की परम्परा है। सिर में शीषफूल, हाथों में सोने या चाँदी के पौंजी तथा पैरों में बिछुए, पायजब, पौंटा पहने जाते हैं। घर परिवार के समारोहों में ही आभूषण पहनने की परम्परा है। विवाहित औरत की पहचान गले में चरेऊ पहनने से होती है। विवाह इत्यादि शुभ अवसरों पर पिछौड़ा पहनने का भी यहाँ चलन आम है।
लोक कला की दृष्टि से उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है। घर की सजावट में ही लोक कला सबसे पहले देखने को मिलती है। दशहरा, दीपावली, नामकरण, जनेऊ आदि शुभ अवसरों पर महिलाएँ घर में ऐंपण (अल्पना) बनाती है। इसके लिए घर, ऑंगन या सीढ़ियों को गेरू से लीपा जाता है। चावल को भिगोकर उसे पीसा जाता है। उसके लेप से आकर्षक चित्र बनाए जाते हैं। विभिन्न अवसरों पर नामकरण चौकी, सूर्य चौकी, स्नान चौकी, जन्मदिन चौकी, यज्ञोपवीत चौकी, विवाह चौकी, धूमिलअर्ध्य चौकी, वर चौकी, आचार्य चौकी, अष्टदल कमल, स्वास्तिक पीठ, विष्णु पीठ, शिव पीठ, शिव शक्ति पीठ, सरस्वती पीठ आदि परम्परागत गाँव की महिलाएँ स्वयं बनाती है। इनका कहीं प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। हरेले आदि पर्वों पर मिट्टी के डिकारे बनाए जाते है। ये डिकारे भगवान के प्रतीक माने जाते है। इनकी पूजा की जाती है। कुछ लोग मिट्टी की अच्छी-अच्छी मूर्तियाँ (डिकारे) बना लेते हैं। यहाँ के घरों को बनाते समय भी लोक कला प्रदर्षित होती है। पुराने समय के घरों के दरवाजों व खिड़कियों को लकड़ी की सजावट के साथ बनाया जाता रहा है। दरवाजों के चौखट पर देवी-देवताओं, हाथी, शेर, मोर आदि के चित्र नक्काशी करके बनाए जाते है। पुराने समय के बने घरों की छत पर चिड़ियों के घोंसलें बनाने के लिए भी स्थान छोड़ा जाता था। नक्काशी व चित्रकारी पारम्परिक रूप से आज भी होती है। इसमें समय काफी लगता है। वैश्वीकरण के दौर में आधुनिकता ने पुरानी कला को अलविदा कहना प्रारम्भ कर दिया। अल्मोड़ा सहित कई स्थानों में आज भी काष्ठ कला देखने को मिलती है। उत्तराखण्ड के प्राचीन मन्दिरों, नौलों में पत्थरों को तराश कर (काटकर) विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र बनाए गए है। प्राचीन गुफाओं तथा उड्यारों में भी शैल चित्र देखने को मिलते हैं।
उत्तराखण्ड की लोक धुनें भी अन्य प्रदेशों से भिन्न है। यहाँ के बाद्य यन्त्रों में नगाड़ा, ढोल, दमुआ, रणसिंग, भेरी, हुड़का, बीन, डौंरा, कुरूली, अलगाजा प्रमुख है। यहाँ के लोक गीतों में न्योली, जोड़, झोड़ा, छपेली, बैर व फाग प्रमुख होते हैं। इन गीतों की रचना आम जनता द्वारा की जाती है। इसलिए इनका कोई एक लेखक नहीं होता है। यहां प्रचलित लोक कथाएँ भी स्थानीय परिवेश पर आधारित है। लोक कथाओं में लोक विश्वासों का चित्रण, लोक जीवन के दुःख दर्द का समावेश होता है। भारतीय साहित्य में लोक साहित्य सर्वमान्य है। लोक साहित्य मौखिक साहित्य होता है। इस प्रकार का मौखिक साहित्य उत्तराखण्ड में लोक गाथा के रूप में काफी है। प्राचीन समय में मनोरंजन के साधन नहीं थे। लाकगायक रात भर ग्रामवासियों को लोक गाथाएं सुनाते थे। इसमें मालसाई, रमैल, जागर आदि प्रचलित है। अभी गांवों में रात्रि में लगने वाले जागर में लोक गाथाएं सुनने को मिलती है। यहां के लोक साहित्य में लोकोक्तियां, मुहावरे तथा पहेलियां (आंण) आज भी प्रचलन में है। उत्तराखण्ड का छोलिया नृत्य काफी प्रसिद्ध है। इस नृत्य में नृतक लबी-लम्बी तलवारें व गेंडे की खाल से बनी ढाल लिए युद्ध करते है। यह युद्ध नगाड़े की चोट व रणसिंह के साथ होता है। इससे लगता है यह राजाओं के ऐतिहासिक युद्ध का प्रतीक है। कुछ क्षेत्रों में छोलिया नृत्य ढोल के साथ श्रृंगारिक रूप से होता है। छोलिया नृत्य में पुरूष भागीदारी होती है। कुमाऊँ तथा गढ़वाल में झुमैला तथा झोड़ा नृत्य होता है। झौड़ा नृत्य में महिलाएँ व पुरूष बहुत बड़े समूह में गोल घेरे में हाथ पकड़कर गाते हुए नृत्य करते है। विभिन्न अंचलों में झोड़ें में लय व ताल में अन्तर देखने को मिलता है। नृत्यों में सर्प नृत्य, पाण्डव नृत्य, जौनसारी, चांचरी भी प्रमुख हैं।