Thursday, July 20, 2017

आसाम मेघालय यात्रा : गुवाहाटी से जोरहाट माजुली द्वीप।

चेरापूंजी से लौटते ही गुवाहाटी स्टेशन से जोरहाट की ट्रैन पकड ली। रात नौ बजे चलकर सुवह तडके ही पहुंचा देती है। माजुली द्वीप के लिये यहीं से फैरी पकडनी होती है लेकिन हम पहले गोलाघाट के नजदीक फरकटियर स्टेशन उतर गये क्यूं कि वहां मेरे मित्र कपिल चौधरी मेरा इंतजार कर रहे थे। झारखंड के रहने बाले घुमक्कड मित्र कपिल रेलवे कर्मचारी हैं यहीं पर। दो तीन घंटे आराम करने के बाद हम तीनों लोग जोरहाट के लिये निकल पडे। दो घंटे में ही पहुंचा दिया। जोरहाट में ही खाना खाया हम लोगों ने। सुभाष चौक से घाट के लिये मैजिक चलती है जो पच्चीस रुपये प्रति सवारी लेती है। फरकटियर से जोरहाट और ब्रम्हपुत्र घाट तक रास्ता ही अपने आप में एक आकर्षण है। चाय के बागानों और हरे भरे खेतों से ट्रैन गुजरती है तो एक अलग ही अहसास कराती है। और इसी प्रकार घाट तक का आधे घंटे का सफर भी असम को जानने का बेहतर मौका उपलब्ध कराता है। घनी हरियाली और शांतप्रिय माहौल के बीच आगे बढना दिल को सुकून पहुंचाता है।सडक के दोनों ओर बांस के घने पेड और बांस की बनी हुई मकानों की बाहरी बाउंड्री वाल। सडक के किनारे बांस को काटपीट कर आकार देते किसान । सब कुछ मंत्र मुग्ध करने बाला। भारत की संस्कृति को ठीक से जानना है तो पैदल या दोपहिया वाहन से निकलना ही ठीक होता है। गुवाहाटी से लेकर अब तक मैं अपनी बाइक को बहुत मिस कर रहा था। हालांकि माजुली पहुंचकर मुझे बाइक मिल जानी थी इसलिये चिंता नहीं थी फिर भी जाने क्यूं ऐसा लगता है कि बंद ट्रेन में बहुत कुछ छूट जाता है हमसे।
सबसे ज्यादा आनंद तो निमाई घाट पहुंचकर आया जहां सरकारी और निजी फेरी उपलब्ध हैं , माजुली पहुंचाने के लिये। माजुली द्वीप अब जिला घोषित किया जा चुका है। घाट पर हम पहुंचे तो फैरी लगी हुई थी। पन्द्रह रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब कपिल जी तीन टिकट ले आये। हालांकि फैरी में अदंर बैठने की बहुत अच्छी व्यवस्था है लेकिन हम बैठने वालों में से कहां हैं , चढ गये छत के ऊपर जहां फैरी चालक बैठा रहता है। कुछ दैनिक यात्री भी चढ गये। उन्हौने तो तुरंत जाकर अपने ताश पत्ते निकाले और शुरू हो गये तीन पत्ती फ्लश खेलने। हमारा मन तो विशाल ब्रम्हपुत्र की गहराईयों में डूबा हुआ था। फैरी में हर रोज सैकडों लोग इधर से उधर आवागमन करते हैं। फैरी से न केवल यात्रियों वरन बाइक्स और फोर व्हीलर्स भी इधर से उधर ले जाया जाता है। थोडी ही देर में फैरी के बडे बडे रस्से खोल दिये गये और फैरी चल पडी ब्रम्हपुत्र की धारा की सीध में। फैरी या नाव हमेशा लंबाई में चलती है। धारा को धीरे धीरे काटते हुये दूसरी ओर पहुंचाती है। इस नद की चौडाई ही इतनी है कि फैरी को पहुंचने में दो घंटे लग गये लेकिन ये दो घंटे का सफर मेरे लिये यादगार बन गया। ब्रम्हपुत्र में ढलते सूरज को देखना बहुत ही अच्छा लगता है। माजुली आजकल चिंता का विषय बना हुआ है सरकार के लिये। लगातार घटता ही जा रहा है। ब्रम्हपुत्र नदी का मिट्टी कटाव तेजी से बढ रहा है। असम में भूकटाव हर नदी के तट पर होने वाली एक प्राकृतिक घटना है क्योंकि यहाँ की मिट्टी रेतीली है और इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ अभी भी विकास के क्रम में हैं। विनाशकारी भूकंप के बाद से द्वीप के दक्षिणी किनारे पर लगातार कटाव से कई गांवों और सत्र नदी की गाल में समा चुके हैं। भूकटाव ने माजुली द्वीप के जनसांख्यिकीय स्वरुप, पारिस्थितिकी, पर्यावरण, सामाजिक संरचना और आर्थिक विकास को खासा प्रभावित किया है ।
दो घंटे की रोमांचक यात्रा के बाद हम पहुंचे हैं निमाई घाट जहां से हमें एक जीप मिल जाती है जो हमें बीस रुपये में कमलाबाडी बाजार तक छोड देती है लेकिन जीप ड्राईवर अजय जो देखने में बिल्कुल अरुणाचल प्रदेश या मणिपुरी पहाडी प्रदेश का लग रहा था, कपिल से जल्दी घुलमिल गया और उसी ने हमें बंबू हट कौटेज के बारे में बताया। हालांकि कमलाबाडी बाजार में मात्र पांच सौ रूपये में रुम मिल जाता है लेकिन यह एकदम हरे भरे माहौल में शहर से दूर धान के खेतों के बीच शांतिप्रिय जगह थी तो हजार रुपये प्रति कौटेज हमें ज्यादा न लगे और फिर इसके पास बाइक्स भी थी जिससे हम शहर घूम सकते थे। एक दिन के पांच सौ रुपये पैट्रोल अपना। शाम हो चली थी भूख भी लग आयी थी। पहले तो नहा धोकर हरारत दूर की। खाना चाहे तो आप खुद भी बना सकते हैं और चाहें तो आप और्डर कर सकते हैं। एक सौ पचास रूपये प्रति थाली। हालांकि कमलाबाडी बाजार की अपेक्षा ये कौटेज थोडी मंहगी है लेकिन हम इस समय शहर से दो किमी दूर थे। दूर दूर तक सिर्फ खेत ही खेत। रात को मच्छरों से बचने को मच्छरदानी और कौईल दोनों का ही प्रयोग करना पडा लेकिन नींद बहुत गहरी आयी। अगली सुवह हमें जल्दी ही माजुली दर्शन के लिये निकलना था। श्री वीरेन्द्र परमार जी की दी हुई जानकारी के अनुसार उत्तर – पूर्वी भारत के युगांतरकारी महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की पुण्यभूमि के रूप में ख्यात माजुली द्वीप विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है I यह असम में जोरहाट के निकट ब्रह्मपुत्र नदी में अवस्थित है I इस द्वीप पर श्रीमंत शंकरदेव का स्पष्ट प्रभाव महसूस किया जा सकता है I इस द्वीप का निर्माण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों मुख्यतः लोहित द्वारा धारा परिवर्तित करने के कारण हुआ है I समृद्ध विरासत, पर्यावरण अनुकूल पर्यटन और आध्यात्मिकता के कारण माजुली देशी – विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन गया है I यह द्वीप पक्षियों के लिए स्वर्ग है I कार्तिक पूर्णिमा के समय आयोजित होनेवाली रासलीला के अवसर पर यहाँ असमिया संस्कृति जीवंत हो उठती है I इस अवसर पर पारंपरिक नृत्य, गीत और नाटिका की प्रस्तुति पर्यटकों का मन मोह लेती है I यहाँ की संस्कृति और नृत्य – गीत पर आधुनिकता का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है I वैसे तो बरसात को छोड़कर कभी भी इस द्वीप का भ्रमण किया जा सकता है लेकिन जिन्हें असमिया संस्कृति की झलक देखनी हो उन्हें रासलीला के समय अवश्य आना चाहिए I अतीत में माजुली का कुल क्षेत्रफल 1,250 वर्ग किलोमीटर था लेकिन भूक्षरण के कारण इसका क्षेत्र सिमटकर अब मात्र 422 वर्ग किलोमीटर रह गया है I यहाँ की अधिकांश जनसंख्या आदिवासी है I वर्तमान में यहाँ लगभग 22 वैष्णव सत्र हैं जिनमे औनीअति सत्र, दक्षिणपथ सत्र, गरमुर सत्र और कालीबारी सत्र महत्वपूर्ण हैं I यहाँ का सामग्री सत्र मुखौटा निर्माण के लिए प्रख्यात है I इस सत्र में मुखौटा निर्माण का प्रशिक्षण भी दिया जाता है I पंद्रहवीं शताब्दी में इसी द्वीप पर वैष्णव संत संकरदेव एवं उनके शिष्य माधवदेव का पहली बार मिलन हुआ था I सर्वप्रथम श्रीमंत शंकरदेव ने सत्रों की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य वैष्णव धर्म का प्रसार करना और असमिया संस्कृति को अक्षुण्ण रखना था I सत्र को आसान भाषा में वैष्णव मठ कहा जा सकता है I ये मठ सामाजिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र हैं I माजुली विगत पांच सौ वर्षों से असमिया सभ्यता और संस्कृति की राजधानी बना हुआ है I इस द्वीप पर मुख्यतः तीन जनजातीय समुदाय के लोग निवास करते हैं – मिशिंग, देवरी और सोनोवाल कछारी I द्वीप पर 144 गाँव हैं और कुल जनसंख्या लगभग डेढ़ लाख है I यहाँ चावल की एक सौ से अधिक किस्मे उत्पादित की जाती हैं और इनके उत्पादन के लिए किसी प्रकार के कीटनाशक और रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया जाता है I यहाँ शहर का कोलाहल नहीं, प्रदूषण नहीं, शांत वातावरण और सरल जीवन है, आध्यात्मिक शांति हैI






















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Monday, July 10, 2017

आसाम मेघालय यात्रा : चेरापूंजी सोहरा भाग 1 ।

आखिरकार हम पहुंच गये विश्व के सर्वाधिक वर्षा बाले स्थान चेरापूंजी क्षेत्र में। यहां औसत वर्षा 10,000 मिलीमीटर होती है। पर उस दिन मौसम बहुत शानदार रहा। एलीफेंट गुफा से लेकर सोहरा तक एक बूंद बारिस न हुई। यहां का क्षेत्रीय नाम सोहरा ही है। चेरापूंजी नाम तो अंग्रेजों का दिया हुआ है।  सोहरा में प्रवेश करते ही घनी वादियों में गिरते ऊंचे ऊंचे झरनों ने हमारा स्वागत कर दिया।
चेरापूंजी में जब आप पहुंचेंगे तो आपको चारों ओर सिर्फ झरनों का शोर सुनाई देगा। हरियाली से सजी चेरापूंजी की पहाड़ियां बरबस ही लोगों को अपनी ओर खींच लेती हैं। जब बारिश होती है तो बसंत अपने शबाब पर होता है। ऊंचाई से गिरते पानी के फव्वारे, कुहासे के समान मेघों को देखने का अपना अलग ही अनुभव है। यहां के स्थानीय निवासियों को बसंत का बड़ी शिद्धत से इंतजार होता है। चेरापूंजी में खासी जनजाति के लोग मानसून का स्वागत अलग ही अंदाज में करते हैं। मेघों को लुभाने के लिए लोक गीत और लोक नृत्यों का आयोजन किया जाता है जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।
सोहरा चेरापूंजी सर्किट में प्रवेश करते ही " वाहकाबा" झरने आपका स्वागत करते हैं। रोड के सहारे ही एंन्ट्रीगेट है। बीस रुपये टिकट है। नीचे उतर कर जाओ तो बस मुंह से वाह वाह ही निकलेगा। अभी तो ये पहला झरना था आगे तो लाईन लगी पडी थी। वाहकाबा झरनों पर हमने थोडा ही समय दिया और बढ गये सोहरा शैला रोड पर । सोहरा में थोडा आगे चल कर ही एक तिराहा आता है। इसी तिराहे के सीधे हाथ पर हैं रामकृष्ण मिशन और नोहकालीकाई झरने जो कि चेरापूंजी का मुख्य आकर्षण है और लैफ्ट हैंड पर मुख्य रोड चली जाती शैला की तरफ। पूरा सोहरा शहर इसी रोड पर पडता है। इसी रोड पर आगे चल कर बहुत सारे चर्च, ग्रेवयार्ड, पोस्ट औफिस, बैंक और पैट्रोल पंप के अलावा मुख्य आकर्षण मौसमेव गुफा और खूबसूरत झरने, सेवन सिस्टर फाल्स , हरे भरे पार्क आदि  हैं।
नोहकालीकाई फाल्स शहर से पांच किमी दूर थे , सोचा पहले मौसमेव गुफा की तरफ चलते हैं क्यूं कि अंधेरे होने पर वहां जा नहीं पायेंगे इसलिये हमारी स्कूटी मुड गयी मौसमेई गुफाओं की तरफ। गुफाओं से पहले पार्किगं में ही काफी सारी दुकानें और रैष्ट्रां बने हुये हैं। जहां आप शाकाहारी मांसाहारी भोजन कर सकते हैं। अभी शाम के चार बजे थे। थोडी धूप भी थी। बीस रुपये की टिकट ली और उतर गये नीचे गुफा में। गुफा में घुसने से पहले मानसिक तौर पर तैयार हो जाना चाहिये वरना घबराहट हो सकती है।  150 मीटर लम्बी इस गुफा के अन्दर प्रकाश का समुचित प्रबन्ध है अत: डर तो न लगा किंतु यह अनुभव मेरे जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बन गया। गुफा का प्रवेशद्वार बड़ा है किन्तु जल्द ही यह सँकरा हो जाता है। कई मोड़ों और घुमावों के साथ इसमें काफी रोचक अनुभव होता है, लेकिन यदि काफी भीड़ हो तो साँस लेने में परेशानी हो सकती है। गुफा का अन्दरूनी हिस्सा कई प्रकार के जीव-जन्तु और पौधों की प्रजातियों का घर है और चमगादड़ तथा कीड़े-मकोड़ों के लिये उत्तम पनाहगार है।टपकते पानी से पत्थरों पर बनी विभिन्न प्रकार की सुन्दर बनावटें प्रकृति का एक और चमत्कार हैं। जैसे गुफा और संकडी हुई , हमें निकलने के लिये अपने शरीर को भी तोडना मोडना पडा। तभी सामने से घबराती हुई महिला और बच्चों ने रोना शुरू कर दिया। ऐसे में उनका तो लौटना ही ठीक था, सांस लेने में तकलीफ हो जाती है तो धीरज रखना चाहिये। घवराहट तो और काम खराब कर सकती है। थोडा आगे चल कर यह गुफा नीचे से और चिकनी हो जाती है। नीचे पानी में होकर चलना पडता है। ऊपर से भी जल टपक रहा है। दीवारों पर टपकते पानी की तरह पत्थर पर धार बनी हैं। गुफा में जैसे जैसे बढते हैं रोमांच आना आरंभ हो जाता है। पत्थरों में अलग अलग तरह की आकृतियां दिखाई देती हैं। कई आकृतियां किसी मनुष्य किसी जानवर तो कई बार किसी देवी देवता सरीखी लगती हैं। चूना पत्थर की ये गुफाएं हजारों साल पुरानी लगती हैं। जगह जगह इनसे पानी टपकता रहता है। कई जगह गुफा में घुटने भर पानी से होकर आगे बढ़ना पड़ता है। कई जगह ऊंचाई कम होने पर सिर बचाना भी पड़ता है। कई जगह तो एक ही आदमी के निकलने पर भर रास्ता होता है। गुफा को पार करते हुए काफी रोमांच आता है। यह पता नहीं होता कि गुफा कहां खत्म होने वाली है और कब हम खुली हवा में बाहर आने वाले हैं। बच्चों रास्ते में डर भी लगने लगता है, गुफा के अंदर आगे पीछे एक दूसरे से संवाद स्थापित करते हुए ही आगे बढना ठीक रहता है। गुफा में जाते समय मेरे पास टार्च न थी तो मैंने मोबाइल से वीडियो बनाना शुरू कर दिया जिससे रोशनी भी हो गयी और अदभुत अनुभव कैद भी हो गया। इससे पहले भी मैं गुफाओं में गया हूं पर इस बार भोले बाबा पधरे नहीं मिले और ना ही कोई पंडित मिला। पहला प्राकृतिक चमत्कार था जिसका टैक्स सरकार पर जा रहा था किसी पंडे पर नहीं। जैसे ही ये गुफा खत्म होने को आती है सीधे हाथ पर दूसरी गुफा दिखाई देती है पर इसमें प्रकाश नहीं है, इसलिये आना जाने की मनाही है। कहते हैं ये गुफा कामाख्या मंदिर गुवाहाटी तक गयी है, सच्चाई भगवान जाने। गुफा में घुसने से पहले एक रेस्ट्रां बाली आंटी के पास अपना बैग जमा करा था और पावरबैंक चार्जिगं पर लगाया था अत: बाहर निकल कर सोचा कि खाना भी यहीं खा लिया जाय बैसे भी शाम होने जा रही है भूख लग आयी थी। सूरज डूबने को था। मौसमेई ईको पार्क रिसोर्ट और उसके खूबसूरत फाल्स नजदीक ही थे।खाना खाकर तुरंत निकल लिये।



















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आसाम मेघालय यात्रा : चेरापूंजी के झरने

मौसमेई गुफा से मौसमेई ईको पार्क का दस मिनट का रास्ता है। यहां टिकट नहीं लगी। स्कूटी खडी की और सामने फैले हुये विशाल पहाडी मैदान की तरफ बढ चले। इसमें जगह जगह पर बहते हुये जल को रोक कर वाटर पार्क बनाया हुआ है। बच्चों के लिये झूले भी है। यही पानी बहते हुये आखिर में गहरी खाई में गिरता है और शानदार जलप्रपात का रूप ले लेता है। यहां से खडे होकर सामने दूर दूर तक फैली हुई हरी भरी घाटियां और उनमें उमडते घुमडते बादलों को देखना गजब का ऐहसास कराता है। यहीं से सामने एक और फाल्स नजर आते हैं " सेवन सिस्टर फाल्स " । बहुत ही खूबसूरत नजारा है। सूरज ढलने लगा। सर्दी भी बढने लगी। बारिश तो नहीं हुई लेकिन तैयारी पूरी थी। जल्दी से रूम लेना ठीक रहेगा सोच कर थोडा आगे बढे तो देखा एक फुटबाल टाईप की वाटर टैंक के सामने एक होम स्टे है। हजार रुपये में डबल रूम। खाना खा ही चुके थे। रूम में घुसे ही थे कि बारिश शुरू। ऐसी शुरू हुई कि सुवह के छ बजे तक पडती रही। सुवह आसमान एकदम साफ।जल्दी ही स्नान कर निकल पडे रामकृष्ण मिशन मंदिर / विद्यालय और फिर नोहकालीकाई फाल्स की तरफ।
रामकृष्ण मिशन के गेट पर पहुंचे ही थे कि बारिश शुरू हो गयी। विद्यालय का तो समय नहीं हुआ था इसलिये बच्चे नहीं थे स्कूल पूरा खाली था। मंदिर में ऊपर एक विशाल कक्ष जिसमें गुरूजी की तस्वीर लगी हुई थी और तीन भक्त बैठ कर पाठ कर ुरहे थे। आरती में समय ज्यादा लगता हुआ देखकर हम तो निकल पडे प्रांगण की तरफ किसी को ढूंढने जिससे ज्ञानार्जन कर सकूं। पूरा कैंपस सुनसान। बारिश ने ठंड बढा दी थी। बाहर निकल कर चाय नास्ता किया और निकल पडे नोहकालीकाई झरने की तरफ जो उसी रोड पर पांच किमी आगे था। ये पांच किमी का सफर चेरापूंजी यात्रा का सबसे बेहतरीन सफर था। पूरे पांच किमी में एक भी मकान या रिहायस नहीं। दूर दूर तक फैले हरे भरे पठार। ऊपर से रिमझिम बारिश । ठंडी ठंडी हवा के झोंके। संकरी सी रोड । थोडी सी भी लापरवाही हो जाये तो चले जायें सीधे गहरी खाई में। इसी बीच कुछ विदेशी घुमक्कड दोस्त भी मिले जो पैदल ही झरनों की तरफ बढ रहे थे। झरनों के पास पहुंचे तो एक लडके ने बीस रुपये का टिकट काट दिया और उसी के होटल के सामने हमने अपनी स्कूटी खडी कर दी। उस होटल के पीछे ही गिर रहा था चेरापूंजी का सबसे खूबसूरत झरना नोहकालीकाई । ये झरना भारत का सब से ऊंचा झरना माना जाता है। यह 1,100 फुट से नीचे गिरता है। जैसे जैसे आप इस झरने के करीब पहुंचते हैं, ऊंचाई से गिरते पानी की आवाज आप के कानों में गूंजने लगती है और पानी को गिरता देख उस में डुबकी लगाने का दिल करने लगता है। झरने के ठीक सामने व्यू पौइंट से झरने की खूबसूरती देखते ही बनती है। अगर आप झरने को और करीब से देखना चाहते हैं तो पत्थरों व पहाड़ों की सहायता से चढ़ कर आसपास के कई छोटे झरनों को पास से देख सकते हैं, भीगने का आनंद ले सकते हैं, पत्थरों पर चढ़ कर फोटो भी खिंचवा सकते हैं. लेकिन ध्यान रहे, यहां थोड़ी फिसलन होती है। इस की खूबसूरती देखते ही बनती है। कोहरे से निकलते बादलों की नम हवा ऐसा महसूस कराती है मानो आप आसमान में हैं। झरने से गिरता पानी और आसपास का दृश्य पूरी तरह से आप को सुकून पहुंचाने वाला होता है। यहां झरने के पास ही बांस से बने खिलौने बिकते हैं जो काफी अलग होते। स्थानीय स्मृति चिह्नित वाली चीजें भी मिलती हैं। आप ने हमेशा छोटेछोटे टुकड़ों में दालचीनी देखी होगी लेकिन यहां दालचीनी छड़ी के रूप में मिलती है। नोहकालीकाई नामक स्थान पर बहुत चौडा पठारी भाग है जो चारों ओर से एक गहरी घाटी से जुडा है। आपके पास यदि समय है तो यहां चहलकदमी कीजिये। स्वर्ग यहीं दिख जायेगा। रिमझिम बारिश में हम पूरा एक चक्कर लगा आये लेकिन तेज हवाओं ने हमें होटल में घुसने पर मजबूर कर दिया। थोडी हवायें कम हुई और हम निकल पडे बापस गुवाहाटी की ओर । मेघालय ने तो हमारा दिल जीत लिया। अगली बार फिर आयेंगे । इस बार दो नहीं पूरे दस दिन यहीं बितायेंगे। मेघालय ऊंचे-ऊंचे चीड़ के पेड़ों और बादलों का एक अंतहीन सिलसिला है। आप शहरी पागलपन से दूर सुखद जीवन की अनुभूति चाहते हैं तो मेघालय की यात्रा कीजिए।मेघालय में आप ताजा पहाड़ी हवा में सांस ले सकते हैं। अपनी आत्मा को ऊंचे चीड़ के पेड़ों की सरसराहट वाली हवा में खो जाने दीजिए। आपने आखिरी बार पानी की कलकल ध्वनि कब सुनी थी ? मेघालय में सबकुछ है- ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से नीचे गिरते झरने या अनदेखी गुफाएं या पृथ्वी की सबसे गीली जगह- चेरापूंजी जहां सबसे ज्यादा बारिश होती है।बीहड़ इलाकों में प्राचीन बस्तियों की झलक आपको यहां मिलेगी। आधुनिकताओं से अछूते विनम्र आदिवासियों के आकर्षक जीवन से दोस्ती करने का अवसर। भारत के बाकी हिस्सों के विपरीत यहां का आदिवासी समाज मातृसत्तात्मक है। आदिवासी उत्सवों के दौरान मेघालय आयेंगे यहां काफी कुछ देखने को मिलेगा। मिथकों और किंवदंतियों का इतिहास और धर्म के साथ तालमेल। रंगीन उत्सव में भाग लेते आदिवासी। मेघालय भारत के सबसे खूबसूरत परिदृश्यों में से एक है, जहां प्रकृति ने कई उपहार दिए हैं। यहां बारिश भी है और धूप भी। धुएं से ढंकी पहाड़ियों और बादलों का कभी खत्म न होने वाला सिलसिला और हरियाली से आच्छादित जंगल आपकी कल्पनाओं में रच-बस जाएंगे। यहां की रंगीन जनजातियां इस आकर्षण को और बढ़ाने एवं आपके स्वागत सत्कार के लिए हमेशा तैयार खडी हैं।
















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