Wednesday, June 21, 2017

आसाम मेघालय यात्रा: दूसरा दिन हनुमानगढी दर्शन अयोध्या ।।

अयोध्या न जाने कितनी बार बसी और उजड़ी, फिर भी एक स्थान हमेशा अपने मूल रूप में ही रहा। यही वह हनुमान टीला है, जो आज हनुमानगढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। इस्लाम के अनुयायी शाषक बुतपरस्ती की खिलाफत के चलते मूर्तिकला के इतने बडे दुश्मन हो जायेंगे कि बौद्ध जैन हिंदू किसी भी मंदिर को न छोडेंगे, शायद मुहम्मद साहब को भी पता न होगा। हालांकि अयोध्या ने दोनों ही तरह के मुस्लिम शाषक देखे हैं। एक तरफ मंदिरों को ध्वस्त करते मूर्तियों को खंडित करते आतताई देखे हैं तो भगवनकृपा से अभिभूत दान देते श्रद्धालु मुसलमान भी देखे हैं।
आमिर अली नाम के एक शाषक के हनुमान गढी पर आक्रमण को रोकने बाले सशस्त्र नागा बाबाओं की कहानियां अयोध्या में खूब प्रचलित हैं तो वहीं दूसरी ओर मंसूर अली जैसे दानी नबाव भी लोकप्रिय है। किवदंती के अनुसार लगभग दसवीं शताब्दी के मध्य में सुल्तान मंसूर अली लखनऊ और फैजाबाद का प्रशासक था। एक बार सुल्तान मंसूर अली का एकमात्र पुत्र बीमार पड़ गया। प्राण बचने के आसार नहीं रहे, रात्रि की कालिमा गहराने के साथ ही उसकी नाडी उखडने लगी तो सुल्तान ने थक हार कर हनुमानजी की शरण ली। अपने इकलौते पुत्र के प्राणों की रक्षा होने पर अवध के नवाब मंसूर अली ने बजरंगबली के चरणों में माथा टेक दिया। जिसके बाद नवाब ने न केवल हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया बल्कि तांम्रपत्र पर लिखकर ये घोषणा की कि कभी भी इस मंदिर पर किसी राजा या शासक का कोई अधिकार नहीं रहेगा और न ही यहां के चढ़ावे से कोई कर वसूल किया जाएगा, और 52 बीघा भूमि हनुमान गढी व इमली वन के लिए उपलब्ध करवाई थी।
अयोध्या के सशस्त्र निर्वाणी अणी (सेना) के महन्त अभय रामदास के नेतृत्व में 18वीं शताब्दी में नागा साधुओं ने हनुमान गढ़ी को मुसलमानों से मुक्त कराया । वे सिद्धयोगी भी थे। उनके मार्गदर्शन में सशस्त्र नागा साधु बड़ी संख्या में विचरणशील थे। उनकी इस सशस्त्र नागा अणी (सेना) में देशभर के नागा साधु-संत बड़ी संख्या में सम्मिलित थे।
एक दिन महन्त अभय रामदास जब प्रवास में उज्जयिनी से चलकर अयोध्या आए, तो उन्होंने अपनी सशस्त्र नागा अणी (सेना) का पड़ाव सरयू नदी के तट पर डाला। वहां उन्हें पता चला कि अयोध्या में त्रेतायुगीन श्रीराम राज्य के समय भगवान श्री राम के राजमहल (रामकोट) के पूर्वी द्वार पर स्थित हनुमान जी के वासस्थान पर मुसलमानों ने कब्जा करके वहां नमाज पढ़नी शुरू कर दी है। हनुमान जी का वह आवास मात्र एक “टीले” के रूप में रह गया है, जिसे लोग “हनुमान टीला” कहने लगे हैं। यह दृश्य महन्त अभय रामदास को कचोटने लगा। एक दिन वे अपनी सशस्त्र नागा अणी (सेना) लेकर हनुमान टीले पर चढ़ आए और वहां से मुसलमानों को भगा दिया। महन्त अभय रामदास नियमपूर्वक प्रत्येक आश्विन शुक्ल अष्टमी को अपनी अणी (सेना) सहित शस्त्र-पूजन किया करते थे। उनकी तलवार तब हवन कुण्ड के समीप ही रखी होती थी। बाद में मुसलमानों ने कई बार हनुमान गढ़ी पर धावा बोला, पर महन्त अभय रामदास ने हर बार उन्हें मार भगाया। महन्त अभय रामदास तब से स्थायी रूप से हनुमान गढ़ी में ही निवासकर पूजा अर्चना करने लगे। उनकी सशस्त्र साधु मण्डली भी उनके साथ ही वहीं रहती थी। ये नागा साधु उज्जैन, हरिद्वार, प्रयाग और गंगासागर से संबंधित रहे थे। उनकी 4 श्रेणियां थीं; 1. सागरिया, 2. उज्जैनिया, 3. हरिद्वारी 4. बसंतिया। प्रयाग से संबंधित नागाओं की 3 अणी (सेना) और 7 अखाड़े हैं, जिनमें एक निर्वाणी अणी (सेना) का प्रमुख केन्द्र हनुमान गढ़ी ही रहा है। नागा साधु ही हनुमान गढ़ी के महन्त, पुजारी और उसकी पंचायत के प्रवक्ता होते हैं। नागा पद प्राप्ति के पूर्व साधु को 2-2 साल की 6 श्रेणियों-यात्री, छोटा, हुरदंगा, बंदगीदार आदि नाम वाले स्तरों से गुजरना पड़ता है। बाद में एक बड़े समारोह में उसे नागा पद प्रदान किया जाता है। सन् 1915 में अमीर अली ने हनुमान गढ़ी पर आक्रमण किया था। उसने मुसलमानों को यह कहकर उकसाया कि नागाओं ने मस्जिद ढहा दी है। उसने सुन्नी मुस्लिम फौज बनाकर हनुमान गढ़ी पर चढ़ाई कर दी, पर हनुमान गढ़ी के नागा साधुओं और उनका साथ देने वाले हिन्दू जत्थों ने उन हमलावरों को धूल चाटने पर विवश कर दिया। इस तरह हनुमान गढ़ी सुरक्षित रही। गढ़ी के सर्वोच्च पदाधिकारी को “गद्दीनशीन” कहकर पुकारा जाता है। यह मंदिर काफी बड़ा है। मंदिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, जिनमें साधु-संत रहते हैं। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला व अंगद टीला नामक स्थान हैं। आज भी हनुमान गढ़ी के नागा साधु कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमत जयन्ती तो मनाते ही हैं, साथ ही कार्तिक शुक्ल एकादशी को सशस्त्र परिक्रमा करते समय उनके हाथ में “निशान” (ध्वज) भी रहता है। इसी प्रकार फाल्गुन शुक्ल एकादशी को भी वे ध्वज के साथ ही शस्त्र-पूजन भी करते हैं। आश्विन शुक्ल को नागा अखाड़ों में शस्त्र-पूजन करके हनुमान गढ़ी से चलकर अयोध्या नगरी में निशान-यात्रा की जाती है।
इस हनुमान टीले तक पहुंचने के लिए भक्तों को पार करना होता है 76 सीढ़ियों का सफर, जिसके बाद दर्शन होते है पवनपुत्र हनुमान की 6 इंच प्रतिमा के, जो हमेशा फूल-मालाओं से सुशोभित रहती है। अंजनीपुत्र की महिमा से परिपूर्ण हनुमान चालीसा की चौपाइयां हृदय के साथ-साथ मंदिर की दीवारों पर सुशोभित हैं। कहते हैं कि हनुमानजी के इस दिव्य स्थान का महत्व किसी धर्म विशेष में बंध कर नहीं रहा, बल्कि जिस किसी ने भी यहां जो भी मुराद मांगी, हनुमानलला ने उसे वही दिया तभी तो अपने इकलौते पुत्र के प्राणों की रक्षा होने पर अवध के नवाब मंसूर अली ने इस मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया था।हनुमानगढी मंदिर शिल्पकला की दृष्टि से सुंदर मंदिर है। बाजार में ही है। करीब सत्तर सीढियां चढकर अदंर प्रवेश किया। गेट पर सिर्फ एक गनमैन बैठा हुआ था। रामलला से तो ज्यादा बजरंगवली ताकतवर लगे मुझे जिन्हौने रामलला की तरह Z plus सिक्योरिटी नहीं ले रखी थी। हनुमानगढी एकदम रंग बिरंगा सुंदर मंदिर है जिसके मुख्य भवन के चारों ओर एक वरामदा है और उसके आगे खुला आंगन । आंगन के बाद चारों ओर बने हुये भवन जिसमें अन्य छोटे छोटे कक्ष। मुख्य मंदिर के गेट पर धक्कामुक्की में हम अदंर तो नहीं घुस पाये लेकिन ऊंचे स्थान पर खडे होकर दर्शन आराम से कर लिये। बंदर यहां भी बहुत हैं। ज्यादातर भक्त एक निगाह हनुमान जी पर तो दूसरी निगाह अपने थैले पर रखते हैं। निगाह चूकी नहीं कि थैला गया मंदिर की सबसे ऊंची मंजिल पर।




सत्य की खोज

आसाम मेघालय यात्रा : गोरखपुर से कामाख्या

अयोध्या के मुख्य मुख्य स्थल हमने ग्यारह मई के दोपहर एक दो बजे तक ही कवर कर लिये थे। मेरा दोस्त प्रमोद त्रिपाठी भी अपनी कोचिंग से फ्री हो चुका था। हम तीनों नजदीक ही एक रेस्ट्रां में बैठे थे कि घर से फोन आया कि बाबूजी राजो की बजह से बहुत चिंतित हैं। उनकी तबियत बिगड रही है। बाबूजी नहीं चाहते थे कि हम बाइक से इतनी दूर की यात्रा करें। घुमक्कडी में पहली बाधा मां बाप ही होते हैं। इस बाधा को पार करना हमारे लिये बहुत कठिन काम होता है। माता के बाद पिता ही होते हैं जो हमारे घुमक्कडी संकल्प को तोडने का प्रयास करते हैं। मां आंसुओं से रोकती है तो पिता डंडे से। घुमक्कड के लिये पहली चुनौती तो यही है कि वह घर परिवार समाज की जंजीरों को तोडना सीख ले। जंजाल तोडकर बाहर आना पहली आवश्यकता है। 
मैंने छुपाना नहीं सीखा। जो भी करना है खुल कर करेंगे। गांधी जी का अनुयायी हूं। उनके अहिंसा और सत्यागृह ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है। खुद को बेपर्दा करने की हिम्मत मैंने उनसे ही ली है।
केवल एक खुदा ही है जिसके सामने आप खुद को नंगा कर सकते हैं, आतंरिक एवं बाहरी रूप में एकदम नंगा , कोई परदा नहीं, कोई हिचक नहीं, बिल्कुल ठीक बैसे ही जैसे मां के सामने एक मासूम सा अवोध बच्चा अपने मन की हर बात कहता जाता है।
भौतिकवादी संसार में लिप्त मनुष्य के सामने जब हम अपना बाहरी आवरण उठाने लगते हैं, जाने कैसा कौनसा अनजाना भय उसे सताता है कि वह हमें विभिन्न प्रकार से रोकने की कोशिष करने लगता है। बहुत सारे लोगों को गांधी जी के निजी जीवन पर भद्दी टिप्पणियां करते पढता हूं, अब अजीव नहीं लगता। पहले लगता था। अब समझ चुका हूं कि सत्य की नियति यही है। खुद के बारे में सत्य बोलना इतना ही सुखदायी होता तो आज संपूर्ण दुनियां सत्यवादी हरिश्चंद्र होती। हम जहां तेज आवाज में सैक्स जैसे शब्द को बोलते समय भी इधर उधर निगाह करके धीमी आवाज में बोलते हैं कहीं कोई सुन तो नहीं रहा, उस इंसान ने सारी दुनियां के सामने सच बोलने का साहस जुटाया कैसे होगा यह जानते भी कि दुनियां में सर्वाधिक बच्चे पैदा करने बाले देश में सैक्स का प्रयोग महा पाप का कार्य होगा।
वह विद्वान कैसे रहे होंगे जिन्हौने योनि/ कामइच्छा / कामाख्या को पूज्य माना होगा। शिव और शक्ति को लिंग एवं योनि के रुप में भी स्वीकारा होगा। संभोग को व्यावहारिक रूप देने के लिये खजुराओ के मंदिर में विभिन्न आसनों को प्रदर्शित करती मूर्तियों का निर्माण किया होगा। कुछ साल पहले " सच का सामना " करने आये प्रतिभागियों को सैक्स संवधी प्रश्नों पर तिल तिल मरते देखा था। सत्य कडवा ही नहीं बहुत ज्यादा कठिन भी होता है।
यह जानते हुये भी कि इतनी दूरी तक पत्नि को बाइक पर घुमक्कडी के लिये साथ ले जाना परिवारीजनों को हजम न होगा, फेसबुक पर मैंने एक पोस्ट डाल दी। परिणाम के लिये मानसिक तौर पर तैयार था। विरोध भी होगा। डांट भी पडेंगी और गालियां भी सुनने को मिलेंगी । पहले से ही मालुम था। हालांकि ऐसा ज्यादा कुछ तो नहीं हुआ। बडे भैया ने कमेंट किया," it's height of your वेवकूफी " । ऐसे हल्के फुल्के कमेंट सुनने को तो घुमक्कड तैयार रहता है। घुमक्कडी में थोडी सी बेशर्मी और थोडी ढीठता आ जाती है। घुमक्कडी की आदत भी नशे की लत जैसी है। दुनियां कुछ भी कहती रहे हमें ज्यादा फर्क नहीं पडता। लेकिन परिवार बालों के पास हमें घुमक्कडी से रोकने का एक और हथियार है, सबसे घातक हथियार , इमोशनल अत्याचार । यह ऐसा हथियार है जिसमें नब्बे प्रतिशत लोग समर्पण कर देते हैं। मैंने भी कर दिया पर पूर्ण समर्पण नहीं सिर्फ आधा। पहले तो दिमाग में विचार आया कि बाइक को प्रमोद के पास अयोध्या ही छोड दूं लेकिन अयोध्या से गुवाहाटी के लिये सीधे कोई ट्रेन नहीं थी और फिर गोरखपुर के मित्र अजय पांडेय जी से भी मिलना था तो गोरखनाथ मंदिर भी घूमना था। अत: निर्णय लिया कि ट्रेन गोरखपुर से ही पकडी जायेगी। करीव तीन बजे 135 किमी दूर गोरखपुर के लिये रवाना हो गया। अयोध्या से बस्ती कबीरनगर मगहर होते हुये गोरखपुर बाला हाइवे एकदम मस्त है। गाडी अस्सी पर दौडती है। बीच में हम केवल संत कबीर की मजार मगहर में ही रुके। आधे घंटे में ही हमने संत कबीर की मजार और समाधि स्थल को घूम डाला। शांतिप्रिय स्थान है। एक तरफ हिंदू तो दूसरी तरफ मुस्लिम । कोई विवाद नहीं। विवाद सिर्फ स्वार्थ पर होता है। यहां दोनों का अलग अलग ठिकाना था। बीच में कोई दीवार भी नहीं। ऐसे पीर फकीर संत मुझे हमेशा से ही पंसद आते हैं जो बीच का रास्ता निकालते हैं।
गोरखपुर के मित्र अजय पांडेय जी गोरखपुर से सौ किमी दूर किसी स्थान पर नौकरी पर थे और घर के लिये रवाना हो लिये थे। बाइक छोडने की चिंता नहीं थी क्यूं कि Ajay Pandey  जी लगातार फोन पर थे और मेरी सकुशल यात्रा के लिये ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे। गोरखपुर में निवास है लेकिन मूलत: बिहार के रहने बाले हैं और वहीं न्यायालय सेवा में हैं। मेरे गोरखपुर मंदिर पहुंचने की खबर पाकर तुरंत गोरखनाथ मंदिर पहुंच गये। मेरा फौन न लगने के कारण घंटे भर तक मंदिर के गेट पर बैठकर मेरा इंतजार करते रहे। आखिरकार हमारी मुलाकात हुई।शाम के सात बज चले थे। बाइक उन्हीं के पास छोड देने का निश्चय हुआ। मंदिर से घर की सात किमी दूरी पार कर हम लोग घर गये । स्नान कर खाना खा पीकर हम लोगों ने रात को ग्यारह बजे ट्रैन पकडी। हम जितने भी दिन आसाम में रहे। लगातार फोन कर हमारी कुशलक्षेम भी पूछते रहे और हम जब लौट कर आये तो हमें जबर्दस्ती रोक लिया घर पर। ये तो रही इनकी मेजबानी और इनका प्रेम इसके अलावा फेसबुक पर मैंने इन्हें बहुत ही बाजिब मुद्दे उठाते देखा है। मित्र मंडली गिनी चुनी है लेकिन हैं सारे के सारे अच्छे चितंक और विचारक। मुझे लगता है एकमात्र मैं ही ऊटपटांग लिखने बाला हूं इनकी लिस्ट में। काफी धार्मिक आस्थावान व्यक्ति हैं पता नहीं मुझ जैसे काफड को कैसे झेलते होंगे। दोनों बेटों को अच्छी तालीम दिये हैं। भाभीजी का नेचर तो बहुत ही गजब का है। प्यार से जब चंदा कह कर आबाज लगाते हैं न तो ऐसा लगता है मानो चकोर पुकार रहा हो । ये दो दिन की मुलाकात अमिट यादें दे गयीं। ऐसी मुलाकातों से मुझे बहुत ताकत मिलती है क्यूंकि घर में अपनी बूझ हो न हो पर बाहर तो प्रेम मिल ही जाता है। बस यही काफी है अपनी घुमक्कडी के लिये। ईश्वर से दुआ करता हूं कि पांड्डेय परिवार बस ऐसा ही हंसता खेलता रहे और दुनियां में मुहब्बत बांटता रहे।


मेरी खुशकिस्मती ही है कि मुझे कोई भी शहर बेगाना नहीं लगता। कोई न कोई अपना मिल ही जाता है। रात को ग्यारह बजे गोरखपुर स्टेशन से गुवाहाटी के लिये ब्रम्हपुत्र मेल पकड ली। बिकलांग डिब्बे में भीड नहीं थी अत: हम तो उसी में घुस गये। सौभाग्य से गुवाहाटी तक हमें सीट की कोई परेशानी नहीं हुई। ग्यारह की पूरी रात बारह मई का दिन और रात गाडी में सफर करने के बाद तेरह मई के सुह पांच बजे हम कामाख्या स्टेशन पर उतर गये। 















सत्य की खोज

आसाम मेघालय यात्रा: सरयू स्नान अयोध्या ।।

प्राकृतिक तत्वों का सानिध्य मुझे मंदिरों की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छा लगता है। सरयू में जल का फैलाव देखकर दिल खुश हो गया। वोटिगं भी मात्र बीस रुपये की। गजब । सरयू जैसी पावन नदी में जिसमें रघुवंश ने जल समाधि ली थी, घूमने का अवसर मिल रहा हो तो क्यूं छोडा जाय ? आधे घंटे तक हम नदी में घूमते रहे । नदी के एक तरफ बने घाट तो दूसरे तरफ फैला हुआ सफेद सीमेंट जैसा रेत। हालांकि घाट इतने साफ नहीं हैं फिर भी गंदे नहीं कह सकते। सरकार इस पर थोडा ध्यान दे तो घाट बहुत सुंदर लगने लगेगें। नदी पर बना पुल घाट को दो हिस्सों में विभाजित करता है लेकिन घाट आपस में जुडा हुआ है। दूर दूर तक फैली रंगबिरंगी नावें और उनमें लगे हुये केशरिया झंडे घाटों की शोभा में चार चांद लगाते हैं। घाट के किनारे ही कुछ प्राचीन मंदिर भी हैं तो कुछ अन्य भवन भी। जबकि दूसरी ओर दूर दूर तक फैली सफेद उजियारी। यदि सियासतदानों ने इसी जगह मंदिर निर्माण करा होता तो ना तो इतना बडा विवाद होता और ना देश की जनता की आस्था के साथ मजाक होता। पर हमारी भावनाओं की चिंता किसे है सबको अपनी अपनी रोटियां जो सेंकनी हैं। 
घाट के किनारे पंडो की दुकानें भी खूब लगी हैं जो जन्म मरण के बंधन से मुक्त करा कर मोक्ष प्रदान कराने का वायदा करते नजर आते हैं। हम तो इन ठगों से दूर दूर से ही राम राम कर निकल लेते हैं। भगवान और भक्त के बीच हमें किसी बिचौलिये की जरूरत नहीं है। भारत के प्राकृतिक उपहारों को धार्मिक चोला पहना कर जितना इन ठगों ने कमाया है उतना तो कभी सरकार टैक्स में भी न कमा पाती होगी। भारतभर में जहां भी पहाड गुफा नदी झरने देखता हूं इनकी दुकान सजी मिलती है जहां ये प्राकृतिक अजूबों का टैक्स लेते दिखाई देते हैं।
सरयू नदी जिसे घाघरा भी कहा जाता है, गंगा की सहायक नदी है जो पटना से पहले ही गंगा में मिल जाती है, से लौटते लौटते भूख लग आयी थी। हनुमान गढी में दर्शन करके ही कुछ खाने का सोच रखे थे।इसलिये तुरंत चल दिये हनुमानगढी की तरफ जिसके सामने मेरा होटल भी था और फिर एक मित्र प्रमोद त्रिपाठी भी मेरा इंतजार कर रहा था। ये पंडित मुझे बीएड के दौरान आगरा में मिला था और अपने रुम पर कम रहता था , मेरे घर पर अधिक रहता था। भाभी का दुलारा देवर बहुत साल बाद भाभी से मिलने को बेताब था।






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आसाम मेघालय यात्रा: दूसरा दिन रामलला दर्शन अयोध्या ।।

यह भी एक इत्तिफाक ही था कि श्रीराम की नगरी में होटल भी हमें श्री राम के नाम का ही मिला था। खैर रात को नींद बहुत गहरी आयी, इतनी गहरी कि बिना अलार्म के सुवह पांच बजे अपने आप नींद खुल गयी। सामान होटल में ही छोडकर बाइक से निकल पडे साकेत नगरी मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम की जन्म भूमि की ओर। अयोध्या पहले कौसल जनपद की राजधानी थी। सातवीं शाताब्दी में यहां चीनी यात्री हेनत्सांग भी आया था। उसके अनुसार यहाँ 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3000 भिक्षु रहते थे। वर्तमान अयोघ्या के प्राचीन मंदिरों में सीतारसोई तथा हनुमानगढ़ी मुख्य हैं। कुछ मंदिर 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में बने जिनमें कनकभवन, नागेश्वरनाथ तथा दर्शनसिंह मंदिर दर्शनीय हैं। कुछ जैन मंदिर भी हैं। यहाँ पर वर्ष में तीन मेले लगते हैं - मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त तथा अक्टूबर-नंवबर के महीनों में।
जन्म भूमि तो हम दस मिनट में ही पहुंच गये। रामलला से लगभग पांच सौ मीटर पहले ही सीता रसोई के बगल ही मोबाईल घडी पैन ड्राईव जैसी चीजें जमा करनी पडीं। पुलिस और फौज की इतनी चाक चौबंद व्यवस्था तो शायद श्री राम ने भी करवा पायी होगी अपनी सुरक्षा में जितनी हमारी सरकार ने कर रखी है। कभी कभी तो मुझे लगता है कि धर्म के नाम पर जितनी नौटंकी हमारे देश में होती है दुनियां में शायद ही कहीं होती हो। रामलला की सुरक्षा में हर रोज दस बीस करोड खर्च किया जाना भी मुझे सिर्फ सियासी नाटक ही नजर आता है वरना जितना खर्च आज तक रामलला की सुरक्षा में हुआ है उतने में तो अयोध्या में कहीं एक शानदार भव्य मंदिर का निर्माण हो सकता था। क्या उसी बाबरी ढांचे बाली जगह से कोई जिद है ? सरयू नदी के उस पार बीघों जमीन पडी है । ऐसा मंदिर बनता कि अयोध्या में भक्तों और पर्यटकों की लाईन लगी रहती। खैर कुछ बातें ऐसी होती हैं कि हम जैसे तुच्छ बुद्धि बालों के स्तर से ऊपर की होती हैं जिन्हें सिर्फ देश के सियासतदान ही समझ सकते हैं।
शायद श्री राम अपने जीवन में इतनी घुटन कभी मेहसूस न किये होंगे जितनी हजारों फौजियों की कैद में टैंट में बैठे रामलला कर रहे हैं। एक किमी इधर उधर छोटी छोटी गलियों में घुमाने और तीन चार बार पुलिसियों के द्वारा नंगाझोरी लिये जाने के बाद हम पहुंच गये एक खुले से स्थान पर जहां से लोहे की बैरीकेडिगं शुरू होती है। तीन साल पहले गया था तब ये नहीं थीं। सिर्फ खुला मैदान सा था और यहीं से हमें इशारा करके बता दिया गया था कि वो देखो सामने टैंट में रामलला पधारे हैं। इतनी दूर से तो टैंट ही नहीं दिख रहा था तो रामलला कहां से दिखते पर इस बार लोहे की बैरीकेडिंग से होते हुये हम एक पुराने खंडहरनुमा ऊंचे से स्थान पर पहुंचे जिसके पीछे खुली जगह थी। वहीं एक छोटे से टैंट में रामलला बैठे थे। बैरीकेडिगं के दोनों ओर सुरक्षा बल के जवां और महिला सैनिक आपस में गप्पें लगा कर अपना टैम फोड रहे थे तो भक्तों के हाथों में लगी प्रसाद की थैलियों पर झपट्टा मारने की फिराक में तकतकाते हनुमान जी महाराज बैरीकेडिगं पर अधर अटके पडे थे। टैंट के सामने ना तो कोई पंडत न घंटा ना तिलक और न नारियल फूल की कोई धार्मिक गतिविधि। भला हो सजीव हनुमान जी महाराज का जो राजो के हाथ से झपट्टा मार कर ले गये वरना बापस ही आ जाता हमारे साथ। उन्ही हनुमानजी महाराज की बजह से हमें रामलला के दर्शन हुये वरना हम तो आगे बढे ही चले जा रहे थे। जैसे ही बंदर ने झपट्टा मार कर थैली छीनी , एक फौजी भाई हंसते हुये बोला , आपकी दुआ कुबूल हुई। श्रीराम सामने हैं दर्शन कर लो। ये उन्ही के भेजे हुये हैं। हम भी खुश थे चलो प्रसाद किसी के तो काम आया। मैं तो मंदिर के दर्शनों में इतनी ज्यादा रुचि नहीं रखता। पंडो के धार्मिक चोंचलों से ऊब चुका हूं इसलिये मंदिर की चौखट तक या मंदिर की शिल्पकला को निहारने तक ही अपनी घुमक्कडी को सीमित रखता हूं। ज्यादा भीड होती है तो दर्शन भी नहीं करता। बाहर से घूम कर ही चले आता हूं लेकिन इस बार पूर्ण धार्मिक आस्थावान धर्मपत्नि जो साथ थीं। श्री कृष्ण की नगरी मथुरा की रहने बाली राजो तो बस अयोध्या में पैर रखते ही अपने को धन्य समझने लगी थी। मैं भले ही ज्यादा धार्मिक न हूं पर दूसरों की भावनाओं की बहुत इज्जत करता हूं। राजो खुश थी मेरे लिये यही बहुत था।
मंदिर परिसर का चक्कर लगाते हुये हम दूसरी ओर वहीं आ निकले जहां सीता रसोई के बगल हमने मोबाईल आदि जमा कराये थे और बाइक खडी करी थी। इस पूरे भ्रमण में मैंने मकानों की बनावट और प्रयुक्त ईंटों आदि को बहुत गौर से देखा था। मुझे एक भी मकान अधिकतम पांच छ सौ साल से पुराना न लगा। सीता रसोई बाले पंडज्जी हमें बुला कर कह रहे थे कि यह देखो रसोई यहां सीता माता भोजन बनाया करती थी। आस्था का बास्तविक फायदा तो ये पंडे ही उठाते हैं। एक चक्रवर्ती सम्राट की पत्नी भोजन बनायेगी ? कहां ये पांच सौ पहले का मकान और कहां हजारों साल पहले की मिथिला नरेश की पुत्री ? कोई कौम्बीनेशन ही नहीं बैठता। पर चलो ठीक है। सबका अपना अपना धंधा है। बैसे भी भारत में धर्म का विश्व का सबसे बडा बाजार है, आस्थाओं से ही चलता है। पंडज्जी को पता नहीं होगा कि कार्बन डेटिगं पद्धति से सीता रसोई का आयुकाल भी निकाला जा सकता है। और अगर ये मुगल काल का भवन निकला तो पौराणिक गृंथों का समय निर्धारण गडबडा जायेगा। 
रामलला के दर्शन कर हम सीधे बढ गये सरयू नदी की ओर।







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Tuesday, June 20, 2017

आसाम मेघालय यात्रा: दूसरा दिन अयोध्या दर्शन ।।

हनुमानगढी में घूमने फिरने के बाद नीचे आकर चोखा बाटी का नाश्ता किया। बहुत ही स्वादिस्ट अल्पाहार। अभी कनक भवन, दशरथ भवन और जैनों के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेव जी की जन्मस्थली भी देखनी थी हमें। हनुमान गढ़ी के निकट स्थित कनक भवन भी अयोध्या का बहुत महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर सीता और राम के सोने के मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है। इसी कारण इस मंदिर को सोने का घर भी कहा जाता है। यह मंदिर टीकमगढ़ की रानी ने 1891 में बनवाया था। मुख्य मंदिर आतंरिक क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें रामजी का भव्य मंदिर स्थित है। यहां भगवान राम और उनके तीन भाइयों के साथ देवी सीता की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। अयोध्या जैन मंदिरों के लिए भी खासा लोकप्रिय है। अयोध्या को पांच जैन र्तीथकरों की जन्मभूमि भी कहा जाता है। जहां जिस र्तीथकर का जन्म हुआ था, वहीं उस र्तीथकर का मंदिर बना हुआ है। इन मंदिरों को फैजाबाद के नवाब के खजांची केसरी सिंह ने बनवाया था। बाइक की बजह से सभी पवित्र स्थल हमने शाम तीन बजे तक कर डाले और हम निकल पडे गोरखपुर की ओर। 
राजो अब तक मेरी घुमक्कडी का विरोध ही करती रही थी। उसके लिये मकान गाडी रुपया पैसा ही जिंदगी था। पहली बार मेरे साथ निकली थी यह सोच कर कि ये मुझसे दूर जाकर न जाने कितने आराम से रहते होंगे। इस यात्रा में पता चला कि घुमक्कडी शारीरिक सुख के लिये नहीं मानसिक सुख शांति के लिये की जाती है। लेकिन राजो खुश थी, भले घर जैसा आराम न था लेकिन प्रसन्न थी और उसकी खुशी का कारण था उसकी आजादी। ना कोई समाज की बंदिस और न कोई नियम कानून की बाध्यता। पहली बार तो निकली थी बेचारी घुमक्कडी पर। मथुरा के जाट किसान की कम पढी लिखी देहाती लडकी जिसकी नसों में धार्मिक कर्मकांड और सामाजिक आदर्शवाद कूट कूट कर भर दिये गये थे, आज पहली वार आजादी की सांस ले रही थी और वह आज वो कर रही थी जो उसका दिल चाहता था।
मेरी घुमक्कडी के फोटोज देखकर मैंने आज तक अनगिनत महिलाओं को यह कहते हुये सुना है," काश मैं भी लडका होती " मेरा उनसे भी यही कहना है कि समाज और धर्म की बंदिसों में घुट घुट जीने की बजाय तो घुमक्कड धर्म ही अपना लिया जाय। विश्व के सारे धर्मों से यही सबसे श्रेष्ठ धर्म है। पूर्ण आजादी। न घर की चिंता न बच्चों की। न खाने की न पीने । प्रकृति ने सबकुछ दे रखा है। घुमक्कड धर्म मनुष्य द्वारा निर्मित अन्य बनावटी धर्मों जैसा नहीं है जिसमें स्त्री को कैद में रखना ही शान समझा जाता है। घुमक्कड धर्म में स्त्रियां भी उतना ही अधिकार रखती हैं जितना पुरूष। महात्मा बुद्ध ने नारी को इस कैद से मुक्त करा कर घुमक्कड धर्म में लाने का भरषक प्रयास भी किया था। घुमक्कड कभी संकुचित बात नहीं करता। किसी को बंदिसों में बांधने या गुलाम बनाने का प्रयास नहीं करता। गुरूनानक हों या कबीर , मीरा हों या रैदास , घूमते घूमते ही मोक्ष को प्राप्त हो गये।
मुझे आज भी याद है शादी के कुछ साल बाद डरते डरते राजो ने मुझसे पूछा था कि क्या मैं घर में सलवार सूट पहन सकती हूं ? क्या रात में मैक्सी पहन सकती हूं ? मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ था। जाटों की लडकियां निर्भीक और बहादुर तो होती हैं लेकिन समाज और धर्म की इतनी बेडियों में जकडी होती है कि बहुतों को तो जिंदगीभर खुली हवा में सांस लेना नसीब नहीं होता। मैंने उसी दिन उसको आजादी का मूल मंत्र दे दिया था और साथ ही ये भी कह दिया था जो भी दिल करे वो करो और अगर किसी कार्य को दिल न गवारा करे भले कोई कहता रहे बिल्कुल न करना। सबसे पहले अपने दिल की सुनो बाद में किसी और की। इस बार उसने पहली बार घूमने की इच्छा जतायी थी और यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई कि वह अब अपने दिल की सुनने लगी है।
सुहागरात को हम दोनों ने एक दूसरे से वायदा किया था कि हम दोनों एक दूसरे से कभी झूठ न बोलेंगे। चाहे कितना ही कडवा सच हो , छुपायेंगे नहीं। इसी क्रम में उसने मेरे सच का इम्तिहान लेते हुये पूछ डाला कि क्या आपने कभी किसी से प्यार किया था ? मैंने भी बिना किसी भय या संकोच के उसे अपनी प्रेम कहानी सुना डाली थी। यह मेरा पहला सच था। हालांकि मैंने उससे यह प्रश्न कभी नहीं किया और अगर उसने जीवन में किसी से प्रेम या विवाहपूर्व सेक्स किया होता तब भी मुझे उससे कोई नाराजगी न होती। यदि मैं नाराजगी या नाखुशी व्यक्त करता तो मैं भी बंदिसों बाले धर्म का ही एक खडूस पति साबित हो जाता। मैं जन्मजात घुमक्कड धर्मी हूं जिसमें तुच्छ विचारों के लिये कोई स्थान नहीं है। गुलामी के लिये कोई जगह नहीं है। आजादी घुमक्कड का पहला उद्देश्य है हम इसे पाकर ही रहेंगे। 









Monday, June 19, 2017

आसाम मेघालय यात्रा : पहला दिन धौलपुर से अयोध्या ।।







गर्मियों की छुट्टियों का तो मुझे ही नहीं बच्चों को भी बेसब्री से इंतजार रहता है ताकि मैं पहाडों की तरफ दौड लगा सकूं और बच्चे नानी के गांव की तरफ लेकिन इस बार अलग कुछ ये रहा कि नानी के यहां सिर्फ बच्चे ही गये, श्रीमति जी मेरे साथ हो लीं। इस बार मेरा डेस्टीनेशन थोडा दूर ज्यादा था। पूर्वोत्तर राज्यों को नजदीक से जानने और समझने की इच्छा थी। मेरे पास पूरा एक महीना था घूमने को आसानी से सातों राज्यों के साथ साथ सिक्किम और भूटान भी कवर कर सकता था लेकिन दिक्कत ये कि पत्नी के साथ बाइक से कैसे जाऊं ? दिमाग में विचार आया कि बाइक को ट्रैन से पार्सल करा देता हूं। नौ मई की शाम को धौलपुर से आगरा पहुंचा लेकिन ट्रेन 28 किमी दूर टूंडला स्टेशन से थी अत: टूंडला पहुंच गया। पहुंचते पहुंचते रात के आठ बज चले थे लेकिन टूंडला स्टेशन पर पार्सल मैन ने बताया कि यहां से यदि आप पार्सल करायेंगे तो आपकी बाइक को पहुंचने में बहुत वक्त लग सकता है, आगरा फोर्ट से ही कराना ठीक रहेगा। आगरा फोर्ट से कल शाम को गुवाहाटी के लिये सीधे ट्रेन है, आप आगरा फोर्ट जाईये। मुझे उसकी सलाह ठीक लगी अत: बापस आगरे के लिये चल दिया। आगरा लौटते लौटते रात के दस बज चले थे, दिन भर स्कूल में भी भागमभाग करी थी, थका हुआ था, सोचा आज यहीं रुकते हैं, कल सुवह फोर्ट स्टेशन जाकर पूछताछ कर लेंगे। टूंडला रोड पर ट्रांस यमुना कालोनी में ही मेरे भाई का घर है, रात को वहीं विश्राम किया। सुवह तडके ही आगरा फोर्ट पहुंच कर जानकारी ली, नौ दस बजे तक औफिस के कर्मचारी एक्टिव हो पाते हैं फिर भी मुझे बाइक पैकिंग करने बाले से सारी जानकारी मिल गयी। उसने गुवाहाटी तक बाइक पार्सल खर्चा 3200 रुपये बताया और हजार रुपये की हम दोनों की टिकट। कुल मिलाकर दोनों तरफ का खर्चा करीब 8500 रुपये आ रहा था जबकि मेरा बजट कम था क्यूं कि पूरा एक महीना घूमना था तो पैसे सोच समझ कर ही खर्च करने थे।बाइक साथ में ले जाना कैंसल कर दिया।सोचा गुवाहाटी जाकर बाइक किराये पर ले लुंगा , यहां से ट्रैन से चलते हैं लेकिन ट्रैन के जनरल में खचाखच भीड देखकर दिमाग खराब हो गया। अकेले तो मैं कैसे भी एडजस्ट कर लेता हूं लेकिन बीबी को इस नर्क में कैसे धकेलूं ? बडी असमंजस में था क्या करें क्या न करूं ! मेरी छुट्टियों का एक घंटे पहले तक का निश्चित नहीं था वरना रिजर्वेशन भी करा लेता। जैसे तैसे करके तो ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण से अपनी ड्यूटी कटवा पाया था मैं। यही सोचते सोचते सुवह के नौ बज गये। 
ट्रैन की धक्कामुक्की में जाने की इच्छा तो राजो (राजकुमारी ) की भी नहीं थी। यही समय था जब बाइक से घूमने की मेरी इच्छा प्रबल हो उठी। राजो से पूछा तो तुरंत तैयार हो गयी । चलो कुछ ऐडवैंचरस करते हैं, पक गये यार घर में रोटी पकाते पकाते। बस फिर क्या था , बीबी तैयार तो हम भी तैयार । तुरंत दौड पडे यमुना एक्सप्रेस वे पर सीधे लखनऊ की ओर। एक्सप्रेस वे निसंदेह शानदार रोड है। गाडी एक ही चौथे गियर में दौड रही थी। दोपहर तक गरमी अपने पूरे चरम पर आ गयी। दूर दूर तक पानी और पेड का नामोनिशां नहीं क्यूं कि हाईवे पर कट मिले तो नीचे उतरें । गंगा नदी पार करने से पहले एक कट आया। नीचे देखा तो पेडों का एक समूह एक छोटा सा बगीचा नजर आया। पानी की भी सुविधा थी। एक छोटी सी दुकान भी थी। दोपहर में आराम करने को सही जगह थी। नीचे उतरे और दोनों बोतल भर कर बगीचे की तरफ चल दिये। चादर बिछायी और आराम करने लगे। भूख भी लगी थी। घर से रास्ते के लिये पूडी बनवा कर लाये थे। देशी घी की पूडी और आलू की सब्जी और हरे भरे खेत की मेंड । प्राकृतिक हवा । खाना खाते ही राजो तो गहरी निद्रा में चली गयी और मैं लेटे लेटे फेसबुक चलाने लगा। करीब तीन बजे तक थकान भी जाती रही और धूप भी क्यूं कि आसमान में बादल जाने लगे थे। बारिस हो सकती थी। हमने कपडे समेटे । बैग पैक किया और फिर दौड पडे लखनऊ की ओर। 
दस मई के सुवह नौ बजे से चलकर शाम तक 335 किमी दूर लखनऊ पहुंचना हमारा टार्गेट था और हम शाम छ बजे तक लखनऊ पहुंच भी गये लेकिन शहर पार करने में दो घंटे लग गये। गोरखपुर रोड पर ही फेसबुक मित्र प्रतीक बाजपेयी जी हमारा इंतजार कर रहे थे। प्रतीक भाई के पास पहुंचा जब तक रात के आठ बज चुके थे।मिलने का स्थान हमने रोड किनारे ही एक रेस्ट्रां चूज किया था। भाभीजी भी साथ में थी।आधा घंटे तक खाते पीते बतियाते रहे। भाई जी और भाभीजी दोनों ही बहुत अच्छे स्वभाव के मालिक हैं। ये मेरी खुशकिस्मती है कि यात्रा के दौरान मुझे मित्रों का स्नेह और सहयोग बहुत मिलता है।पहला ही दिन था तो थकान बिल्कुल भी नहीं थी, इसलिये दिमाग में अचानक से रात्रि विश्राम अयोध्या करने का विचार आ गया। प्रतीक भाई से मिल कर सीधे दौड पडे अयोध्या की तरफ। अयोध्या 125 किमी दूर था। रात के नौ बजे थे, सोचा हाईवे शानदार है, दो घंटे में खींच दूंगा। हालांकि मेरा यह कदम मूर्खतापूर्ण ही था, मुझे रात को लखनऊ ही रुकना चाहिये था लेकिन वो क्या है कि जाट की मोटी खोपडी में बाद में घुसता है। जोश ही जोश में हम आगे बढ तो गये लेकिन अयोध्या पहुंचते पहुंचते हालत खराब हो गयी हमारी। मुझे तो बाइक पर चलने की आदत है पर आज बेचारी रजिया फंस गयी गुंडे के साथ। दिन भर की थकी राजो झपकी लेने लगी। बीच रास्ते में भी होटल लेने की कोशिष की लेकिन माहौल कुछ ठीक सा नहीं लगा मुझे। एक दो लोग मिले जिनकी नजरें कुछ ठीक नहीं थीं तो आगे चलना ही ठीक समझा। पहली बार मुझे लगा कि महिला को साथ लेकर देर रात तक घुमक्कडी करना इतना आसान भी नहीं है यदि आपके पास फोर व्हीलर न हो तो। खैर ऊंघते आंघते बिना रुके रात बारह बजे अयोध्या पहुंच गये हम। हनुमानगढी के सामने ही एक लौज मिल गया। बढिया कमरा था। किराया 1500 रुपये । अमूमन मैं 500 रुपये तक कमरा ढूंडता हूं पर आज इमरजेंसी थी, आधी रात और साथ में लेडीज। नो बार्गेनिंग। चुपचाप आई डी की कौपी दी और रूम में औंधे मुंह जा पडा। थोडी देर में होश आया तो नहाया धोया तब जाकर कुछ जान में जान आयी। सुवह घर से शुद्ध देशी की पूडी सब्जी लेकर चला था अत: खाने की फिक्र नहीं थी । खाना खाकर बहुत गहरी नींद आयी। सुवह पांच बजे ही नींद खुल गयी।राजो ने सारे गंदे कपडे धोकर सुखा दिये और हम नहा धोकर निकल पडे श्री राम जन्म भूमि की ओर । 

 अयोध्या में होटल श्रीराम